245. कर्म ही पूजा है
from Gita Acharan Hosted by Siva Prasad
सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है।श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है। आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से होता था। इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि अपने स्वभाव से उत्पन्न स्वकर्म को पूर्ण निष्ठा से करते हुए मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर सकता है। वास्तव में महत्व इस बात का है कि चाहे हम किसी भी प्रकार का कार्य करें, उसे अपने सर्वोत्तम रूपमें करें।दूसरे, हमारा विभाजनकारी मन श्रेणियाँ बनाने का अभ्यस्त है और ये श्लोक इस भ्रमित धारणा को दूर करते हैं कि वर्ण व्यवस्था श्रेणीबद्ध है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मों में कोई श्रेणियाँ नहीं हैं -केवल अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार किए गए स्वकर्म का पालन करके भी मनुष्य सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त कर सकता है।तीसरे, श्रीकृष्ण ने पहले यह उपदेश दिया था कि ज्ञानी व्यक्ति को उन अज्ञानियों को विचलित नहीं करना चाहिए जो कर्मों से आसक्त हैं (3.26)। उपर्युक्त श्लोक इस उपदेश का समर्थन करते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनेगुणों से उत्पन्न कर्मों के माध्यम से सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इसलिए जो व्यक्ति किसी एक मार्ग से सिद्धि प्राप्त कर चुका है उसे अन्य मार्गों को तुच्छ या हीन नहीं समझना चाहिए।
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