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Alethia4India

  1. 7

    11 अक्तूबर : हमारे संघर्षों में आनन्द

    “हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्‍वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ, और तुम में किसी बात की घटी न रहे।” याकूब 1:2-4 लम्बे समय तक मैंने कल्पना की है कि मैं हर किसी को एक ठेला लिए हुए देखता हूँ। मेरे पास भी एक ठेला है। हम उन्हें इधर-उधर धकेलते फिरते हैं, और उसके अन्दर हमारे संघर्ष, प्रलोभन, डर, विफलताएँ, निराशाएँ, दिल के दुख और इच्छाएँ होती हैं। ये वे चीजें हैं जो हमें जगाती हैं और फिर हमें सुबह तीन बजे तक जगा कर रखती हैं। इस संसार में जीने से हम पर दबाव आता है, हमें चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और अक्सर हमें पीड़ा और दुख का सामना करना पड़ता है। जब हम इन कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो अक्सर हमें इन्हें नकारने, छिपाने, इन्हें दूर भगाने या उन्हें छोटा समझते हुए जीने के लिए कहा जाता है। इन सबके बीच, हम अपने संघर्षों से नफरत करने और अधिक से अधिक कड़वाहट से भरने के लिए प्रवृत्त होते हैं। कठिनाइयों पर बाइबल का दृष्टिकोण इन सभी विकल्पों से बहुत अलग है। याकूब ने कहा कि हमारे संघर्षों में पूर्ण, शुद्ध आनन्द का अनुभव करना सम्भव है। यह कैसे हो सकता है? संघर्षों में आनन्द प्राप्त करना एक पूर्ण विरोधाभास लगता है। 21वीं सदी के पश्चिमी जीवन का अधिकांश हिस्सा इस तरह से जीया जाता है कि संघर्षों से बचा जाए। यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि आनन्द प्राप्त करने का तरीका संघर्षों से बचना है। लेकिन याकूब हमें यह बताता है कि हमें “पूरे आनन्द” का अनुभव करने के लिए अपने आप को किसी किले में बन्द करने की आवश्यकता नहीं है, जहाँ हमारी समस्याएँ हम तक न पहुँच पाएँ, बल्कि इसके लिए हमें इन समस्याओं के प्रति अपने दृष्टिकोणों को बदलने की आवश्यकता है। जब वह कहता है, “यह जानकर,” तो वह हमें याद दिलाता है कि हमें अपनी भावनाओं को उस सत्य के अधीन लाना होगा जिसे हम भली-भाँति जानते हैं। और हम क्या जानते हैं? यह कि केवल विश्वास से ही सहनशीलता विकसित नहीं होती। असली विश्वास तभी सिद्ध और मजबूत होता है जब वह परखा जाता है। जिन बातों से हम बचना चाहते हैं, वही बातें हमें दृढ़ बनाती हैं। हमें जिन संघर्षों का सामना करना पड़ता है, उसके बारे में हमें ईमानदार होना होगा। हम अभी तक स्वर्ग नहीं पहुँचे हैं, इसलिए हमारा विश्वास अभी भी परखा जा रहा है। यह किसी सुखद, दूसरे जगत के अनुभव में प्रकट नहीं होता, बल्कि दैनिक जीवन के उतार-चढ़ाव में दिखता है। और असली विश्वास की परीक्षा हमेशा दृढ़ता उत्पन्न करती है। यह हमें यीशु के समान बनाती है। यह हमें दूसरों को सान्त्वना देने में सक्षम बनाती है। इसलिए हम विश्वास कर सकते हैं कि हमारी सभी कठिनाइयों के माध्यम से परमेश्वर हममें एक ऐसे विश्वास का निर्माण करेगा, जो परिपूर्ण और सम्पूर्ण हो। जब हम इस प्रतिज्ञा को पकड़े रहते हैं, तब हम संघर्ष के सामने या संघर्ष के मध्य में “पूरे आनन्द” का अनुभव करते हैं। हम यह सोचने में सक्षम हो जाते हैं, “मैं इस मार्ग को न चुनता, लेकिन प्रभु ने इसे चुना है, और वह इसका उपयोग करके स्वयं को मुझ पर और अधिक प्रकट करेगा तथा मुझे और अधिक अपने समान बनाएगा।” आज आपके ठेले में क्या है? ये वे चीजें हैं जिन्हें आपने नहीं चुना होगा। लेकिन यदि आप इन्हें अपने विश्वास की परीक्षा, मजबूती और परिपूर्णता के अवसर के रूप में देखते, तो क्या बदलता? यही रास्ता है गहरे, अजेय आनन्द का। रोमियों 5:1-11 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 4–5; इफिसियों 1 ◊

  2. 6

    6 October : आनंदी देव

    धन्यवादित (म्हणजें आनंदी) देवाच्या गौरवाची जी सुवार्ता मला सोपवलेली आहे तिला हे अनुसरून आहे. (1 तीमथ्य 1:10-11) देवाच्या गौरवाचा एक प्रमुख पैलू म्हणजें त्याचा आनंद. देव हा अपरिमित आनंदी नाहीं आणि तरीही अपरिमित असा गौरवी मात्र तो असू शकतो अशी कल्पनाहीं प्रेषित पौल करू शकत नव्हता. अपरिमित गौरवी असणं म्हणजें अपरिमित आनंदी असणं. त्यानें “धन्यवादित देवाच्या गौरवाची” ह्या वाक्प्रचाराचा उपयोग केला, कारण देव जितका आनंदी आहे तितका आनंदी असणें ही त्याचा बाबतींत एक गौरवशाली गोष्ट आहे - अपरिमित आनंदी. देव आपल्या कल्पनेपलीकडे आनंदी आहे ह्या अनाकलनीय वस्तुस्थितीमध्येंच देवाचे  गौरव आहे. ही सुवार्ता आहे : "धन्यवादित (म्हणजें पूर्णानंदी) देवाच्या गौरवाची सुवार्ता." हा बायबलमधूनच घेतलेला शास्त्र-संदर्भ आहे! देव गौरवीपणें आनंदी आहे हे शुभवृत्त आहे. कोणीही मनुष्य एका दुःखी देवाबरोबर सर्वकाळ राहावयास पाहणार नाहीं. जर देव दु:खी असेल, तर सुवार्तेचे ध्येय हे आनंदाचे ध्येय नाहीं, म्हणजें ती मुळीच सुवार्ता नाहीं असाच त्याचा अर्थ होईल. पण, खरे पाहतां, येशू आम्हाला एका आनंदी देवासोबतच सर्वकाळ राहण्यासाठीं बोलावितो जेव्हा तो म्हणतो, "तू आपल्या धन्याच्या आनंदात सहभागी हो" (मत्तय 25:23). येशू प्रकट झाला आणि मरण पावला ते यासाठीं कीं त्याचा आनंद - देवाचा आनंद - आम्हांमध्यें असावा आणि आमचा आनंद पूर्ण व्हावा (योहान 15:11; 17:13). म्हणून, सुवार्ता ही “आनंदी देवाच्या गौरवाची सुवार्ता” आहे. देवाचा अपरिमित आनंद हा प्रामुख्याने त्याच्या पुत्रामध्यें असलेला त्याचा आनंद आहे. म्हणजें जेव्हा आपण देवाच्या आनंदात सहभागी होतो, तेव्हा आपण त्या आनंदात सहभागी होतो जो पित्याला त्याच्या पुत्राच्या ठायीं आहे. ह्याच उद्देश्याने येशूनें पित्याचे नाव आपल्याला कळवलें आहे. योहान 17 मधील त्याच्या महान प्रार्थनेच्या शेवटी, तो आपल्या पित्याला म्हणाला, “मी तुझे नाव त्यांना कळवले आहे आणि कळवीन; ह्यासाठीं कीं, जी प्रीति तू माझ्यावर केलींस ती त्यांच्यामध्यें असावी आणि मी त्यांच्यामध्यें असावे” (योहान 17:26). त्यानें आम्हांला देवाचे नांव कळविले, जेणेंकरून त्याच्या पुत्रामध्यें असलेला देवाचा जो आनंद तोच आपल्यामध्येंही असावा आणि त्याच्यामध्यें आपला आनंद असावा.

  3. 5

    8 अगस्त : परमेश्वर की दया को याद रखना

    “यहोवा का यह वचन अमित्तै के पुत्र योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर; क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्‍टि में बढ़ गई है।’ परन्तु योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जानेवाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए।” योना 1:1-3 परमेश्वर को लोगों को बचाने में आनन्द आता है। जब परमेश्वर ने अपने सेवक योना को नीनवे जाने और वहाँ की बुराइयों के कारण उनके खिलाफ प्रचार करने का आदेश दिया, तो संकोच करने वाला यह भविष्यद्वक्ता जानता था कि लोग अपनी बुराइयों से पश्चाताप कर सकते हैं और परमेश्वर अपनी दया से प्रतिक्रिया दे सकता है (योना 4:2 देखें)। उसे पता था कि परमेश्वर “दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवान्त, और अति करुणामय और सत्य, हजारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करने वाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा करने वाला है, परन्तु दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष न ठहराएगा” (निर्गमन 34:6-7)। उसे यह सत्य पता था कि परमेश्वर एक दिन भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा यह कहेगा: “जब मैं किसी जाति या राज्य के विषय कहूँ कि उसे उखाड़ूँगा या ढा दूँगा अथवा नष्ट करूँगा, तब यदि उस जाति के लोग जिसके विषय मैंने यह बात कही हो अपनी बुराई से फिरें, तो मैं उस विपत्ति के विषय जो मैंने उन पर डालने की ठानी हो पछताऊँगा” (यिर्मयाह 18:7-8)। योना जानता था कि परमेश्वर का हृदय दया से भरा हुआ है—इसलिए योना ने परमेश्वर के आदेश का पालन करने से मना कर दिया। क्यों? स्पष्टतः, उसे नीनवे के लोग पसन्द नहीं थे और यह समझ में भी आता है, क्योंकि नीनवेवासी आक्रामक, क्रूर, और हिंसक मूर्तिपूजक थे और इस्राएल के लिए भयावह शत्रु थे। योना नहीं चाहता था कि प्रभु उन्हें बचाए—तो जब बाद में नीनवे के लोग अपनी बुराइयों से मुड़े, “यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का” (योना 4:1)। योना महसूस करता था कि वे परमेश्वर के न्याय के पात्र थे। और वह सही था! लेकिन शुक्र है कि राष्ट्रों, नगरों और व्यक्तियों के साथ व्यवहार करने के परमेश्वर के तरीके हमारे तरीकों से अलग हैं। परमेश्वर की इच्छा दया दिखाने की है, न्याय लाने की नहीं। नीनवे पर परमेश्वर की करुणा हमें याद दिलाती है कि वह नहीं चाहता कि कोई नाश हो, और वह लोगों को बचाने में आनन्दित होता है, खासकर उन लोगों को जो कम से कम योग्य दिखते हैं (2 पतरस 3:9)। योना केवल वहीं प्रचार करना चाहता था जहाँ वह चाहता था और जिन्हें वह चाहता था। लेकिन सुसमाचार का सन्देश सब स्थानों में सभी के लिए है। आज यीशु का शुभ समाचार “अच्छे” लोगों तक ही सीमित नहीं है, अर्थात उन लोगों तक जो हमारे जैसे दिखते, सोचते और कार्य करते हैं। वास्तव में, यीशु ने अपने अनुयायियों से कहा, “जाओ . . . सब  जातियों के लोगों को चेला बनाओ” (मत्ती 28:19, विशेष बल दिया गया है)। क्या विशाल दया है! परमेश्वर गर्वीले, जिद्दी और विरोधी लोगों का उत्साह से पीछा करता है—जैसे मैं, जैसे आप। वह हमें उत्साही होने के लिए बुलाता है, ताकि हम “नाश होते हुओं को बचाएँ, मरते हुओं की देखभाल करें,” ताकि “हम उन्हें यीशु के बारे में बताएँ, जो उनका उद्धार करने में सक्षम है।”[1] त्रिएक परमेश्वर पापी लोगों को बचाना चाहता है—वह उनके उद्धार की इतनी चाहत रखता है कि उनके लिए मरने आ गए। क्या आपका दिल उसके जैसा है? यदि हाँ, तो आप अपने आस-पास के लोगों के उद्धार की चाहत करेंगे—फिर वे चाहे जो भी हों और उन्होंने कुछ भी किया हो—उन्हें यीशु के बारे में बताने के लिए आप अवश्य जाएँगे।   1 कुरिन्थियों 9:19-23 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 74–76; प्रेरितों 27:1-26 ◊ [1] फैनी क्रोस्बी, “रेस्क्यू द पेरिशिंग” (1869).

  4. 4

    22 जुलाई : याद रखें, आपको प्रार्थना करनी है

    “जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, ‘हम उसे क्यों न निकाल सके?’ उसने उनसे कहा, ‘यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से नहीं निकल सकती।’” मरकुस 9:28-29 मरकुस 6 में यीशु ने अपने शिष्यों को दो-दो करके भेजा था, ताकि वे पश्चाताप की आवश्यकता का प्रचार करें। उसने उन्हें न केवल विशेष निर्देश दिए, बल्कि “उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया” (मरकुस 6:7)। इसके कारण उनके पास एक शानदार गवाही थी: उन्होंने “बहुत सी दुष्टात्माओं को निकाला, और बहुत से बीमारों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया।” (पद 13)। उनके पहले के सेवाकार्य में सफलता को देखते हुए यह समझना आसान है कि शिष्य आश्चर्यचकित और भ्रमित क्यों हुए, जब वे एक लड़के में से अशुद्ध आत्मा को निकालने में असफल रहे। लेकिन फिर, यीशु ने आकर उन्हें समझाया (मरकुस 9:14-27)। जब चेलों ने यीशु से यह पूछा, “हम इसे क्यों नहीं निकाल सके?” तो शायद शिष्यों को उम्मीद थी कि यीशु उन्हें कोई विशेष गुप्त ज्ञान देगा। कभी-कभी हम भी यही मानते हैं, और यीशु के उत्तर को इस तरह से समझते हैं कि हमें एक विशेष क्षमता या सेवाकार्य की आवश्यकता है। लेकिन ऐसा नहीं है। यीशु बस अपने शिष्यों और हमें यह याद दिला रहा था: तुम इसलिए सफल नहीं हुए क्योंकि तुम एक महत्त्वपूर्ण बात भूल गए थे: तुमने प्रार्थना नहीं की। अपनी सफलता के कारण शिष्य निश्चिन्त हो गए थे। वे भूल गए थे कि यह केवल परमेश्वर की अपार दया और शक्ति के कारण ही था कि वे कुछ कर पा रहे थे। वे अभी भी मसीह के साथ थे, फिर भी वे भूल गए थे। उन्हें याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी। कभी-कभी हमें भी याद दिलाए जाने की आवश्यकता होती है। यह मानना कि परमेश्वर की शक्ति अब बस हमारे पास है और हमारे नियन्त्रण में है, अविश्वास के समान है; यह परमेश्वर पर भरोसा करने के बजाय खुद पर भरोसा कर लेना है। इसके विपरीत, प्रार्थना हमारी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा के अधीन ले आती है। तब हम स्वीकार कर लेते हैं कि आश्चर्यकर्म परमेश्वर करता है, हम नहीं। और जब तक हम परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर नहीं रहते, तब तक हम किसी के हालात में हस्तक्षेप करने और एक शाश्वत परिवर्तन लाने में असमर्थ होते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं कि हम प्रार्थना क्यों नहीं करते। हमें लगता है कि हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। हम इसे करना ही नहीं चाहते। हम अपनी क्षमताओं का आवश्यकता से अधिक अनुमान लगाते हैं। हम परिकल्पानाओं में चले जाते हैं। जब हम सब कुछ अपने प्रयासों से करने की कोशिश करते हैं, तो हम अक्सर बुरी तरह से विफल हो जाते हैं। तो अगली बार जब आप किसी बात को खुद से समझने की कोशिश करें, या यह मान लें कि परमेश्वर की शक्ति आपको इस बार भी पार करा देगी क्योंकि पिछली बार ऐसा हुआ था (और वह “अगली बार” शायद आज ही होगा!), तो याद करें कि शिष्य क्या भूल गए थे और यीशु ने उन्हें क्या याद दिलाया था: उससे प्रार्थना करें, जिसके पास सारी शक्ति है, जो हम पर अपनी दया उण्डेलता है, और जो सारी महिमा का हकदार है। क्योंकि जब आप प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर को काम करते हुए देखते हैं, तो आप पाते हैं कि वह उससे भी कहीं अधिक करता है जितना आपने उससे मांगा था या कल्पना की थी (इफिसियों 3:20)। मरकुस 9:14-29 ◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 31–32; प्रेरितों 16:1-21

  5. 3

    14 फेब्रुवारी : ख्रिस्त हांच माध्यम व शेवट

    मी ख्रिस्ताबरोबर वधस्तंभावर खिळलेला आहे; आणि ह्यापुढे मी जगतो असे नाही, तर ख्रिस्त माझ्या ठायी जगतो; आणि आता देहामध्ये जे माझे जीवित आहे ते देवाच्या पुत्रावरील विश्वासाच्या योगाने आहे; त्यानें माझ्यावर प्रीती केलीं व स्वत:ला माझ्याकरता दिले. (गलती 2:20) देवानें हें विश्व का निर्माण केले? आणि ज्यां पद्धतीने तो त्यांवर सत्ता चालवित आहे ती त्यां पद्धतीने का? देव काय साध्य करित आहे? येशू ख्रिस्त हांच हे साध्य करण्याचे माध्यम किंवा हे साध्य करण्यामागे मुख्य शेवट आहे का? येशू ख्रिस्त हा देवाच्या गौरवाचे तेज व त्याच्या तत्त्वाचे प्रतिरूप आहे. तो मानवरूपात असलेला देव आहे. यां दृष्टिने, तो माध्यम नसून शेवट आहे. देवाच्या गौरवाचे प्रकटीकरण हेंच विश्वाच्या अस्तित्वाचा खरा अर्थ देतो. देव हेच साध्य करत आहे. आकाशें आणि जगाचा इतिहास, “देवाचा महिमा वर्णितांत.” पण येशू ख्रिस्ताला ह्या जगांत असे काहीतरी पूर्ण करण्यासाठीं पाठवण्यात आले होते जें करणें अगत्याचे होते. तो पापाचा प्रश्न सोडविण्यासाठीं आला. तो पापी लोकांना त्यांच्या पापांमुळें त्यांच्यावर येणाऱ्या विनाशापासून वाचवण्यासाठीं आला. हे सोडविलेलें लोक देवाचा महिमा पाहतील आणि त्याची चव घेतील आणि सार्वकाळासाठीं आनंद करित त्याचा महिमा दर्शवतील. इतर लोक देवाच्या महिमेचा तिरस्कार करित दुष्कर्माचा ढीग लावतील. अशाप्रकारे, देवाला आपल्या प्रजेच्या आनंदासाठीं आपल्या महिमेचे प्रकटीकरण करून जें साध्य करावयाचे होते, येशू ख्रिस्त हा त्याचे माध्यम आहे. ख्रिस्तानें तारणासाठीं जे कार्य केलें त्यां वाचून कोणीहि मनुष्य देवाचा महिमा पाहूं शकला नसता किंवा त्याची चव घेऊं शकला नसता. ह्या विश्वाच्या अस्तित्वाचा हेतूच रद्द होईल. तर मग, ख्रिस्त माध्यम आहे. परंतु जें त्यानें वधस्तंभावर साध्य केलें, कारण तो पापी लोकांसाठीं मरण पावला, ख्रिस्तानें पित्याचे प्रेम व त्याचे नितीमत्व यांचे सर्वश्रेष्ठत्व प्रकट केलें. हा देवाच्या महिमेच्या प्रकटीकरणाचा शिखर होता - त्याच्या कृपेचा गौरव. म्हणून, देवाच्या उद्देशाचे माध्यम म्हणून जेव्हां त्याच्या परिपूर्ण कृतीचा क्षण आला, अगदी त्यां क्षणी येशू त्या उद्देशाचा शेवट असा बनला. तो पापी लोकांसाठीं त्यांचा स्थानापन्न म्हणून मरण पावलं व त्यांना जीवन देण्यासाठीं मेलेल्यांतून पुन्हा उठला, त्यांत तो देवाच्या गौरवाचा केंद्रस्थान व सर्वोच्च प्रकटीकरण असा सिद्ध झाला. म्हणून वधस्तंभावर खिळलेला ख्रिस्त हा विश्वासाठीं देवाच्या उद्देशाचे माध्यम आणि शेवट असा दोन्ही आहे. त्याच्या ह्या कार्याशिवाय, तो शेवट — म्हणजे देवाच्या प्रजेच्या आनंदासाठीं देवाच्या गौरवाची पूर्णता प्रकट करणें — साध्य झाला नसता. आणि ज्यां कार्याचा माध्यम बनला, त्यां कार्याचा शेवटहि तोच बनला - म्हणजे तो आपल्यासाठीं शाप बनला तेव्हां त्यानें देवाविषयी जे प्रकट केले त्याचा आपण अनंतकाळासाठीं अधिकाधिक आनंद घेऊं तेव्हां तोंच सदासर्वकाळासाठीं आपल्या उपासनेचा केंद्रबिंदू असेल. हे विश्व ज्यां उद्देश्याने निर्माण केले गेले, येशू हा त्याचा शेवट आहे, आणि नीतिमान ठरविलेले लोग ज्याचा आनंद घेऊं शकतांत तो शेवट साध्य करणारा माध्यमहि तोंच आहे.

  6. 2

    7 फरवरी : प्रलोभन पर विजय

    “हमें परीक्षा में न ला।”  लूका 11:4 बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि परमेश्वर पाप और प्रलोभन का स्रोत नहीं है। वह आप किसी की परीक्षा नहीं करता है (याकूब 1:13)। जबकि ऐसा है तो हम क्यों प्रार्थना करके परमेश्वर से कहें कि वह हमें परीक्षा में न ले जाए? वास्तव में ऐसा करने के द्वारा हम परमेश्वर से क्या करने या न करने के लिए कह रहे हैं? इसके लिए हमें परखे जाने और प्रलोभन में पड़ने के बीच के सूक्ष्म अन्तर को समझना होगा। जब हम प्रार्थना करते हैं, “हे प्रभु, हमें परीक्षा में न ला,” तो हम वास्तव में यह कह रहे होते हैं, “हे परमेश्वर, हमारी सहायता कर कि हम आपके द्वारा आने वाली परीक्षा को शैतान की ओर से बुराई करने का प्रलोभन न बनने दें।” उसी प्रकार हम उससे यह भी कह रहे होते हैं कि उसकी उपस्थिति और सामर्थ्य के बिना हमें परखा न जाए, जिनके द्वारा हमें उन परखे जाने के समयों में निराशा या अविश्वास में डूब जाने के विपरीत विश्वास और आनन्द में चलने में सहायता मिलेगी। इसलिए प्रभु की प्रार्थना का यह वाक्यांश महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें प्रलोभन की वास्तविकता और निकटता स्मरण कराता है और ऐसा होना आवश्यक भी है। उत्पत्ति 4 में परमेश्वर कैन को चेतावनी देता है, “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और”—यहीं पर उपदेश है—“तुझे उस पर प्रभुता करनी है” (उत्पत्ति 4:7)। दुख की बात यह है कि कैन ने परमेश्वर से यह नहीं माँगा कि वह उसे पाप पर प्रभुता करने के लिए वह सब दे जिसकी उसे आवश्यकता थी, बजाय इसके कि पाप उस पर प्रभुता करता और उसका विनाश कर देता। प्रभु की प्रार्थना में यीशु हमें वही भूल न दोहराने की शिक्षा देता है। हमें नष्ट करने के पाप के प्रयासों को ध्यान में रखते हुए हम केवल इतना नहीं कर सकते कि हम परमेश्वर से कहें कि हमें परीक्षा में न ला और फिर मान लें कि इस समस्या का समाधान हो गया है। कदापि नहीं, हमारे कार्यों को हमारी प्रार्थनाओं के अनुरूप होना चाहिए। यदि हम वास्तव में प्रभु से उसकी पवित्र आज्ञाओं का उल्लंघन न करने के लिए सहायता माँग रहे हैं, तो हमें अपने आप को लापरवाही से, अनावश्यक रूप से, या जानबूझकर पाप की पहुँच में नहीं डालना चाहिए। परमेश्वर प्रलोभन से लड़ने में हमारी सहायता करने के लिए इच्छुक है और पूरी तरह से सक्षम भी है। वह अपने प्रेम की वाचा में यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि उसकी सन्तानों में से कोई भी पाप के चंगुल में न फँस जाए। हमारे जीवन में ऐसा कभी नहीं होगा, जब पाप का प्रलोभन इतना प्रबल हो कि परमेश्वर का अनुग्रह और सामर्थ्य हमें इसे सहन करने में सक्षम न कर सके; जैसा कि पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है, “परमेश्‍वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। न ही प्रलोभन का विरोध करने में कभी कोई ऐसी विफलता होगी, जिसे मसीह के लहू से ढका न जा सके। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में और प्रत्येक प्रलोभन का सामना करते हुए यह स्मरण रखें कि मसीह में हम “विजयी पक्ष में हैं।”[1] आप सामना कर सकते हैं क्योंकि आपके पास आपका मार्गदर्शन करने और आपकी रक्षा करने के लिए आत्मा स्वयं उपस्थित है। इस समय आप अवज्ञा के लिए कौन से नियमित प्रलोभनों का सामना कर रहे हैं? किन क्षेत्रों में या किन क्षणों में आपकी परीक्षाएँ प्रलोभनों में बदल जाती हैं? इसी क्षण परमेश्वर से उसकी सहायता माँगें, क्योंकि आपको इसकी आवश्यकता है और वह इसे प्रदान करने के लिए तैयार है।      लूका 4:1-13

  7. 1

    15 जनवरी : जयवन्त राजा

    “यूहन्ना की ओर से आसिया की सात कलीसियाओं के नाम : उसकी ओर से जो है और जो था और जो आने वाला है; और उन सात आत्माओं की ओर से जो उसके सिंहासन के सामने हैं, और यीशु मसीह की ओर से जो विश्वासयोग्य साक्षी और मरे हुओं में से जी उठने वालों में पहलौठा और पृथ्वी के राजाओं का हाकिम है, तुम्हें अनुग्रह और शान्ति मिलती रहे।”  प्रकाशितवाक्य 1:4-5 जब आपका मसीही विश्वास और आपके जीवन की परिस्थितियाँ दो अलग-अलग सच्चाइयों की घोषणा करती हुई प्रतीत होती हों, तब आप क्या करेंगे? यही वह पहेली थी जिसका सामना प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के पहले पाठक कर रहे थे। हमारे पवित्रशास्त्र की अन्तिम पुस्तक हमें भ्रमित करने के लिए नहीं परन्तु आशीषित करने के लिए लिखी गई थी (प्रकाशितवाक्य 1:3)। हमें इसे पहेलियों के संग्रह या किसी ईश्वर-विज्ञानीय रूबिक्स क्यूब के खेल के रूप में नहीं लेना चाहिए। इसके विपरीत, हमें यह समझना चाहिए कि यूहन्ना पाठकों को एक ऐतिहासिक सन्दर्भ में लिख रहा था। वह पहली सदी के उन विश्वासियों को लिख रहा था, जो अपने समय के हाकिमों द्वारा प्रताड़ित किए और सताए जा रहे थे, जिससे कि उन्हें आशा और आश्वासन दिया जा सके। सुसमाचार का प्रचार किया जा रहा था और परमेश्वर के लोगों को पूरी तरह से भरोसा था कि जिस प्रकार यीशु गया था, उसी प्रकार वह वापस भी आएगा। उनका मानना ​​था कि स्वर्गारोहित प्रभु और राजा के रूप में यीशु का सभी परिस्थितियों पर पूरी तरह से नियन्त्रण था और उसकी इच्छा पूरी पृथ्वी पर स्थापित हो रही थी। यही उनका विश्वास था। किन्तु जब वे अपनी परिस्थितियों को देखते, तो वे उनके उस विश्वास के अनुरूप नहीं लगती थीं। जो बातें वे एक दूसरे से कह रहे थे और अपने मित्रों और पड़ोसियों को बता रहे थे, उनमें से कोई भी बात सच नहीं लगती थी। ठट्ठा उड़ाने वाले बहुत बढ़ गए थे। प्रेरित पतरस ने तो विश्वासियों को पहले ही यह चेतावनी दे दी थी कि “पहले यह जान लो कि अन्तिम दिनों में हँसी ठट्ठा करने वाले आएँगे और कहेंगे, ‘उसके आने की प्रतिज्ञा कहाँ गई? क्योंकि जब से बापदादे सो गए हैं, सब कुछ वैसा ही है जैसा सृष्टि के आरम्भ से था’” (2 पतरस 3:3-4)। जहाँ एक ओर कलीसिया छोटी और संकटग्रस्त थी, वहीं दूसरी ओर मनुष्य द्वारा स्थापित साम्राज्य ताकत और महत्त्व में बढ़ रहे थे। सताव अपनी तीव्रता में बढ़ रहा था और निस्सन्देह वह दुष्ट आया और इन पीड़ित मसीहियों को यह संकेत दिया कि वे एक बड़े भ्रम में फँसे हुए हैं। उनके लिए यह आवश्यक था कि यीशु आए और उनके समक्ष अपना पक्ष रखे ताकि उनकी परेशानियाँ उन्हें हतोत्साहित, भ्रमित या अभिभूत न करें। उन्हें केवल इतना समझने की आवश्यकता थी कि यीशु अभी भी जयवन्त प्रभु और राजा था। मृतकों में से उसका पुनरुत्थान उसके अधिकार और उसकी सत्यनिष्ठा की घोषणा कर रहा था। उसके लोगों के जीवन और भविष्य के लिए उस पर भरोसा किया जा सकता था। एक ऐसे संसार में, जो परमेश्वर के लोगों पर निरन्तर अत्याचार करता रहता है, प्रकाशितवाक्य की पुस्तक ठीक वही पुस्तक है जिसकी आज कलीसिया को आवश्यकता है। जबकि आर्थिक रूप से निराशा, भौतिक रूप से अभाव, और नैतिकता और व्यक्तिगत पहचान की समस्याएँ पुरुषों और स्त्रियों के मनों को उलझाने की घुड़की दे रहे होते हैं, तब यूहन्ना का सन्देश हमें स्मरण दिलाता है कि हमारा मसीही विश्वास उन चुनौतियों और प्रश्नों के लिए पर्याप्त है जो हमारे सामने हैं। क्या आपकी परिस्थितियाँ आपको यह बता रही हैं कि शायद आपके विश्वास के बारे में आपकी धारणाएँ गलत हो सकती हैं? इस आश्वासन में विश्राम पाएँ कि यीशु जी उठा है, यीशु राज्य करता है, और अन्ततः, यीशु ही जीतता है। प्रकाशितवाक्य 1:1-8

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