244. वर्गीकरण की विशेषताएँ
from Gita Acharan Hosted by Siva Prasad
जीवन का विकास, विभाजनों और भिन्नताओं का परिणाम है। किंतुइन विभाजनों के पीछे एक ‘एकत्व’ विद्यमान है जैसे विभिन्न मोतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला अदृश्य धागा (7.7)। उद्देश्य यह है कि हम अपने चारों ओर दिखाई देने वाले अव्यवहारिक और तर्कहीन विभाजनों के मध्य उस ‘एकत्व’को अनुभव करने की क्षमता विकसित करें। यह क्षमता ‘एकत्व’ की जागरूकता और अपने कर्मों में संतुलन स्थापित करने के माध्यम से विकसित की जा सकती है (2.38, 6.16)।श्रीकृष्ण ने गुणों और कर्मों के आधार पर समाज के चार वर्गों का उल्लेख किया है। वे कहते हैं “शांति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक और आस्था; ये सब गुण ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक गुण हैं (18.42)। पराक्रम, शक्ति, धैर्य, कौशल, युद्ध से पीछे न हटना, दानशीलता और नेतृत्व क्षमता; ये क्षत्रियों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्महैं (18.43)। कृषि, गोपालन और वाणिज्य; ये वैश्यों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्म हैं। सेवा से संबंधित कार्य शूद्रों के स्वाभाविक कर्म हैं”(18.44)।ये वर्गीकरण न तो जन्म पर आधारित हैं, न ही इनमें कोई श्रेणीभेदहै, और न ही ये किसी की योग्यता का सूचक हैं। जैसे गुणों के संदर्भ में लक्ष्यउन्हें अतिक्रमित कर ‘गुणातीत’ होना है, वैसे ही यहाँ भी चुनौती इनसामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर ‘एकत्व’ की अनुभूति प्राप्त करना है -विशेषकर तब, जब हम स्वयं को इनमें से किसी एक वर्ग के साथ जोड़कर देखते हैं।दूसरा, कभी हम ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं; कभी शक्ति या धन अर्जित करने का। कभी-कभी हम अपने परिवार, मित्रों या सहकर्मियों आदि की सेवा करते हैं। यह दर्शाता है कि हम समय-समय पर चारों वर्गों के गुणों को प्रदर्शित करते रहते हैं। तीसरा, यद्यपि कोई एक गुण हमारे जीवन में प्रमुख हो सकता है,फिर भी हम प्रायः एक ही दिन में विभिन्न गुणों से होकर गुजरते हैं। यही बात इन सामाजिक वर्गों पर भी लागू होती है।चौथा, पिछली शताब्दी में विश्व कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक और फिर सेवा-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ गया है। जैसे-जैसे बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, कोई भी एक वर्गीकरण या गुण न तो प्रमुख माना जा सकता है और न ही पूर्ण।
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