234. आसक्ति का त्याग
from Gita Acharan Hosted by Siva Prasad
त्याग के विषय में चार प्रकार के मतों या विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं “अब त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। त्याग तीन प्रकार के होते हैं” (18.4)। आगे के श्लोकों में वे स्पष्ट करते हैं कि त्याग भी तीन प्रकार का होता है -सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “यज्ञ, दान, तथा तपस्या पर आधारित कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ,दान तथा तपस्या वास्तव में महात्माओं (विद्वानों) को भी शुद्ध करते हैं (18.5)। ये सब कार्य आसक्ति और फल की कामना से रहित होकर संपन्न करने चाहिए। यह मेरा स्पष्ट और अंतिम निर्णय है” (18.6)।अज्ञानता के स्तर पर मनुष्य भौतिक वस्तुएँ, शक्ति, प्रसिद्धि और प्रभाव एकत्रित करता रहता है। त्याग उसका अगला चरण है। कोई इसे लेन-देन के रूप में देख सकता है -जैसे प्रसिद्धि पाने या पुण्य अर्जित करने के लिए दान देना आदि। कभी-कभी त्याग निराशा की अवस्था में भी होता है जैसे अर्जुन का कुरुक्षेत्र के युद्ध को त्यागने का विचार। हम सभी अपने जीवन में ऐसे द्वन्द्वों से गुजरते हैं, इसलिए भगवद्गीता में त्याग और संन्यास के विषय में विस्तार से कहा गया है।श्रीकृष्ण ने कई अवसरों पर संन्यास के विषय में कहा है। उन्होंने बताया कि केवल संन्यास करने मात्र से सिद्धि (परिपूर्णता) प्राप्त नहीं होती (3.4); मनुष्यको सदैव नित्य संन्यासी होना चाहिए अर्थात् वह जो न तो घृणा करता है और न ही इच्छा करता है; जो द्वन्द्वों से मुक्त (द्वन्द्वातीत) है और जो सहज ही सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है (5.3); वही संन्यासी और योगी है जो अपने नियत कर्म को बिना कर्मफल पर निर्भर हुए करता है न कि वह जो केवल कर्मों का त्याग करता है (6.1)।ये शिक्षाएँ यहाँ पुनः प्रतिध्वनित होती हैं जब श्रीकृष्ण कहते हैं यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का पालन आसक्ति रहित होकर किया जाना चाहिए। वे यहाँ भौतिक वस्तुओं से होने वाले मानसिक बंधनों की ओर संकेत कर रहे हैं। इसी प्रकार कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना भगवद्गीता की एक अन्य मूल शिक्षा है।
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