माँ

EPISODE · May 10, 2020 · 0 MIN

माँ

from अनकहीं बातें · host अनकहीं बातें

जिसने रक्त से सींचा, कोख में भिचा, आये तूफानों को धर धर के घसीटा, हर दर्द सहा,पर कुछ न कहा। बस माँ होने का फ़र्ज गढ़ा।

NOW PLAYING

माँ

0:00 0:59

No transcript for this episode yet

We transcribe on demand. Request one and we'll notify you when it's ready — usually under 10 minutes.

The Late Night Harmony AKASH MAHESHWARI कभी कभी कितना कुछ होता है हमारे अन्दर जो हम किसी से कहना चाहते है, किसी को बताना चाहते है। पर कभी हमारी झिझक, या सामने वाले को खोने का डर हमे रोक देता है। और कभी सामने वाले की सुनने में दिलचस्पी ना होना हमारी चुप्पी का कारण बन जाती है और हम अपने जज्बात हमारे अन्दर ही कैद कर लेते है। पर ये Feelings and Emotions भी तेज, आजाद बहती नदी सी होती है; जिसे आप थोड़ी देर के लिए रोक तो सकते हो पर जब बहाव बहुत तेज होता है तो ये बाहर निकलने का रास्ता खुद ब खुद बना लेती है। तो मैं आकाश माहेश्वरी जयपुर जैसे ख़ास से शहर का एक आम सा लड़का; जिसे लिखने, पढने और गाने का बहुत शौक है। अपने वो सारे शौक एक साथ पूरे करने के लिए ये तरीका चुना। उम्मीद है कि जितने प्यार से लिखा और पढ़ा है, आप सभी सुनने वालो से भी उतना ही प्यार मिलेगा। उम्मीद करता हूँ की कभी किसी को अपने दिल की बात किसी से कहने में तकलीफ आये तो शायद मेरे अल्फाज़ उनकी मदद कर पाए, किसी को अपना दुःख अपना दर्द अपनी तकलीफ जताने या बताने के लिए शब्द नहीं मिल रहे हो तो वो मेरे शब्दों से अपनी तकलीफ जता पाए। तो मिलते ह Harf-ba-harf Srishti Not क़िस्से-कहानियाँ-बातें हर्फ़-ब-हर्फ़ How network marketing IMC Harjinder Singh लेकिन network marketing ही एक ऐसा business है जिसे आप कम पूंजी मे शुरू कर सकते है। Network Marketing को करके आप अपने जैसे कई लोगों की टीम बना सकते है। फिर ये लोग भी अपने लिए टीम बनाएगे जिससे खुद-ब-खुद आपके टीम मे लोगों की संख्या बढ़ती जाएगी और इस तरह आपके पास बहुत लोगों का बहुत संगठन होगा और आप उस संगठन के लीडर होंगे। Jab Shabd Daraaye by Karishma Agarwal Authors Click Publishing मैंने इस किताब को लिखने से पहले बहुत बड़ा सपना देखा था कि मैं इस किताब को ऐसा लिखूँगी। जिससे पढ़ने वाला इन शब्दों मे डर का अनुभव कर सके। मेरा सोचना था कि जैसे एक पिक्चर को जब 3D का लुक दिया जाता हैं इसलिए कि उसे देखकर एहसास किया जाये और कुछ हद तक वो सच भी लगे। मैं कहानियों को डर के एहसास मे भर देना चाहती थी। मेरा मानना था कि इन कहानियों में इतना डर होना चाहिए कि इन कहानियों के टाइटल को पढ़कर डर खुद-ब-खुद पैदा होने लगे। जब हम हकीकत में हो तो वो शब्द डर के साथ मंडराने लगे। हम हमारी जिंदगी में बहुत सारी चीजों, शब्दों के बीच में हैं। मैंने उन्हीं सबको सोचते हुए इसे लिखने का सोचा था। निजी जिंदगी में होने वाली चीजें हमे कैसे डरा सकती हैं। ये इस किताब को पढ़ने पर ही पता किया जा सकता हैं। कुछ उसी तरह मैंने इस किताब को लिखने का सोचा था। लेकिन मैं नहीं कर पायी। क्यूंकि मैंने इस किताब को मेरी बेटी के जन्म के पहले लिखा था। और उसके होने के बाद कुछ परिस्थितियां ऐसी बनी की मेरी मानसिक स्थिति बहुत खराब हो गई। मैं इसे वैसा नहीं बना पायी। जैसा मैं चाहती थी। मैंने इसे पब्लिशर से ही एडिट करवाने का निर्
URL copied to clipboard!