EPISODE · Nov 30, 2025 · 3 MIN
201. माता और पिता
from Gita Acharan · host Siva Prasad
भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का शीर्षक 'गुण त्रय विभाग योग' अर्थात्गुणों से परे जाकर एकता है। यह पहले बताए गए प्रकृति के वर्णनका विस्तार है। इस अध्याय में, श्रीकृष्ण प्रकृति से उत्पन्न गुणों के बारे में और ज्ञान प्राप्त करके उनको कैसे पार किया जाए इस विषय में गहराई से बताते हैं।श्रीकृष्ण कहते हैं, "अब मैं पुनः तुम्हें सभी ज्ञानों में उत्तम उस परम ज्ञान के विषय में बताऊँगा, जिसे जानकर सभी महान संतों ने परम सिद्धि प्राप्त की है(14.1)। वे जो इस ज्ञान की शरण लेते हैं, मेरे साथ एकीकृत होंगे और वे सृष्टि के समय न तो पुनः जन्म लेंगे और न ही प्रलय के समय उनका विनाश होगा" (14.2)।सबसे पहले, श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं फिर से समझाऊंगा, जो पहले बताई गई बातों को दोहराने की ओर संकेत करता है। कहा जाता है कि बार-बार दोहराना ही महारथ की कुंजी है। उदाहरण के लिए, किसी पुस्तक की विषय-वस्तु एक ही होती है, फिर भी बार-बार पढ़ने से हमारी समझ बढ़ती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हर बार पढ़ने के साथ हमारी आत्मसात करने की क्षमता बढ़ती जाती है। दूसरी बात, यह श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच एक जीवंत संवाद था। जब भी श्रीकृष्ण को लगता कि अर्जुन कुछ बातें समझनहीं पा रहा है, तो वे करुणावश उसे दोहरा देते हैं।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, "मेरा गर्भ महत्-ब्रह्म (मूल प्रकृति) है, जिसमें मैं बीज स्थापित करता हूँ; यह सभी प्राणियों के जन्म का कारण है (14.3)। सभी गर्भों में जो भी रूप उत्पन्न होते हैं, प्रकृति उनकी गर्भ (माता) है, और मैं बीज देने वाला पिता हूँ" (14.4)। प्रकृति समस्त सृष्टि की माता है और परमात्मा पिता हैं। परमात्मा का एक छोटा सा अंश (बीज), जिसे आत्मा कहते हैं, प्रकृति को दिया जाता है ताकि प्रत्येक जीव फल-फूल सके। बीज विकास का प्रतीक है जो विभिन्न जीवन रूपों के विकास का मूल है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें दूसरों में स्वयं को, स्वयंमें दूसरों को देखने और अंततः उन्हें सर्वत्र देखने के लिए कहा था, क्योंकि सभी प्राणी उनके ही 'बीज' हैं।
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