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2 मई : देखने वाला और बचाने वाला प्रभु
“यहोवा अनन्तकाल के लिए महाराजा है . . . तू कान लगाकर सुनेगा कि अनाथ और पिसे हुए का न्याय करे।”भजन 10:16-18 भजनों के पृष्ठ मानव हृदय की लगभग प्रत्येक भावना को व्यक्त करते हैं। ये दिव्य प्रेरित गीत इस बात को पूरी तरह समझते हैं कि पतन के बाद के इस संसार में जीवन में जहाँ आनन्द और स्तुति है, वहीं पीड़ा, निराशा और... Read More
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1 मई : प्रत्येक वरदान के साथ परमेश्वर की महिमा करना
“इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो।”1 कुरिन्थियों 10:31 नाटकीय घटनाएँ प्रायः हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। गोल्फ के मैदान में “होल-इन-वन” अर्थात एक ही शॉट में गेंद को छेद में डालने या बास्केटबॉल कोर्ट में बज़र-बीटर अर्थात आखरी घण्टी बजने से ठीक पहले गेंद को बास्केट में डालने के बारे में सोचें। छेद... Read More
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30 अप्रैल : किसी दूसरे की सफलता पर प्रतिक्रिया देना
“फिर उसने एक और स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका भी यों वर्णन किया, ‘सुनो, मैं ने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत कर रहे हैं’ . . . उसके भाई उससे डाह करते थे।” उत्पत्ति 37:9, 11 ईर्ष्या एक ऐसा अहसास है, जो मनुष्यजाति में सामान्य है। यह एक राक्षस भी है—एक ऐसा दानव जो... Read More
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29 अप्रैल : उपयुक्त रीति से ऊँचा उठाया गया
“इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया।” फिलिप्पियों 2:9 फिलिप्पियों 2:5-8 मसीह की मानवता, दिव्यता, सेवा, और दीनता के बारे में एक सुन्दर वक्तव्य है। परमेश्वर के देहधारी पुत्र की विनम्रता को क्रूस पर उसकी मृत्यु तक देखने के बाद आपके मन में अगली क्या बात आती है? स्वाभाविक रूप से हम पुनरुत्थान के बारे में सोचते हैं। लेकिन पौलुस ऐसा नहीं करता।... Read More
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28 अप्रैल : यीशु हमें उठाकर खड़ा करता है
“तब वह चिल्लाकर और उसे बहुत मरोड़ कर, निकल आई; और बालक मरा हुआ सा हो गया, यहाँ तक कि बहुत लोग कहने लगे कि वह मर गया। परन्तु यीशु ने उसका हाथ पकड़ के उसे उठाया, और वह खड़ा हो गया।” मरकुस 9:26-27ऐसा कोई भी नहीं है, जिसकी मदद यीशु न कर सकें। मरकुस 9 में, हम यीशु की एक बच्चे के साथ बातचीत... Read More
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28 April : मोठी अदलाबदल
“कारण मला ख्रिस्ताच्या सुवार्तेची लाज वाटत नाहीं; कारण विश्वास ठेवणाऱ्या प्रत्येकाला – प्रथम यहूद्याला मग हेल्लेण्याला – तारणासाठीं ती देवाचे सामर्थ्य आहे. कारण तिच्यात देवाचे नीतिमत्त्व विश्वासाने विश्वासासाठीं प्रकट झालेंले आहे; “नीतिमान विश्वासाने जगेल” ह्या शास्त्रलेखाप्रमाणे हे आहे” (रोम 1:16-17) देवाला स्वीकारणीय ठरावे म्हणून आम्हांला नीतिमत्वाची गरज आहे. पण आमच्यांत ते नीतिमत्व नाहीं. आमच्यांत जे आहे ते म्हणजें पाप. तर, देवाजवळ जाण्यासाठीं आपल्याला ज्याची गरज... Read More
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27 अप्रैल : सही तरीके से माँगना
“तुम्हें इसलिए नहीं मिलता कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो।” याकूब 4:2-3 तुम एक राजा के पास आ रहे हो, बड़ी याचिकाएँ अपने साथ लाओ; क्योंकि उसका अनुग्रह और सामर्थ्य ऐसे हैं कि कोई भी कभी भी उससे इतना नहीं माँग सकता, जो परमेश्वर के लिए बहुत ज्यादा हो।[1]... Read More
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26 अप्रैल : हमारे शरीरों में परमेश्वर की महिमा करना
“मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसी ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।” फिलिप्पियों 1:20 आपका शरीर और आप इसके साथ जो करते हैं, मायने रखता है। अपने लेखन में कई... Read More
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25 अप्रैल : अंधे के लिए दया
“वह यह सुनकर कि यीशु नासरी है, पुकार-पुकार कर कहने लगा, ‘हे दाऊद की सन्तान, यीशु मुझ पर दया कर!’” मरकुस 10:47 अंधा बरतिमाई पूरी तरह अंधकार में बैठा था। वह चलने-फिरने की आहट, भीड़ की आवाज़ें और लोगों की बातों का शोर सुन सकता था। वह उस हंगामे को सुन सकता था जो यह संकेत दे रहा था कि नासरत का यीशु अंधेरे में... Read More
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24 अप्रैल : दुख से आनन्द की ओर
“यह कहकर उसने अपना हाथ और अपना पंजर उनको दिखाए। तब चेले प्रभु को देखकर आनन्दित हुए।” यूहन्ना 20:20 पहला ईस्टर एक सामान्य ईस्टर उत्सव जैसा नहीं दिखा। यीशु के पुनरुत्थान का समाचार आने से पहले वह दिन आँसुओं, तबाही और उलझन से भरा हुआ था—उसमें आनन्द, आशा और स्तुति बिल्कुल नहीं थे। शिष्य डर के मारे एक साथ इकट्ठा थे, एक-दूसरे को बचाने के... Read More
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23 अप्रैल : जीवन सभी के लिए प्रवाहित होगा
“नगर के चारों ओर का घेरा अठारह हज़ार बाँस का हो, और उस दिन से आगे को नगर का नाम ‘यहोवा शाम्मा’ रहेगा।” यहेजकेल 48:35 सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है। इस्राएलियों को निर्वासन में रहते हुए छः दशक बीत चुके थे, जब छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में फारस के कुस्रू ने सत्ता सम्भाली। जल्द ही, राजा ने कुछ इस्राएली बन्दियों को उनके स्वदेश लौटने की... Read More
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