EPISODE · Feb 22, 2024 · 3 MIN
112. भीतर के शत्रु से सावधान
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, व्यक्ति स्वयं को अपना उद्धार करने और अपने को अधोगति में डालने के लिए जिम्मेदार है (6.5)। श्रीकृष्ण इस जिम्मेदारी को निभाने का एक मार्ग सुझाते हैं जब वे कहते हैं, ‘‘जिसने अपने आप को जीत लिया, उसके लिए उसका स्व ही उसका मित्र है, लेकिन उसके लिए जिसने अपने आप पर विजय प्राप्त नहीं की, उसके लिए उसका स्व ही वास्तव में उसका शत्रु है’’ (6.6)। मूल बात स्वयं पर विजय प्राप्त करना है। आत्मा शब्द बारह बार श्लोक 6.5 और 6.6 में प्रकट होता है जिससे कई व्याख्याओं की संभावनाएं होती हैं। लेकिन, एक साधक के लिए, आगे के श्लोकों में निर्धारित सन्दर्भ खुद पर विजय प्राप्त करने के मूल पहलू के बारे में स्पष्टता प्रदान करेगा। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘सर्दी-गर्मी और सुख-दु:खादि में तथा मान और अपमान में जिसके अंत:करण की वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष के ज्ञान में परमात्मा सम्यक प्रकार से स्थित हैं’’ (6.7)। इसका अर्थ चिरस्थायी द्वंद्वों से पार पाना है। अर्जुन ने कई युद्ध जीते थे जिससे उसे खुशी मिली। लेकिन कुरुक्षेत्र के युद्ध में, उसके शिक्षक, दोस्त और रिश्तेदार उसके विरोधी सेना में खड़े थे, जिसकी वजह से उसे अपने लोगों को खोने का डर और दर्द हुआ। श्रीकृष्ण ने उससे कहा कि जब इन्द्रियाँ इन्द्रिय विषयों से मिलती हैं तो वे सर्दी-गर्मी, सुख-दु:ख (शीतोष्णा सुख दु:खदा) की ध्रुवीयताएं पैदा करती हैं जो अनित्य होती हैं और हमें उन्हें सहना सीखना चाहिए (2.14)। इन अनित्यों को सहना ही आत्म-नियंत्रण है। हम दैनिक जीवन में प्रशंसा और आलोचना की ध्रुवों से बहुत प्रभावित होते हैं जबकि उनको रोकने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए, श्रीकृष्ण बार-बार उनके साथ तादात्म्य करने के बजाय उनसे पार पाने पर जोर देते हैं। सफलता के बारे में हमारी सामान्य समझ यह है कि जो हम चाहते हैं उसे प्राप्त करना। लेकिन श्रीकृष्ण के अनुसार, यह शांति और आत्म-संयम प्राप्त करना है जो परमात्मा के साथ एकात्म हो जाना है। आध्यात्मिक पथ पर हमारी प्रगति को जाँचने के लिए इस पैमाने का उपयोग किया जा सकता है।
Embed this episode
NOW PLAYING
112. भीतर के शत्रु से सावधान
No transcript for this episode yet
Similar Episodes
No similar episodes found.