EPISODE · Feb 5, 2025 · 3 MIN
162. छठी इंद्रिय
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीकृष्ण कहते हैं, "आदित्यों में मैं विष्णु हूँ; मैं चमकता हुआ सूर्य और चंद्रमा हूँ (10.21)। वेदों में, मैं सामवेद हूँ; मैं वसुव (इंद्र) हूँ; इंद्रियों में मैं मन हूँ; प्राणियों में मैं चेतना हूँ (10.22)। रुद्रों में मैं शंकर हूँ; मैं कुबेर हूँ (10.23)। मैं बृहस्पति हूँ; समस्त जलाशयों में मैं समुद्र हूँ” (10.24)। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वह सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा है (10.20) और साथ ही एक पदानुक्रम दिया था कि आत्मा बुद्धि से श्रेष्ठ है; बुद्धि मन से श्रेष्ठ है; मन इंद्रियों से श्रेष्ठ है (3.42)। लेकिन यहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह इंद्रियों में मन हैं जिसे समझने की जरूरत है। ऐसा कहा जाता है कि 'समूचा, अपने भागों के जोड़ से बड़ा होता है'। इसकी झलक 'एक और एक ग्यारह' की कहावत में भी मिलती है। कुल मिलाकर दो कान ध्वनि की दिशा का बोध करा सकते हैं; दो आंखें मिलकर गहराई का बोध पैदा कर सकती हैं। मन को देखने का एक तरीका यह है कि यह इंद्रियां जैसे कान, आंख आदि का सामान्य जोड़ है। दूसरा तरीका यह है कि इसे 'समूचे इंद्रियों' के रूप में देखें, जहां एक साथ ये इंद्रियां सभी इंद्रियों के जोड़ से कहीं अधिक क्षमता रखती हैं। आधुनिक संदर्भ में इसे 'इंद्रियों से परे' या 'छठी इंद्रिय' भी कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस छठी इंद्रिय की बात कर रहे हैं जब वे कहते हैं कि वह इंद्रियों में मन हैं। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "शब्दों में मैं ओंकार हूँ; अचल वस्तुओं में हिमालय हूँ (10.25)। सभी वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँ; मैं नारद हूँ; मैं मुनि कपिल हूँ (10.26)। मैं सभी हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा हूँ" (10.27)। उपरोक्त सभी वर्णनों में एक सामान्य सूत्र यह है कि उपलब्ध विकल्पों में से वह सबसे बड़ी संभावना का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे 'चरम प्रदर्शन' कहा जाता है जैसे कि पानी की बूंदों का समुद्र बन जाना।
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