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30 जून : बुराई को पराजित करना
“बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:21 1940 के दशक में केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते हुए एक युवती कम्युनिस्ट पार्टी की सचिव बन गई। 1946-47 की सर्दी इतनी कठोर थी कि पानी की पाइपें आंशिक रूप से जम गईं और पानी की कमी हो गई। महिला छात्रों को सप्ताह में केवल एक ही स्नान का अवसर मिलता था,... Read More
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29 जून : क्रियाशील प्रेम
“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ परन्तु ‘यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।’” रोमियों 12:19-20 इन पदों में “आग के... Read More
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28 जून : शान्ति जो सम्भव है
“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” रोमियों 12:18-19 बाइबल अद्भुत रूप से एक व्यावहारिक पुस्तक है। इसकी बुद्धि न केवल समृद्ध है, बल्कि वास्तविक भी है, और जैसे-जैसे हम इसके अनुसार जीते हैं, यह हर परिस्थिति में गहरे अर्थ के साथ हमसे बात करती है। जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हममें से कई लोग महसूस करते हैं... Read More
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27 जून: मसीह में निवास
“अभिमानी न हो, परन्तु दीनों के साथ संगति रखो।” रोमियों 12:16 घर एक अद्भुत स्थान हो सकता है। हममें से बहुतों के लिए घर वह स्थान है, जहाँ हम ईमानदार हो सकते हैं, जहाँ हम अपने परिवार के साथ होते हैं, और जहाँ सारी बातें—यहाँ तक कि हमारी कमियाँ भी—परिचित होती हैं। लेकिन शायद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि असली घर वह है, जहाँ... Read More
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26 जून : मेलजोल से रहो
“आपस में एक सा मन रखो।” रोमियों 12:16 शालीनतापूर्वक असहमत होने के लिए कौशल और परमेश्वर-निष्ठा की आवश्यकता होती है। जिन लोगों के साथ हमारी हर बात में सहमति होती है, उनके साथ मेलजोल से रहना आसान होता है, क्योंकि वहाँ किसी प्रकार की असहमति का कोई डर नहीं होता। लेकिन जिन लोगों से हम अलग दिखते हैं और अलग तरीके से जीते हैं—उनके साथ... Read More
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25 जून : दूसरों के साथ आनन्द मनाना
“आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो, और रोने वालों के साथ रोओ।” रोमियों 12:15 साझी खुशी सहानुभूति का एक महान अभिव्यक्ति है। हम आमतौर पर सहानुभूति शब्द का उपयोग साझा दुख को व्यक्त करने के लिए करते हैं—लेकिन यह खुशी पर भी लागू होता है। हम सहानुभूति को तब समझ पाते हैं जब हम इसे वाक्य में उपयोग करते हैं, लेकिन स्वयं इस शब्द... Read More
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24 जून : आत्मिक उन्माद
“प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।” रोमियों 12:11 कल्पना कीजिए एक पुराने ब्रिटिश फार्म हाउस के रसोईघर की, जिसमें चूल्हे पर एक बर्तन रखा है, जिसमें पानी उबाल रहा है। यहाँ पर हमें आत्मिक प्रतिबद्धता के बारे में बताते हुए पौलुस इसी चित्र को प्रस्तुत करता है। वह हमें यह बताता है कि मसीह में... Read More
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23 जून : भाईचारे का प्रेम
“भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।” रोमियों 12:10 युवा भाई-बहन अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं और एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। यदि हम ईमानदार हों, तो कभी-कभी कलीसिया में हमारा “भाईचारे का स्नेह” इस तरह की सोच और व्यवहार से अधिक प्रभावित होता है, बजाय इसके कि यह प्रेम और आभार से... Read More
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22 जून : उदासीनता के लिए कोई स्थान नहीं है
“बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो।” रोमियों 12:9 जिस मरीज ने हड्डियों के गुदे का ट्राँसप्लाण्ट कराया है, वह जानता है कि संक्रमण के किसी भी सम्भावित खतरे से खुद को अलग रखना कितना महत्त्वपूर्ण है। चूंकि उनका प्रतिरक्षा तन्त्र इतना कमजोर हो जाता है, इसलिए वे औसत व्यक्ति से कहीं अधिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। यदि कोई आगंतुक खाँसते... Read More
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21 जून : सच्चा मसीही प्रेम
“प्रेम निष्कपट हो।” रोमियों 12:9 फिल्म शानदार तरीके से यह दिखा सकती है कि एक पात्र जो कहता है और उसके दिमाग में जो सच में चल रहा होता है, उसके बीच कितना विरोधाभास हो सकता है। यह आमतौर पर उनकी आँखों के करीब से लिए गए शॉट में देखा जा सकता है: उसका मुँह कहता है, “वाह, मिस्टर जेनकिंस, आपको फिर से देखकर बहुत... Read More
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20 जून : ऊपर से मिले वरदान
“वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं। जबकि उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है, हमें भिन्न–भिन्न वरदान मिले हैं, तो जिसको भविष्यद्वाणी का दान मिला हो, वह विश्वास के परिमाण के अनुसार भविष्यद्वाणी करे।” रोमियों 12:5-6 आत्मिक वरदान औजार हैं, खिलौने नहीं। इन्हें खेलने के लिए या दूसरों को हमारी ओर... Read More
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18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना
“क्योंकि मैं उस अनुग्रह के कारण जो मुझ को मिला है, तुम में से हर एक से कहता हूँ कि जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर जैसा परमेश्वर ने हर एक को विश्वास परिमाण के अनुसार बाँट दिया है, वैसा ही सुबुद्धि के साथ अपने को समझे।” रोमियों 12:3 कोई भी व्यक्ति आत्म-प्रशंसा के पाप से बचा हुआ... Read More
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17 जून : नया मन
“इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।” रोमियों 12:2 एयरपोर्ट कण्ट्रोल टावर एक आकर्षक जगह होती हैं। इतनी छोटी सी जगह में इतनी बड़ी क्षमता और शक्ति समाहित होती है। इन टावरों से दिए गए निर्देशों से गड़बड़ी... Read More
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16 जून : प्रतिबद्धता के लिए बुलावा
“इसलिए हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ। यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।” रोमियों 12:1 जब सैलवेशन आर्मी मिशन के संस्थापक विलियम बूथ से उनके जीवन के प्रभाव को समझाने के लिए पूछा गया, तो उन्होंने एक प्रभावशाली वाक्य में उत्तर दिया: “यीशु... Read More
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15 जून : मनुष्य का नगर
“हे मेरे लोगो, उस में से निकल आओ कि तुम उसके पापों में भागी न हो, और उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ न पड़े। क्योंकि उसके पापों का ढेर स्वर्ग तक पहुँच गया है, और उसके अधर्म परमेश्वर को स्मरण आए हैं।” प्रकाशितवाक्य 18:4-5 हमें आश्चर्यचकित या चिन्तित नहीं होना चाहिए जब विश्वासियों को लगातार विरोध का सामना करना पड़ता है। मनुष्यजाति... Read More
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14 जून : शोक की वास्तविकता
“जब यीशु ने उसको और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे, रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ, और कहा, ‘तुम ने उसे कहाँ रखा है?’ उन्होंने उससे कहा, ‘हे प्रभु, चलकर देख ले।’ यीशु रोया।” यूहन्ना 11:33-35 शोक “किसी हानि को कारण जीवन को हिला देने वाला दुख है। शोक जीवन को चिथड़े-चिथड़े कर देता है; यह... Read More
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13 जून : मेरे दिन तेरे हाथ में हैं
“परन्तु हे यहोवा, मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, ‘तू मेरा परमेश्वर है।’ मेरे दिन तेरे हाथ में हैं; तू मुझे मेरे शत्रुओं और मेरे सताने वालों के हाथ से छुड़ा। अपने दास पर अपने मुँह का प्रकाश चमका; अपनी करुणा से मेरा उद्धार कर।!” भजन 31:14-16 हममें से अधिकांश लोग भावनाओं और अनुभवों का मिश्रण होते हैं। अच्छे, बुरे... Read More
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12 जून : पिता की इच्छा
“तब मैं ने कहा, ‘देख, मैं आ गया हूँ, पवित्रशास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है, ताकि हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।” इब्रानियों 10:7 जब माता-पिता और दादा-दादी या नाना-नानी अपने परिवार के नए सदस्य को देख कर प्रसन्न होते हैं, तो वे अक्सर यह उम्मीदें और योजनाएँ साझा करते हैं कि यह छोटी लड़की बड़ी होकर क्या हासिल करेगी या यह छोटा... Read More
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11 जून : खुला कान, तत्पर इच्छा
“तब प्रभु ने उससे कहा, ‘उठकर उस गली में जा जो ‘सीधी’ कहलाती है, और यहूदा के घर में शाऊल नामक एक तरसुसवासी को पूछ; क्योंकि देख, वह प्रार्थना कर रहा है।’” प्रेरितों 9:11 बाइबल में, प्रेरितों 9 से पहले हनन्याह का कोई उल्लेख नहीं है, और इसके बाद भी केवल एक संक्षिप्त उल्लेख (प्रेरितों 22:12) है। इन दोनों उल्लेखों के अनुसार वह कोई महान... Read More
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10 जून : न्याय, कृपा, और नम्रता
“हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चले?” मीका 6:8 जब अठारहवीं सदी के भजनकार और प्रचारक जॉन न्यूटन ने इस पद पर प्रवचन दिया, तो उन्होंने अपने प्रवचन का शीर्षक दिया, “मसीह... Read More
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9 जून : टुकड़ों को एकसाथ जोड़ना
“तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है; और यह वही है जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिए मेरे पास आना नहीं चाहते।” यूहन्ना 5:39-40 एक क्रिसमस, हमारे परिवार ने तय किया कि हम सारा परिवार मिलकर एक जिगसॉ पहेली को सुलझाएँगे। हमने सबसे बड़ी जिगसॉ पहेली खरीदी और उसके सारे टुकड़ों... Read More
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8 जून : गिदोन का प्रश्न
“उसको [गिदोन को] यहोवा के दूत ने दर्शन देकर कहा, ‘हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है।’ गिदोन ने उससे कहा, ‘हे मेरे प्रभु, विनती सुन, यदि यहोवा हमारे संग होता, तो हम पर यह सब विपत्ति क्यों पड़ती?’” न्यायियों 6:12-13 न्यायियों 6 में जब गिदोन की मुलाकात एक स्वर्गदूत से होती है, तो वह क्षण नाटकीय और असंगत दोनों है। स्वर्गदूत उसे “शूरवीर सूरमा”... Read More
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7 जून : बदला प्रभु लेगा
“तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, ‘आँख के बदले आँख, और दाँत के बदले दाँत।’ परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे।” मत्ती 5:38-39 जब यीशु ने ये परिचित शब्द कहे, तो वह किसे सम्बोधित कर रहा था? यीशु किसे बुराई को... Read More
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6 जून : अपने आप से ईमानदार रहें
“क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का यहोवा लेखा न ले, और जिसकी आत्मा में कपट न हो।” भजन 32:2 दोस्तोएव्स्की के द ब्रदर्स कारमाज़ोव में, एक पात्र दूसरे को यह सलाह देता है: “सबसे बढ़कर, अपने आप से झूठ मत बोलो। जो व्यक्ति अपने आप से झूठ बोलता है और अपने ही झूठ को मानता है, वह इस स्थिति में पहुँच जाता... Read More
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5 जून : परीक्षाओं और संकटों में आराधना करना
“जो काम वह करता है उसको यहोवा उसके हाथ से सफल कर देता है।” उत्पत्ति 39:2-3 यदि यूसुफ के पास केवल उसका प्रसिद्ध रंग-बिरंगा बागा ही होता, तो जब उसके भाइयों ने उसे उससे छीन लिया था और उसे गुलामी में बेच दिया था, तो वह पूरी तरह से बर्बाद हो गया होता। लेकिन उस बागे को पहनने वाले व्यक्ति के अन्दर एक सशक्त चरित्र... Read More
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4 जून : दीपकों के समान चमकना
“सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो, ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्वर के निष्कलंक सन्तान बने रहो, जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते दीपकों के समान दिखाई देते हो।” फिलिप्पियों 2:14-15 मसीह के लहू के द्वारा मुक्त किए गए लोग होने के नाते हमें चमकना है। जो यीशु... Read More
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3 जून : विरासत छोड़कर जाना
“पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर, और अपनी सेवा को पूरा कर।” 2 तीमुथियुस 4:5 हममें से प्रत्येक व्यक्ति एक विरासत छोड़ रहा है। हर दिन, हम अपने जीवन के चित्र में कुछ नया जोड़ रहे हैं, और अन्ततः जो कुछ हम पीछे छोड़ेंगे—हमारे निर्णय, हमारे योगदान, हमारी प्राथमिकताएँ—वे कुछ समय तक दूसरों के विचारों और चिन्तन... Read More
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2 जून : क्या वह फल पाएगा?
“वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया कि क्या जाने उसमें कुछ पाए : पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया; क्योंकि फल का समय न था। इस पर उसने उससे कहा, ‘अब से कोई तेरा फल कभी न खाए!’ और उसके चेले सुन रहे थे।” मरकुस 11:13-14 यहाँ एक घटना प्रस्तुत की गई है जो “कठिनाइयों से भरी हुई है।”[1]... Read More
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1 जून : नबी का बोझ
“भारी वचन जिसको हबक्कूक नबी ने दर्शन में पाया।” हबक्कूक 1:1 सच्चे भविष्यवक्ताओं का महत्त्व कभी इस बात में नहीं था कि वे कौन थे, बल्कि उस सन्देश में था जो वे सुनाते थे। हमारे लिए भी यही सच होना चाहिए। उदाहरण के लिए, हबक्कूक को ही लें। उसकी जीवनी सम्बन्धी जानकारी लगभग न के बराबर है। हम उसके बारे में जो कुछ भी जानते... Read More
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31 मई : हम कभी आगे नहीं बढ़ते
“तुम जो पहले निकाले हुए थे और बुरे कामों के कारण मन से बैरी थे; उसने अब उसकी शारीरिक देह में मृत्यु के द्वारा तुम्हारा भी मेल कर लिया ताकि तुम्हें अपने सम्मुख पवित्र और निष्कलंक, और निर्दोष बनाकर उपस्थित करे। यदि तुम विश्वास की नींव पर दृढ़ बने रहो और उस सुसमाचार की आशा को जिसे तुम ने सुना है न छोड़ो, जिसका प्रचार आकाश के... Read More
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30 मई : प्रतिज्ञा किया हुआ प्रबन्ध
“तब यीशु ने उन से कहा, ‘हे बालको, क्या तुम्हारे पास कुछ मछलियाँ हैं?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘नहीं।’ उसने उनसे कहा, ‘नाव की दाहिनी ओर जाल डालो तो पाओगे।’ अतः उन्होंने जाल डाला, और अब मछलियों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके।” यूहन्ना 21:5-6 हम यीशु के पास क्या लाते हैं? केवल हमारी आवश्यकता। यूहन्ना 21 में पुनर्जीवित यीशु के साथ मछली पकड़ने का... Read More
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29 मई : क्रूस का अर्थ
“वरन् इसी समय उसकी धार्मिकता प्रगट हो कि जिससे वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे उसका भी धर्मी ठहराने वाला हो।” रोमियों 3:26 यदि मसीह की क्रूस पर मृत्यु न होती, तो कोई सुसमाचार नहीं होता। यीशु के बलिदान के माध्यम से ही यह सम्भव हुआ है कि परमेश्वर पिता ने पापी मनुष्यों को अपने साथ संगति में आने का... Read More
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28 मई : फूट और विभाजन
पहली सदी की कलीसिया में विभाजन पैदा करने वाले लोग अनोखे नहीं थे; वे कलीसिया के इतिहास में हमेशा से मौजूद रहे हैं। इसलिए यहूदा का यह निर्देश आज हमारे लिए उतना ही व्यावहारिक है, जितना कि उन विश्वासियों के लिए था जिनके लिए उसने अपना पत्र लिखा था। प्रारम्भिक कलीसिया में विभाजन उत्पन्न करने वाले लोग नैतिक और सैद्धान्तिक दोषों के हानिकारक मिश्रण से... Read More
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27 मई : आत्मिक आलस्य से निपटना
“छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना, तब तेरा कंगालपन डाकू के समान, और तेरी घटी हथियारबन्द मनुष्य के समान आ पड़ेगी।” नीतिवचन 24:33-34 हम सभी ने इसे देखा है। खेल, व्यापार, और अकादमिक संसार में, कम सक्षम व्यक्ति अक्सर उन लोगों से आगे बढ़ जाते हैं जिनके पास अधिक क्षमता होती है, केवल एक गुण... Read More
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26 मई : परमेश्वर का अपरिवर्तनीय वचन
“विश्वास ही से अब्राहम ने, परखे जाने के समय में, इसहाक को बलिदान चढ़ाया; और जिसने प्रतिज्ञाओं को सच माना था और जिससे यह कहा गया था, ‘इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा,’ वही अपने एकलौते को चढ़ाने लगा।” इब्रानियों 11:17-18 जीवन कभी-कभी भारी महसूस हो सकता है। हर दिन नए चुनौतीपूर्ण क्षण लेकर आता है, जबकि पुरानी समस्याएँ बिना हल हुए जारी रहती हैं। यह आसान है कि... Read More
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25 मई : मृत्यु की तैयारी करना
“मार्था ने यीशु से कहा, ‘हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता। और अब भी मैं जानती हूँ कि जो कुछ तू परमेश्वर से माँगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘तेरा भाई फिर जी उठेगा।’ मार्था ने उससे कहा, ‘मैं जानती हूँ कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई... Read More
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24 मई : अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो
“इसलिए परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिससे वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है।” 1 पतरस 5:6-7 कभी-कभी चिन्ता हमारे जीवन में ऐसी स्थिति में आकर हम पर हावी हो जाती है, जब हम इसकी अपेक्षा भी नहीं करते। या फिर यह हमारे जीवन में अवांछनीय और स्थाई रूप से स्थान... Read More
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23 मई : मैं देखना चाहता हूँ
“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’ बहुतों ने उसे डाँटा कि चुप रहे, पर वह और भी पुकारने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर!’ तब यीशु ने ठहरकर कहा, ‘उसे बुलाओ।’” मरकुस 10:47-49 उस अन्धे आदमी के आस-पास फसह का पर्व नजदीक आ रहा था, और भीड़ जमा हो रही... Read More
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22 मई : अलगाव को क्रूसित किया गया
“उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।” इफिसियों 2:1-2 यह चाहे जितना भी विरोधाभासी लगे, चाहे यह कितना ही टकरावपूर्ण लगे, बाइबल छुटकारा न पाए लोगों को... Read More
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21 मई : परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना
“मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।” यूहन्ना 3:5 जब हम चारों सुसमाचार पढ़ते हैं, तो हमें यह पता चलता है कि यीशु की सेवा का एक बड़ा हिस्सा परमेश्वर के राज्य के शुभ समाचार का प्रचार करना था। वह मूलतः नगरों और गाँवों में यात्रा... Read More
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20 मई : अकल्पनीय अनुग्रह
“हमको उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है, जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया।” इफिसियों 1:7-8 परमेश्वर की कृपा अपने लोगों के लिए कोई सीमा नहीं जानती और न ही किसी सीमा में बँधी रहती है। इस सत्य को जानने के लिए हमें कहीं और नहीं, बल्कि मसीह... Read More
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19 मई : उसकी मेज पर स्वागत है
“फिर खाने के समय बोअज़ ने उससे कहा, ‘यहीं आकर रोटी खा, और अपना कौर सिरके में डुबा।’ तो वह लवने वालों के पास बैठ गई, और उसने उसको भुनी हुई बालें दी; और वह खाकर तृप्त हुई, वरन् कुछ बचा भी रखा।” रूत 2:14 आप और मैं ऐसे पुल बनने के लिए बुलाए गए हैं, जो अलगाव के अनुभव और दिव्य स्वीकृति के जीवन... Read More
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18 मई : कृपा और प्रबन्ध
“तब वह भूमि तक झुककर मुँह के बल गिरी, और उससे कहने लगी, ‘क्या कारण है कि तू ने मुझ परदेशिन पर अनुग्रह की दृष्टि करके मेरी सुधि ली है?’” रूत 2:10 केवल वह दिल उस अनुग्रह को प्राप्त करने पर उचित रूप से आश्चर्यचकित होगा, जो यह जानता है कि वह अनुग्रह को पाने के योग्य नहीं है। रूत कड़ी मेहनत करने वाली महिला... Read More
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17 मई : यहोवा तुम्हारे संग रहे
“और बोअज़ बैतलहम से आकर लवने वालों से कहने लगा, ‘यहोवा तुम्हारे संग रहे;’ और वे उससे बोले, ‘यहोवा तुझे आशीष दे।’” रूत 2:4 आप एक व्यक्ति के “अभिवादन” से उसके बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं। जब बोअज़ अपने खेत में (और रूत की पुस्तक में) प्रवेश करता है और अपने मजदूरों को अभिवादन करता है, तो उसके चरित्र और परमेश्वर के साथ... Read More
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16 मई : परमेश्वर के प्रावधान का चित्र-फलक
“इसलिए वह जाकर एक खेत में लवने वालों के पीछे बीनने लगी, और जिस खेत में वह संयोग से गई थी वह एलीमेलेक के कुटुम्बी बोअज़ का था। और बोअज़ बैतलहम से आया।” रूत 2:3-4 जो अक्सर हमें उलझी हुई गाँठों की तरह लगता है, वह बस उस कढ़ाई का पिछला हिस्सा होता है, जिसे परमेश्वर बुन रहा होता है। नाओमी और रूत ने ज़िन्दगी में अपने... Read More
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15 मई : उठो और चलो
“मोआबिन रूत ने नाओमी से कहा, ‘मुझे किसी खेत में जाने दे, कि जो मुझ पर अनुग्रह की दृष्टि करे, उसके पीछे-पीछे मैं सिला बीनती जाऊँ।’” रूत 2:2 क्या आप कभी दिन की शुरुआत बिस्तर में लेटे-लेटे यह सोचते हुए करते हैं कि आपके सामने और चारों ओर क्या कुछ हो रहा है? क्या आप आने वाले दिन की चुनौतियों को खुद पर हावी महसूस... Read More
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14 मई : दुख की थियोलॉजी
“मुझे नाओमी न कहो, मुझे मारा कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुख दिया है। मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे छूछी करके लौटाया है। इसलिए जब कि यहोवा ही ने मेरे विरुद्ध साक्षी दी, और सर्वशक्तिमान ने मुझे दुख दिया है, फिर तुम मुझे क्यों नाओमी कहती हो?” रूत 1:20-21 जब नाओमी मोआब में अपने पति और बेटों की कब्रों को पीछे छोड़कर... Read More
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13 मई : साधारण बातों का परमेश्वर
“इस प्रकार नाओमी अपनी मोआबिन बहू रूत के साथ लौटी, जो मोआब देश से आई थी। वे जौ कटने के समय के आरम्भ में बैतलहम पहुँचीं।” रूत 1:22 जब भी आप किसी सुबह समाचार पढ़ते, देखते या सुनते हैं, तो क्या आपके मन में ऐसे विचार आते हैं कि आप बहुत छोटे हैं? क्या आप कभी यह सवाल करते हैं, “क्या परमेश्वर सच में जानता... Read More
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12 मई : निर्णय की घाटी
“रूत बोली, ‘तू मुझ से यह विनती न कर, कि मुझे त्याग या छोड़कर लौट जा; क्योंकि जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊँगी; जहाँ तू टिके वहाँ मैं भी टिकूँगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।’” रूत 1:16 हमारे जीवनभर ऐसे क्षण आते हैं जो एक निर्णय की माँग करते हैं। और जैसा कि पासबान और लेखक रिको टाइस... Read More
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2 मई : देखने वाला और बचाने वाला प्रभु
“यहोवा अनन्तकाल के लिए महाराजा है . . . तू कान लगाकर सुनेगा कि अनाथ और पिसे हुए का न्याय करे।”भजन 10:16-18 भजनों के पृष्ठ मानव हृदय की लगभग प्रत्येक भावना को व्यक्त करते हैं। ये दिव्य प्रेरित गीत इस बात को पूरी तरह समझते हैं कि पतन के बाद के इस संसार में जीवन में जहाँ आनन्द और स्तुति है, वहीं पीड़ा, निराशा और... Read More
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