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17 अगस्त : खुशी कहाँ खोजी जाए
“क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता, और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है! परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है।” भजन संहिता 1:1-2 हम यह अपेक्षा कर सकते हैं कि अब तक स्त्री-पुरुषों ने खुशी... Read More
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16 अगस्त : मधुर एबेनेज़ेर
“इसलिए अब तू मेरे दास दाऊद से ऐसा कह, ‘सेनाओं का यहोवा यों कहता है, कि मैं ने तो तुझे भेड़शाला से, और भेड़–बकरियों के पीछे-पीछे फिरने से, इस मनसा से बुला लिया कि तू मेरी प्रजा इस्राएल का प्रधान हो जाए। और जहाँ कहीं तू आया गया, वहाँ-वहाँ मैं तेरे संग रहा, और तेरे समस्त शत्रुओं का तेरे सामने से नाश किया है; फिर... Read More
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15 अगस्त : कुड़कुड़ाहट से कृतज्ञता तक
“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो।” फिलिप्पियों 2:14-15 प्राचीन इस्राएल के इतिहास में बहुत से महिमामय क्षण आए—लाल समुद्र को पार करना, प्रतिज्ञा किए हुए... Read More
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14 अगस्त : सब जातियों का प्रभु
“यहोवा सिय्योन से गरजेगा, और यरूशलेम से अपना शब्द सुनाएगा . . . ‘मैं हजाएल के राजभवन में आग लगाऊँगा . . . मैं दमिश्क के बेण्डों को तोड़ डालूँगा।” आमोस 1:2, 4-5 बाइबल का परमेश्वर न्याय का परमेश्वर है। वह सब कुछ देखता है, वह सब कुछ जानता है, और वह सब बातों का लेखा चुकता करने का वचन देता है। यह परमेश्वर की... Read More
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13 अगस्त : बेनाम लोग और परमेश्वर की योजना
“जब वे सूफ नामक देश में आए, तब शाऊल ने अपने साथ के सेवक से कहा, ‘आ, हम लौट चलें, ऐसा न हो कि मेरा पिता गदहियों की चिन्ता छोड़कर हमारी चिन्ता करने लगे।’ उसने उससे कहा, ‘सुन, इस नगर में परमेश्वर का एक जन है जिसका बड़ा आदरमान होता है; और जो कुछ वह कहता है वह बिना पूरा हुए नहीं रहता। अब हम... Read More
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12 अगस्त : जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो
“वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।” फिलिप्पियों 2:12-13 हर विद्यालय का शिक्षक यह चाहेगा कि उसके पास अपनी कक्षा... Read More
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11 अगस्त : सदाकाल का एक सिंहासन
“वरन् तेरा घराना और तेरा राज्य मेरे सामने सदा अटल बना रहेगा; तेरी गद्दी सदैव बनी रहेगी।” 2 शमूएल 7:16 परमेश्वर ने दाऊद के साथ वाचा बाँधी, यह प्रतिज्ञा करते हुए कि उसका राज्य सदा बना रहेगा। और फिर भी दाऊद के पुत्र सुलैमान के राज्य के बाद उसका राज्य विभाजित हो गया, और कुछ सौ वर्षों बाद ही उत्तरी राज्य और दक्षिणी राज्य दोनों... Read More
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10 अगस्त : परिवार में सब
“लुदिया नामक थुआथीरा नगर की बैंजनी कपड़े बेचने वाली एक भक्त स्त्री सुन रही थी। प्रभु ने उसका मन खोला कि वह पौलुस की बातों पर चित्त लगाए। जब उसने अपने घराने समेत बपतिस्मा लिया, तो उसने हम से विनती की, ‘यदि तुम मुझे प्रभु की विश्वासिनी समझते हो, तो चलकर मेरे घर में रहो,’ और वह हमें मनाकर ले गई।” प्रेरितों 16:14-15 जब परमेश्वर... Read More
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9 अगस्त : अपने उद्धार को सिद्ध करो
“इसलिए हे मेरे प्रियो, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।” फिलिप्पियों 2:12हर माता-पिता जानता है कि जब एक बच्चे को कोई उपहार दिया जाता है जिसमें विस्तृत निर्देश होते हैं, तब क्या... Read More
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8 अगस्त : सच्ची उपासना का स्रोत
“उसने कहा, ‘हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ।’ और उसे दण्डवत् किया।” यूहन्ना 9:38 जब यीशु ने उसे पहली बार पाया, तब यूहन्ना अध्याय नौ का वह अन्धा भिखारी असहाय और निराश था। फिर वह परमेश्वर के अलौकिक हस्तक्षेप का विषय बना, और उसकी दृष्टि लौटा दी गई। परिणामस्वरूप, उसका जीवन एक ओर सुधर गया, और दूसरी ओर कठिन भी हो गया; क्योंकि अपनी दृष्टि... Read More
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7 अगस्त : महिमा का भार
“ज्योंही उसने परमेश्वर के सन्दूक का नाम लिया त्योंही एली फाटक के पास कुर्सी पर से पछाड़ खाकर गिर पड़ा; और बूढ़ा और भारी होने के कारण उसकी गर्दन टूट गई, और वह मर गया। उसने तो इस्राएलियों का न्याय चालीस वर्ष तक किया था।” 1 शमूएल 4:18बाइबल में बहुत अधिक स्थान ऐसे नहीं हैं जहाँ किसी के भार का उल्लेख किया गया हो! अतः... Read More
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6 अगस्त : वह मनोभाव जो एकता उत्पन्न करता है
“जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया,... Read More
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5 अगस्त :सर्वशक्तिमान की सेवा
“तुम परमेश्वर को किसके समान बताओगे और उसकी उपमा किस से दोगे? . . . यह वह है जो पृथ्वी के घेरे के ऊपर आकाशमण्डल पर विराजमान है, और पृथ्वी के रहने वाले टिड्डी के तुल्य हैं; जो आकाश को मलमल के समान फैलाता और ऐसा तान देता है जैसा रहने के लिए तम्बू ताना जाता है; जो बड़े-बड़े हाकिमों को तुच्छ कर देता है,... Read More
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4 अगस्त: सच्चा सेवा-भाव
“जिसकी दुलहिन है, वही दूल्हा है; परन्तु दूल्हे का मित्र जो खड़ा हुआ उसकी सुनता है, दूल्हे के शब्द से बहुत हर्षित होता है : अब मेरा यह हर्ष पूरा हुआ है। अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।” यूहन्ना 3:29-30कुछ लोग यह दावा करते हैं कि वे शारीरिक हाव-भाव पढ़ने के विशेषज्ञ हैं। वे दूसरों के शरीर और हाथों की अवस्थाओं तथा उनके... Read More
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3 अगस्त : मसीह जैसा स्वभाव
“विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे। जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।” फिलिप्पियों 2:3-5किसी अनुचित शब्द या एक कठोर दृष्टि में भी विभाजन उत्पन्न करने का बड़ा सामर्थ्य होता है। हम... Read More
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2 अगस्त : परमेश्वर के सिवा भलाई कहीं नहीं
“हे ईश्वर मेरी रक्षा कर, क्योंकि मैं तेरा ही शरणागत हूँ। मैंने परमेश्वर से कहा, ‘तू ही मेरा प्रभु है; तेरे सिवा मेरी भलाई कहीं नहीं।’” भजन 16:1-2इस जीवन में आप किस वस्तु को अनमोल समझते हैं? हम सबके पास कुछ न कुछ ऐसा होता है जो हमें बहुत आनन्द देता है, या कोई ऐसा स्थान जो हमें विश्रामदायक और ठीक प्रतीत होता है। परन्तु... Read More
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1 अगस्त : जहाँ उसने आपको रखा है, वहीं सेवा करें
“तू मन ही मन यह विचार न कर कि मैं ही राजभवन में रहने के कारण और सब यहूदियों में से बची रहूँगी। क्योंकि जो तू इस समय चुपचाप रहे, तो और किसी न किसी उपाय से यहूदियों का छुटकारा और उद्धार हो जाएगा, परन्तु तू अपने पिता के घराने समेत नष्ट होगी। क्या जाने तुझे ऐसे ही कठिन समय के लिए राजपद मिल गया... Read More
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31 जुलाई : विश्वास में कदम उठाना
“विश्वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था; और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया।” इब्रानियों 11:8 यदि हम यह समझने का प्रयास करना चाहते हैं कि विश्वास को क्रिया में कैसे बदलें और परमेश्वर के वचन को सत्य मानकर अपने जीवन में कैसे उतारें, तो हमें अब्राहम... Read More
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30 जुलाई : हमारी निर्बलता में उसकी शक्ति
“तब यहोवा ने गिदोन से कहा, ‘जो लोग तेरे संग हैं वे इतने हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ नहीं कर सकता, नहीं तो इस्राएली यह कहकर मेरे विरुद्ध अपनी बड़ाई मारने लगेंगे कि हम अपने ही भुजबल के द्वारा बचे हैं। इसलिए तू जाकर लोगों में यह प्रचार करके सुना दे, “जो कोई डर के मारे थरथराता हो, वह गिलाद पहाड़ से लौटकर चला... Read More
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29 जुलाई : हस्तक्षेप को स्वीकार करना
“जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो प्रधान याजक और शास्त्री और पुरनिए उसके पास आकर पूछने लगे, ‘तू ये काम किस अधिकार से करता है? और यह अधिकार तुझे किस ने दिया है कि तू ये काम करे?’” मरकुस 11:27-28 हम में से कोई भी नहीं चाहता कि कोई दूसरा हमारे काम में हस्तक्षेप करे। जब कोई हमारे ध्यान की या हमारे द्वारा आज्ञापालन... Read More
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28 जुलाई : चलने वाले बनो
“वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।” याकूब 1:22 विश्वासियों के रूप में, हमारे जीवन में परमेश्वर के वचन की सच्चाई के प्रति प्रशिक्षित और समर्पित मन होने चाहिए, और हमें अपनी परिस्थितियों को प्रार्थना से भरना चाहिए (फिलिप्पियों 4:6-8)। फिर भी, यदि हम हमारे भीतर काम कर रही परमेश्वर की शक्ति का अनुभव... Read More
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27 जुलाई : उस पर ध्यान करो
“इसलिए उस पर ध्यान करो, जिसने अपने विरोध में पापियों का इतना विरोध सह लिया कि तुम निराश होकर साहस न छोड़ दो।” इब्रानियों 12:3 क्या कभी आप अपने विश्वास को त्यागने के प्रलोभन में पड़े हैं? शायद किसी कठिन सप्ताह के दौरान आपने अपनी परिस्थितियों पर विचार किया और सोचा, “इनमें से कोई भी बात मेरे लाभ के लिए काम नहीं कर रही है।... Read More
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26 जुलाई : परमेश्वर-केन्द्रित एकाग्रता
“मैं दाखलता हूँ : तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” यूहन्ना 15:5 शौकिया फोटोग्राफर्स अक्सर यह नहीं जानते कि वे किस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे जानते हैं कि वे किस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं,... Read More
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25 जुलाई : अनुग्रह, दया, और शान्ति
“प्रिय पुत्र तीमुथियुस के नाम : परमेश्वर पिता और हमारे प्रभु मसीह यीशु की ओर से तुझे अनुग्रह और दया और शान्ति मिलती रहे।” 2 तीमुथियुस 1:2 पौलुस अपने पत्रों में जिस तरह से तीमुथियुस को सम्बोधित करता है, वह बहुत ही प्रभावशाली है। वह इस युवक से किसी प्रकार की दूरी बनाकर नहीं रखता, बल्कि पौलुस उसे अपने “प्रिय पुत्र,” “प्रिय बालक,” और सुसमाचार की... Read More
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24 जुलाई : अधर्मी क्रोध
“अपनी पत्नी की ये बातें सुनकर कि तेरे दास ने मुझसे ऐसा-ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का। और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया; अतः वह उस बन्दीगृह में रहा।” उत्पत्ति 39:19-20 पोतीपर लोगों को परखने में माहिर था। फिरौन के अधिकारी और गार्ड के कप्तान के रूप में उसके जीवन के अधिकांश... Read More
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23 जुलाई : परमेश्वर हमारी जरूरतें पूरी करेगा
“हम तुम्हारे बीच में अनुचित चाल न चले, और किसी की रोटी मुफ़्त में न खाई; पर परिश्रम और कष्ट से रात दिन काम धन्धा करते थे कि तुम में से किसी पर भार न हो।” 2 थिस्सलुनीकियों 3:7-8 परमेश्वर पर निर्भर रहना हमारे दैनिक के जीवन के लिए काम करने के संघर्ष से टकराता नहीं है। वास्तव में, काम और उसे करने की क्षमता परमेश्वर... Read More
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21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर
“समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, तौभी यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए।” इब्रानियों 5:12 यदि आप अपने बेसमेंट में व्यायाम के लिए बहुत सारे उपकरण रखते हैं, लेकिन कभी वजन नहीं उठाते, न ही अपनी मांसपेशियों को प्रशिक्षित करते हैं और न ही अपने दिल की सेहत का... Read More
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20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर
“इस पर यहूदियों ने उस से कहा, ‘तू जो यह करता है तो हमें कौन सा चिह्न दिखाता है?’ यीशु ने उनको उत्तर दिया, ‘इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।’” यूहन्ना 2:18-19 कुछ लोग बाइबल को केवल दार्शनिक जानकारी और आध्यात्मिक टुकड़ों का मिश्रण समझते हैं। यह बात सत्य से बहुत दूर है, क्योंकि बाइबल में परमेश्वर की... Read More
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19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए
“अतः यदि मसीह में कुछ शान्ति, और प्रेम से ढाढ़स, और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है, तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।” फिलिप्पियों 2:1-2 मसीही बनने का अनुभव कुछ हद तक विवाह करने जैसा होता है। दो अविवाहित व्यक्ति विवाह के बन्धन में एक हो जाते... Read More
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18 जुलाई : परमेश्वर का राजा
“फिर परमेश्वर ने उससे (याकूब से) कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। तू फूले–फले और बढ़े; और तुझ से एक जाति वरन् जातियों की एक मण्डली भी उत्पन्न होगी, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।’” उत्पत्ति 35:11 न्यायियों की पुस्तक इस्राएलियों की कहानी बताती है, जब उनके नेता यहोशू के निधन के बाद वे प्रतिज्ञा के देश में निवास करने लगे। यह एक निराशाजनक कहानी... Read More
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30 जून : बुराई को पराजित करना
“बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:21 1940 के दशक में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए एक युवती कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव बन गई। 1946-47 की सर्दी इतनी कठोर थी कि पानी की पाइपें आंशिक रूप से जम गईं और पानी की कमी हो गई। महिला छात्रों को सप्ताह में केवल एक ही स्नान का अवसर मिलता था,... Read More
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29 जून : क्रियाशील प्रेम
“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ परन्तु ‘यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।’” रोमियों 12:19-20 इन पदों में “आग के... Read More
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28 जून : शान्ति जो सम्भव है
“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” रोमियों 12:18-19 बाइबल अद्भुत रूप से एक व्यावहारिक पुस्तक है। इसकी बुद्धि न केवल समृद्ध है, बल्कि वास्तविक भी है, और जैसे-जैसे हम इसके अनुसार जीते हैं, यह हर परिस्थिति में गहरे अर्थ के साथ हमसे बात करती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हममें से कई लोग महसूस करते हैं... Read More
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27 जून: मसीह में निवास
“अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो।” रोमियों 12:16 घर एक अद्भुत स्थान हो सकता है। हममें से बहुतों के लिए घर वह स्थान है, जहाँ हम ईमानदार हो सकते हैं, जहाँ हम अपने परिवार के साथ होते हैं, और जहाँ सारी बातें—यहाँ तक कि हमारी कमियाँ भी—परिचित होती हैं। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि असली घर वह है, जहाँ... Read More
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26 जून : मेलजोल से रहो
“आपस में एक सा मन रखो।” रोमियों 12:16 शालीनतापूर्वक असहमत होने के लिए कौशल और परमेश्वर-निष्ठा की आवश्यकता होती है। जिन लोगों के साथ हमारी हर बात में सहमति होती है, उनके साथ मेलजोल से रहना आसान होता है, क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की असहमति का कोई डर नहीं होता। लेकिन जिन लोगों से हम अलग दिखते हैं और अलग तरीके से जीते हैं—उनके साथ... Read More
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25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना
“आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो, और रोने वालों के साथ रोओ।” रोमियों 12:15 साझी खुशी सहानुभूति का एक महान अभिव्यक्ति है। हम आमतौर पर सहानुभूति शब्द का उपयोग साझा दुख को व्यक्त करने के लिए करते हैं—लेकिन यह खुशी पर भी लागू होता है। हम सहानुभूति को तब समझ पाते हैं जब हम इसे वाक्य में उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं इस शब्द... Read More
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24 जून : आत्मिक उन्माद
“प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।” रोमियों 12:11 कल्पना कीजिए एक पुराने ब्रिटिश फार्म हाउस के रसोईघर की, जिसमें चूल्हे पर एक बर्तन रखा है, जिसमें पानी उबाल रहा है। यहाँ पर हमें आत्मिक प्रतिबद्धता के बारे में बताते हुए पौलुस इसी चित्र को प्रस्तुत करता है। वह हमें यह बताता है कि मसीह में... Read More
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23 जून : भाईचारे का प्रेम
“भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।” रोमियों 12:10 युवा भाई-बहन अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं और एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। यदि हम ईमानदार हों, तो कभी-कभी कलीसिया में हमारा “भाईचारे का स्नेह” इस तरह की सोच और व्यवहार से अधिक प्रभावित होता है, बजाय इसके कि यह प्रेम और आभार से... Read More
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22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है
“बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।” रोमियों 12:9 जिस मरीज ने हड्डियों के गुदे का ट्राँसप्लाण्ट कराया है, वह जानता है कि संक्रमण के किसी भी सम्भावित खतरे से खुद को अलग रखना कितना महत्त्वपूर्ण है। चूंकि उनका प्रतिरक्षा तन्त्र इतना कमजोर हो जाता है, इसलिए वे औसत व्यक्ति से कहीं अधिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यदि कोई आगंतुक खाँसते... Read More
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21 जून : सच्चा मसीही प्रेम
“प्रेम निष्कपट हो।” रोमियों 12:9 फिल्म शानदार तरीके से यह दिखा सकती है कि एक पात्र जो कहता है और उसके दिमाग में जो सच में चल रहा होता है, उसके बीच कितना विरोधाभास हो सकता है। यह आमतौर पर उनकी आँखों के करीब से लिए गए शॉट में देखा जा सकता है: उसका मुँह कहता है, “वाह, मिस्टर जेनकिंस, आपको फिर से देखकर बहुत... Read More
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20 जून : ऊपर से मिले वरदान
“वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं। जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न–भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिसको भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे।” रोमियों 12:5-6 आत्मिक वरदान औजार हैं, खिलौने नहीं। इन्हें खेलने के लिए या दूसरों को हमारी ओर... Read More
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18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना
“क्योंकि मैं उस अनुग्रह के कारण जो मुझ को मिला है, तुम में से हर एक से कहता हूँ कि जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर जैसा परमेश्वर ने हर एक को विश्वास परिमाण के अनुसार बाँट दिया है, वैसा ही सुबुद्धि के साथ अपने को समझे।” रोमियों 12:3 कोई भी व्यक्ति आत्म-प्रशंसा के पाप से बचा हुआ... Read More
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17 जून : नया मन
“इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।” रोमियों 12:2 एयरपोर्ट कण्ट्रोल टावर एक आकर्षक जगह होती हैं। इतनी छोटी सी जगह में इतनी बड़ी क्षमता और शक्ति समाहित होती है। इन टावरों से दिए गए निर्देशों से गड़बड़ी... Read More
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16 जून : प्रतिबद्धता के लिए बुलावा
“इसलिए हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ। यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।” रोमियों 12:1 जब सैलवेशन आर्मी मिशन के संस्थापक विलियम बूथ से उनके जीवन के प्रभाव को समझाने के लिए पूछा गया, तो उन्होंने एक प्रभावशाली वाक्य में उत्तर दिया: “यीशु... Read More
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15 जून : मनुष्य का नगर
“हे मेरे लोगो, उस में से निकल आओ कि तुम उसके पापों में भागी न हो, और उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ न पड़े। क्योंकि उसके पापों का ढेर स्वर्ग तक पहुँच गया है, और उसके अधर्म परमेश्वर को स्मरण आए हैं।” प्रकाशितवाक्य 18:4-5 हमें आश्चर्यचकित या चिन्तित नहीं होना चाहिए जब विश्वासियों को लगातार विरोध का सामना करना पड़ता है। मनुष्यजाति... Read More
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14 जून : शोक की वास्तविकता
“जब यीशु ने उसको और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे, रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ, और कहा, ‘तुम ने उसे कहाँ रखा है?’ उन्होंने उससे कहा, ‘हे प्रभु, चलकर देख ले।’ यीशु रोया।” यूहन्ना 11:33-35 शोक “किसी हानि को कारण जीवन को हिला देने वाला दुख है। शोक जीवन को चिथड़े-चिथड़े कर देता है; यह... Read More
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13 जून : मेरे दिन तेरे हाथ में हैं
“परन्तु हे यहोवा, मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, ‘तू मेरा परमेश्वर है।’ मेरे दिन तेरे हाथ में हैं; तू मुझे मेरे शत्रुओं और मेरे सताने वालों के हाथ से छुड़ा। अपने दास पर अपने मुँह का प्रकाश चमका; अपनी करुणा से मेरा उद्धार कर।!” भजन 31:14-16 हममें से अधिकांश लोग भावनाओं और अनुभवों का मिश्रण होते हैं। अच्छे, बुरे... Read More
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12 जून : पिता की इच्छा
“तब मैं ने कहा, ‘देख, मैं आ गया हूँ, पवित्रशास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है, ताकि हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।” इब्रानियों 10:7 जब माता-पिता और दादा-दादी या नाना-नानी अपने परिवार के नए सदस्य को देख कर प्रसन्न होते हैं, तो वे अक्सर यह उम्मीदें और योजनाएँ साझा करते हैं कि यह छोटी लड़की बड़ी होकर क्या हासिल करेगी या यह छोटा... Read More
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11 जून : खुला कान, तत्पर इच्छा
“तब प्रभु ने उससे कहा, ‘उठकर उस गली में जा जो ‘सीधी’ कहलाती है, और यहूदा के घर में शाऊल नामक एक तरसुसवासी को पूछ; क्योंकि देख, वह प्रार्थना कर रहा है।’” प्रेरितों 9:11 बाइबल में, प्रेरितों 9 से पहले हनन्याह का कोई उल्लेख नहीं है, और इसके बाद भी केवल एक संक्षिप्त उल्लेख (प्रेरितों 22:12) है। इन दोनों उल्लेखों के अनुसार वह कोई महान... Read More
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10 जून : न्याय, कृपा, और नम्रता
“हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?” मीका 6:8 जब अठारहवीं सदी के भजनकार और प्रचारक जॉन न्यूटन ने इस पद पर प्रवचन दिया, तो उन्होंने अपने प्रवचन का शीर्षक दिया, “मसीह... Read More
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