EPISODE · Sep 18, 2025 · 4 MIN
192. ‘वह’ हैं भी और नहीं भी
from Gita Acharan · host Siva Prasad
जीवित रहने के लिए जिज्ञासा आवश्यक है। वर्त्तमान के संदर्भ में,अपने व्यावसायिक और व्यक्तिगत जीवन में अद्यतन (up-to-date)रहने की उम्मीद की जाती है। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि क्या जानने योग्य है (13.1)। इसके बारे में, श्रीकृष्ण ने पहले उल्लेख किया था कि "जब 'उसे'जान लेते हैं तो जानने के लिए कुछ भी नहीं बचता" (7.2)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है उसको भलीभांति कहूंगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है न असत् ही (13.13)। वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है (13.14)। वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगनेवाला है" (13.15)। मृत्यु का भय हमारे सभी भयों का आधार है। प्रतिष्ठा या संपत्ति की हानि भी एक प्रकार की मृत्यु है। श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि हम परम आनंद की अवस्था पाते हैं क्योंकि एक बार 'उसे' जान लेने के पश्चात हम सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाते हैं। इससे पहले, श्रीकृष्ण ने 'सत्' को शाश्वत बताया और 'असत्' को वह जो अतीत में नहीं था और जो भविष्य में नहीं होगा (2.16); और उनके बीच अंतर करने को सीखने के लिए कहा। इस जटिलता को समझने के लिए अक्सर रस्सी-सांप समरूपता का हवाला दिया जाता है। अब श्रीकृष्ण कहते हैं, वह 'सत्' और 'असत्' दोनों हैं। पहला कदम इन दोनों को अलग करने की क्षमता को विकसित करना है। यह एहसास करना है कि वह दोनों ही हैं। इसी प्रकार वह सगुण (रूप) और निर्गुण (निराकार) दोनों है। सर्वत्र आँख और कान होने के कारण वे सबकुछ अनुभव कर सकते हैं। सर्वत्र हाथ होने के कारण उनके मददगार हाथ उन सभी लोगों के लिए उपलब्ध हैं जो श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी शरण में आते हैं। हमारा दिमाग विभाजन करने के लिए प्रशिक्षित है जबकि विरोधाभासों में एकता ही 'जानने योग्य' है। यह सभी रंगों के मिश्रण से सफेद रंग का बनना या प्रकाश की तरंग-कण द्वैतता के जैसा है।
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जीवित रहने के लिए जिज्ञासा आवश्यक है। वर्त्तमान के संदर्भ में,अपने व्यावसायिक और व्यक्तिगत जीवन में अद्यतन (up-to-date)रहने की उम्मीद की जाती है। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि क्या जानने योग्य है (13.1)। इसके बारे में, श्रीकृष्ण ने पहले उल्लेख किया था कि "जब 'उसे'जान लेते हैं तो जानने के लिए कुछ भी नहीं बचता" (7.2)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है उसको भलीभांति कहूंगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है न असत् ही (13.13)। वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है (13.14)। वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगनेवाला है" (13.15)। मृत्यु का भय हमारे सभी भयों का आधार है। प्रतिष्ठा या संपत्ति की हानि भी एक प्रकार की मृत्यु है। श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि हम परम आनंद की अवस्था पाते हैं क्योंकि एक बार 'उसे' जान लेने के पश्चात हम सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाते हैं। इससे पहले, श्रीकृष्ण ने 'सत्' को शाश्वत बताया और 'असत्' को वह जो अतीत में नहीं था और जो भविष्य में नहीं होगा (2.16); और उनके बीच अंतर करने को सीखने के लिए कहा। इस जटिलता को समझने के लिए अक्सर रस्सी-सांप समरूपता का हवाला दिया जाता है। अब श्रीकृष्ण कहते हैं, वह 'सत्' और 'असत्' दोनों हैं। पहला कदम इन दोनों को अलग करने की क्षमता को विकसित करना है। यह एहसास करना है कि वह दोनों ही हैं। इसी प्रकार वह सगुण (रूप) और निर्गुण (निराकार) दोनों है। सर्वत्र आँख और कान होने के कारण वे सबकुछ अनुभव कर सकते हैं। सर्वत्र हाथ होने के कारण उनके मददगार हाथ उन सभी लोगों के लिए उपलब्ध हैं जो श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी शरण में आते हैं। हमारा दिमाग विभाजन करने के लिए प्रशिक्षित है जबकि विरोधाभासों में एकता ही 'जानने योग्य' है। यह सभी रंगों के मिश्रण से सफेद रंग का बनना या प्रकाश की तरंग-कण द्वैतता के जैसा है।
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192. ‘वह’ हैं भी और नहीं भी
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