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28 मई : फूट और विभाजन
पहली सदी की कलीसिया में विभाजन पैदा करने वाले लोग अनोखे नहीं थे; वे कलीसिया के इतिहास में हमेशा से मौजूद रहे हैं। इसलिए यहूदा का यह निर्देश आज हमारे लिए उतना ही व्यावहारिक है, जितना कि उन विश्वासियों के लिए था जिनके लिए उसने अपना पत्र लिखा था। प्रारम्भिक कलीसिया में विभाजन उत्पन्न करने वाले लोग नैतिक और सैद्धान्तिक दोषों के हानिकारक मिश्रण से... Read More
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27 मई : आत्मिक आलस्य से निपटना
“छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना, तब तेरा कंगालपन डाकू के समान, और तेरी घटी हथियारबन्द मनुष्य के समान आ पड़ेगी।” नीतिवचन 24:33-34 हम सभी ने इसे देखा है। खेल, व्यापार, और अकादमिक संसार में, कम सक्षम व्यक्ति अक्सर उन लोगों से आगे बढ़ जाते हैं जिनके पास अधिक क्षमता होती है, केवल एक गुण... Read More
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26 मई : परमेश्वर का अपरिवर्तनीय वचन
“विश्वास ही से अब्राहम ने, परखे जाने के समय में, इसहाक को बलिदान चढ़ाया; और जिसने प्रतिज्ञाओं को सच माना था और जिससे यह कहा गया था, ‘इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा,’ वही अपने एकलौते को चढ़ाने लगा।” इब्रानियों 11:17-18 जीवन कभी-कभी भारी महसूस हो सकता है। हर दिन नए चुनौतीपूर्ण क्षण लेकर आता है, जबकि पुरानी समस्याएँ बिना हल हुए जारी रहती हैं। यह आसान है कि... Read More
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25 मई : मृत्यु की तैयारी करना
“मार्था ने यीशु से कहा, ‘हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता। और अब भी मैं जानती हूँ कि जो कुछ तू परमेश्वर से माँगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘तेरा भाई फिर जी उठेगा।’ मार्था ने उससे कहा, ‘मैं जानती हूँ कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।’ यीशु ने उससे कहा, ‘पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ; जो कोई... Read More
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24 मई : अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो
“इसलिए परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिससे वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है।” 1 पतरस 5:6-7 कभी-कभी चिन्ता हमारे जीवन में ऐसी स्थिति में आकर हम पर हावी हो जाती है, जब हम इसकी अपेक्षा भी नहीं करते। या फिर यह हमारे जीवन में अवांछनीय और स्थाई रूप से स्थान... Read More
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23 मई : मैं देखना चाहता हूँ
“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’ बहुतों ने उसे डाँटा कि चुप रहे, पर वह और भी पुकारने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर!’ तब यीशु ने ठहरकर कहा, ‘उसे बुलाओ।’” मरकुस 10:47-49 उस अन्धे आदमी के आस-पास फसह का पर्व नजदीक आ रहा था, और भीड़ जमा हो रही... Read More
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22 मई : अलगाव को क्रूसित किया गया
“उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात् उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।” इफिसियों 2:1-2 यह चाहे जितना भी विरोधाभासी लगे, चाहे यह कितना ही टकरावपूर्ण लगे, बाइबल छुटकारा न पाए लोगों को... Read More
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21 मई : परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना
“मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।” यूहन्ना 3:5 जब हम चारों सुसमाचार पढ़ते हैं, तो हमें यह पता चलता है कि यीशु की सेवा का एक बड़ा हिस्सा परमेश्वर के राज्य के शुभ समाचार का प्रचार करना था। वह मूलतः नगरों और गाँवों में यात्रा... Read More
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20 मई : अकल्पनीय अनुग्रह
“हमको उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है, जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया।” इफिसियों 1:7-8 परमेश्वर की कृपा अपने लोगों के लिए कोई सीमा नहीं जानती और न ही किसी सीमा में बँधी रहती है। इस सत्य को जानने के लिए हमें कहीं और नहीं, बल्कि मसीह... Read More
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19 मई : उसकी मेज पर स्वागत है
“फिर खाने के समय बोअज़ ने उससे कहा, ‘यहीं आकर रोटी खा, और अपना कौर सिरके में डुबा।’ तो वह लवने वालों के पास बैठ गई, और उसने उसको भुनी हुई बालें दी; और वह खाकर तृप्त हुई, वरन् कुछ बचा भी रखा।” रूत 2:14 आप और मैं ऐसे पुल बनने के लिए बुलाए गए हैं, जो अलगाव के अनुभव और दिव्य स्वीकृति के जीवन... Read More
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18 मई : कृपा और प्रबन्ध
“तब वह भूमि तक झुककर मुँह के बल गिरी, और उससे कहने लगी, ‘क्या कारण है कि तू ने मुझ परदेशिन पर अनुग्रह की दृष्टि करके मेरी सुधि ली है?’” रूत 2:10 केवल वह दिल उस अनुग्रह को प्राप्त करने पर उचित रूप से आश्चर्यचकित होगा, जो यह जानता है कि वह अनुग्रह को पाने के योग्य नहीं है। रूत कड़ी मेहनत करने वाली महिला... Read More
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17 मई : यहोवा तुम्हारे संग रहे
“और बोअज़ बैतलहम से आकर लवने वालों से कहने लगा, ‘यहोवा तुम्हारे संग रहे;’ और वे उससे बोले, ‘यहोवा तुझे आशीष दे।’” रूत 2:4 आप एक व्यक्ति के “अभिवादन” से उसके बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं। जब बोअज़ अपने खेत में (और रूत की पुस्तक में) प्रवेश करता है और अपने मजदूरों को अभिवादन करता है, तो उसके चरित्र और परमेश्वर के साथ... Read More
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16 मई : परमेश्वर के प्रावधान का चित्र-फलक
“इसलिए वह जाकर एक खेत में लवने वालों के पीछे बीनने लगी, और जिस खेत में वह संयोग से गई थी वह एलीमेलेक के कुटुम्बी बोअज़ का था। और बोअज़ बैतलहम से आया।” रूत 2:3-4 जो अक्सर हमें उलझी हुई गाँठों की तरह लगता है, वह बस उस कढ़ाई का पिछला हिस्सा होता है, जिसे परमेश्वर बुन रहा होता है। नाओमी और रूत ने ज़िन्दगी में अपने... Read More
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15 मई : उठो और चलो
“मोआबिन रूत ने नाओमी से कहा, ‘मुझे किसी खेत में जाने दे, कि जो मुझ पर अनुग्रह की दृष्टि करे, उसके पीछे-पीछे मैं सिला बीनती जाऊँ।’” रूत 2:2 क्या आप कभी दिन की शुरुआत बिस्तर में लेटे-लेटे यह सोचते हुए करते हैं कि आपके सामने और चारों ओर क्या कुछ हो रहा है? क्या आप आने वाले दिन की चुनौतियों को खुद पर हावी महसूस... Read More
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14 मई : दुख की थियोलॉजी
“मुझे नाओमी न कहो, मुझे मारा कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुख दिया है। मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे छूछी करके लौटाया है। इसलिए जब कि यहोवा ही ने मेरे विरुद्ध साक्षी दी, और सर्वशक्तिमान ने मुझे दुख दिया है, फिर तुम मुझे क्यों नाओमी कहती हो?” रूत 1:20-21 जब नाओमी मोआब में अपने पति और बेटों की कब्रों को पीछे छोड़कर... Read More
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13 मई : साधारण बातों का परमेश्वर
“इस प्रकार नाओमी अपनी मोआबिन बहू रूत के साथ लौटी, जो मोआब देश से आई थी। वे जौ कटने के समय के आरम्भ में बैतलहम पहुँचीं।” रूत 1:22 जब भी आप किसी सुबह समाचार पढ़ते, देखते या सुनते हैं, तो क्या आपके मन में ऐसे विचार आते हैं कि आप बहुत छोटे हैं? क्या आप कभी यह सवाल करते हैं, “क्या परमेश्वर सच में जानता... Read More
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12 मई : निर्णय की घाटी
“रूत बोली, ‘तू मुझ से यह विनती न कर, कि मुझे त्याग या छोड़कर लौट जा; क्योंकि जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊँगी; जहाँ तू टिके वहाँ मैं भी टिकूँगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।’” रूत 1:16 हमारे जीवनभर ऐसे क्षण आते हैं जो एक निर्णय की माँग करते हैं। और जैसा कि पासबान और लेखक रिको टाइस... Read More
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2 मई : देखने वाला और बचाने वाला प्रभु
“यहोवा अनन्तकाल के लिए महाराजा है . . . तू कान लगाकर सुनेगा कि अनाथ और पिसे हुए का न्याय करे।”भजन 10:16-18 भजनों के पृष्ठ मानव हृदय की लगभग प्रत्येक भावना को व्यक्त करते हैं। ये दिव्य प्रेरित गीत इस बात को पूरी तरह समझते हैं कि पतन के बाद के इस संसार में जीवन में जहाँ आनन्द और स्तुति है, वहीं पीड़ा, निराशा और... Read More
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1 मई : प्रत्येक वरदान के साथ परमेश्वर की महिमा करना
“इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो।”1 कुरिन्थियों 10:31 नाटकीय घटनाएँ प्रायः हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। गोल्फ के मैदान में “होल-इन-वन” अर्थात एक ही शॉट में गेंद को छेद में डालने या बास्केटबॉल कोर्ट में बज़र-बीटर अर्थात आखरी घण्टी बजने से ठीक पहले गेंद को बास्केट में डालने के बारे में सोचें। छेद... Read More
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30 अप्रैल : किसी दूसरे की सफलता पर प्रतिक्रिया देना
“फिर उसने एक और स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका भी यों वर्णन किया, ‘सुनो, मैं ने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत कर रहे हैं’ . . . उसके भाई उससे डाह करते थे।” उत्पत्ति 37:9, 11 ईर्ष्या एक ऐसा अहसास है, जो मनुष्यजाति में सामान्य है। यह एक राक्षस भी है—एक ऐसा दानव जो... Read More
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29 अप्रैल : उपयुक्त रीति से ऊँचा उठाया गया
“इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया।” फिलिप्पियों 2:9 फिलिप्पियों 2:5-8 मसीह की मानवता, दिव्यता, सेवा, और दीनता के बारे में एक सुन्दर वक्तव्य है। परमेश्वर के देहधारी पुत्र की विनम्रता को क्रूस पर उसकी मृत्यु तक देखने के बाद आपके मन में अगली क्या बात आती है? स्वाभाविक रूप से हम पुनरुत्थान के बारे में सोचते हैं। लेकिन पौलुस ऐसा नहीं करता।... Read More
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28 अप्रैल : यीशु हमें उठाकर खड़ा करता है
“तब वह चिल्लाकर और उसे बहुत मरोड़ कर, निकल आई; और बालक मरा हुआ सा हो गया, यहाँ तक कि बहुत लोग कहने लगे कि वह मर गया। परन्तु यीशु ने उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।” मरकुस 9:26-27ऐसा कोई भी नहीं है, जिसकी मदद यीशु न कर सकें। मरकुस 9 में, हम यीशु की एक बच्चे के साथ बातचीत... Read More
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28 April : मोठी अदलाबदल
“कारण मला ख्रिस्ताच्या सुवार्तेची लाज वाटत नाहीं; कारण विश्वास ठेवणाऱ्या प्रत्येकाला – प्रथम यहूद्याला मग हेल्लेण्याला – तारणासाठीं ती देवाचे सामर्थ्य आहे. कारण तिच्यात देवाचे नीतिमत्त्व विश्वासाने विश्वासासाठीं प्रकट झालेंले आहे; “नीतिमान विश्वासाने जगेल” ह्या शास्त्रलेखाप्रमाणे हे आहे” (रोम 1:16-17) देवाला स्वीकारणीय ठरावे म्हणून आम्हांला नीतिमत्वाची गरज आहे. पण आमच्यांत ते नीतिमत्व नाहीं. आमच्यांत जे आहे ते म्हणजें पाप. तर, देवाजवळ जाण्यासाठीं आपल्याला ज्याची गरज... Read More
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27 अप्रैल : सही तरीके से माँगना
“तुम्हें इसलिए नहीं मिलता कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो।” याकूब 4:2-3 तुम एक राजा के पास आ रहे हो, बड़ी याचिकाएँ अपने साथ लाओ; क्योंकि उसका अनुग्रह और सामर्थ्य ऐसे हैं कि कोई भी कभी भी उससे इतना नहीं माँग सकता, जो परमेश्वर के लिए बहुत ज्यादा हो।[1]... Read More
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26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना
“मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसी ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।” फिलिप्पियों 1:20 आपका शरीर और आप इसके साथ जो करते हैं, मायने रखता है। अपने लेखन में कई... Read More
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25 अप्रैल : अंधे के लिए दया
“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’” मरकुस 10:47 अंधा बरतिमाई पूरी तरह अंधकार में बैठा था। वह चलने-फिरने की आहट, भीड़ की आवाज़ें और लोगों की बातों का शोर सुन सकता था। वह उस हंगामे को सुन सकता था जो यह संकेत दे रहा था कि नासरत का यीशु अंधेरे में... Read More
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24 अप्रैल : दुख से आनन्द की ओर
“यह कहकर उसने अपना हाथ और अपना पंजर उनको दिखाए। तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।” यूहन्ना 20:20 पहला ईस्टर एक सामान्य ईस्टर उत्सव जैसा नहीं दिखा। यीशु के पुनरुत्थान का समाचार आने से पहले वह दिन आँसुओं, तबाही और उलझन से भरा हुआ था—उसमें आनन्द, आशा और स्तुति बिल्कुल नहीं थे। शिष्य डर के मारे एक साथ इकट्ठा थे, एक-दूसरे को बचाने के... Read More
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23 अप्रैल : जीवन सभी के लिए प्रवाहित होगा
“नगर के चारों ओर का घेरा अठारह हज़ार बाँस का हो, और उस दिन से आगे को नगर का नाम ‘यहोवा शाम्मा’ रहेगा।” यहेजकेल 48:35 सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। इस्राएलियों को निर्वासन में रहते हुए छः दशक बीत चुके थे, जब छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में फारस के कुस्रू ने सत्ता सम्भाली। जल्द ही, राजा ने कुछ इस्राएली बन्दियों को उनके स्वदेश लौटने की... Read More
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