10. S01 - E10 ए हिज्र के गज़र, तेरा कोई नाम ना लेता!😍 episode artwork

EPISODE · Apr 2, 2022 · 7 MIN

10. S01 - E10 ए हिज्र के गज़र, तेरा कोई नाम ना लेता!😍

from 'Wah! Ye Diariyaan' (स्वरचित १००+ गज़लें, नज़्में, और कविताऐं)!'

कभी ऐसा हुआ है आपके साथ, की जब ग़म-ए-जुदाई इतनी ज्यादा हो गई हो, की आपको, जमीन के दो टुकड़े करने का दिल करे!😇-ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -दूर हैं वो, ना जाने अब किस हाल में होंगे,गर पास होते तो उन्हें, सीने से लगा लेता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -कब्र ने मुझसे कहा, कि माफ़ कर देना मुझे,गर बस में होता मेरे, तो दोनों को जगह देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -बस कसक सी, दौर-ए-जाम, और एक तन्हा रात है,ऐसे आलम में मुझे, और क्या खुदा देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -पूछता हूं, हर किसी से, क्या इश्क यही है,ऐसा सुरूर है जो, क्या खाक नशा देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता! -वो ना जाने मुझसे जुदा होकर भी क्यों चुप हैं 'ए दर्द',मैं जो होता जगह उनकी, जहाँ में आग लगा देता! -ऐ हिज़्र के गजर, तेरा कोई नाम न लेता,मैं गर वस्ल में मेहबूब को सलाम न देता,न वो लेकर बेज़ार दिल, आह भरते रातों में,न मैं अपने बिस्तर को सिलवट की सजा देता!

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