EPISODE · May 14, 2025 · 3 MIN
174. निमित्त-मात्र निष्क्रियता नहीं है
from Gita Acharan · host Siva Prasad
अर्जुन देखता है कि सभी योद्धा श्रीकृष्ण के विश्वरूप के दांतों से चूर्ण हो रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं और तुम केवल निमित्त-मात्र हो (11.33) और इसलिए व्यथित महसूस किए बिना युद्ध करो (11.34)। भले ही अर्जुन के शत्रु उनके द्वारा पहले ही मारे जा चुके हों, फिर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध छोड़ने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय, वह उसे बिना तनाव के लड़ने के लिए कहते हैं। स्पष्ट संकेत यह है कि निमित्त-मात्र का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। निष्क्रियता एक किस्म का दमन है जो आंतरिक तनाव पैदा करता है। यदि अर्जुन शारीरिक रूप से भी युद्ध छोड़ देते तो भी युद्ध नहीं रुकता बल्कि वे जहां भी जाते, मानसिक रूप से युद्ध का बोझ ढोते। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण मानसिक रूप से इस बोझ को त्यागने और हाथ में जो कर्म है उसे परमात्मा के साधन के रूप में करने का संकेत देते हैं। यह सक्रिय स्वीकृति हमारे दैनिक जीवन के कभी न समाप्त होने वाले तनाव को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है। उदाहरण के लिए, एक बिजली का तार बिजली का संचालन करके एक बल्ब को सक्रिय करता है जो प्रकाश देता है। तार के सोचने के दो तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि अहंकार से भर जाए क्योंकि यह बल्ब को बिजली दे रहा है। दूसरा वह ऐसा भी सोच सकता है कि वह सिर्फ एक निमित्त-मात्र है जहां टरबाइन द्वारा बिजली उत्पन्न की जाती है और बल्ब प्रकाश दे रहा है। यह सच है कि जब वोल्टेज में अंतर होता है, तो तार के पास बिजली प्रवाहित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। इसी प्रकार, वोल्टेज में अंतर की तरह, तीन गुण हमारे कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं। निमित्त-मात्र वह है जो जानता है कि तीन गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। अपने आप को निमित्त-मात्र के रूप में महसूस करने के बजाय, परमात्मा को निमित्त-मात्र या एक उपकरण बनाने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति होती है। हम उम्मीद करते हैं कि हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिये परमात्मा उपकरण बनकर हमारा काम करें। मुख्य बात यह महसूस करना है कि हम इस शक्तिशाली रचना के अरबों उपकरणों में से एक हैं।
What this episode covers
अर्जुन देखता है कि सभी योद्धा श्रीकृष्ण के विश्वरूप के दांतों से चूर्ण हो रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये सभी योद्धा मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं और तुम केवल निमित्त-मात्र हो (11.33) और इसलिए व्यथित महसूस किए बिना युद्ध करो (11.34)। भले ही अर्जुन के शत्रु उनके द्वारा पहले ही मारे जा चुके हों, फिर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध छोड़ने के लिए नहीं कहा। इसके बजाय, वह उसे बिना तनाव के लड़ने के लिए कहते हैं। स्पष्ट संकेत यह है कि निमित्त-मात्र का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। निष्क्रियता एक किस्म का दमन है जो आंतरिक तनाव पैदा करता है। यदि अर्जुन शारीरिक रूप से भी युद्ध छोड़ देते तो भी युद्ध नहीं रुकता बल्कि वे जहां भी जाते, मानसिक रूप से युद्ध का बोझ ढोते। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण मानसिक रूप से इस बोझ को त्यागने और हाथ में जो कर्म है उसे परमात्मा के साधन के रूप में करने का संकेत देते हैं। यह सक्रिय स्वीकृति हमारे दैनिक जीवन के कभी न समाप्त होने वाले तनाव को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है। उदाहरण के लिए, एक बिजली का तार बिजली का संचालन करके एक बल्ब को सक्रिय करता है जो प्रकाश देता है। तार के सोचने के दो तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि अहंकार से भर जाए क्योंकि यह बल्ब को बिजली दे रहा है। दूसरा वह ऐसा भी सोच सकता है कि वह सिर्फ एक निमित्त-मात्र है जहां टरबाइन द्वारा बिजली उत्पन्न की जाती है और बल्ब प्रकाश दे रहा है। यह सच है कि जब वोल्टेज में अंतर होता है, तो तार के पास बिजली प्रवाहित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। इसी प्रकार, वोल्टेज में अंतर की तरह, तीन गुण हमारे कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं। निमित्त-मात्र वह है जो जानता है कि तीन गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। अपने आप को निमित्त-मात्र के रूप में महसूस करने के बजाय, परमात्मा को निमित्त-मात्र या एक उपकरण बनाने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति होती है। हम उम्मीद करते हैं कि हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिये परमात्मा उपकरण बनकर हमारा काम करें। मुख्य बात यह महसूस करना है कि हम इस शक्तिशाली रचना के अरबों उपकरणों में से एक हैं।
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