EPISODE · Jul 9, 2026 · 4 MIN
232. शुभ कर्म
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीकृष्ण कहते हैं ‘ॐ तत् सत्’ -यह तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म के त्रिविध प्रतीक हैं। वे आगे ‘सत्’ शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं “ ‘सत्’ शब्द का अर्थ शाश्वत सत्य और शुभ है। हे अर्जुन! यह शब्द शुभ कर्मों को वर्णित करने के लिए भी प्रयुक्त होता है। जो व्यक्ति यज्ञ, तप और दान में निष्ठापूर्वक स्थित होता है, उसे भी ‘सत्’ कहा जाता है। और इस प्रकार जो भी कर्म इन उद्देश्यों के लिए किया जाता है, वह ‘सत्’ कहलाता है (17.26-27)। परंतु यज्ञ, दान या तप जैसे कर्म यदि श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है।ऐसे कर्म न इस लोक के लिए उपयोगी होते हैं, न ही परलोक के लिए” (17.28)।श्रीकृष्ण ने ‘सत्’ और ‘असत्’ का वर्णन भगवद्गीता के प्रारम्भ में ही किया था। उन्होंने कहा कि सत् (सत्य / वास्तविक) कभी नष्ट नहीं होता और असत् (अवास्तविक / मिथ्या) का कोई अस्तित्व नहीं होता। इन दोनों के स्वरूप को केवल ज्ञानी पुरुष ही भली-भांति पहचान सकते है (2.16)।‘असत्’ वह है -‘जो न तो अतीत में था और न ही भविष्य में रहेगा’। उदाहरणके लिए इन्द्रिय-सुख, भावनाएँ या भौतिक वस्तुएँ -ये न पहले थीं, न आगे रहेंगी; अतः ये असत् हैं। दूसरे, रस्सी-साँप का उदाहरण यह समझाने के लिए दिया जाता है कि ‘असत्’ का अस्तित्व ‘सत्’ पर निर्भर करता है जैसे रस्सी के बिना साँप का भ्रम भी नहीं होता। एक अन्य उदाहरण दर्पण में दिखाई देने वाला प्रतिबिंब है। जब हम दर्पण के सामने खड़े होते हैं तो उसमें हमारी छवि दिखाई देती है। यह प्रतिबिंब हमारे बिना स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकता। हम ‘सत्’ हैं -अर्थात् मूल और वास्तविक सत्ता -जबकि दर्पण में दिखाई देने वाली छवि ‘असत्’ है जिसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।श्रीकृष्ण यहाँ एक और मार्ग प्रस्तुत करते हैं जब वे कहते हैं कि जो भी कर्म जैसे यज्ञ, दान या तप, श्रद्धा के बिना किया जाता है, वह ‘असत्’ कहलाता है। अर्थात् ‘सत् कर्म’ करने के लिए श्रद्धा सबसे आवश्यक तत्व है। यह मार्ग एक और व्याख्या प्रस्तुत करता है।श्रद्धा का अर्थ है अविचल भक्ति जहाँ किसी भी कर्म का परिणाम परमात्माका आशीर्वाद मानकर स्वीकार किया जाता है। दूसरे शब्दों में, यह कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना है (2.47)। यह हमारे द्वारा किए गए किसी भी कर्म में कर्तापन की भावना का त्याग करने से भी प्राप्त होता है। जब कर्तापन और कर्मफल की इच्छा, दोनों का त्याग कर दिया जाता है तब प्रत्येक कर्म शुभ बन जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण उसे ‘शुभ कर्म’ कहते हैं।
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