EPISODE · Oct 14, 2026 · 3 MIN
246. एक साधे सब सधै
from Gita Acharan · host Siva Prasad
कहा जाता है कि सृष्टि मात्र एक लीला (दैवी खेल) है और इस खेल को रोचक बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। जैसे फुटबॉल के खेल में यदि गोलपोस्ट बहुत छोटा या बहुत बड़ा हो जाए तो खेल का रोमांच समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार, जन्म के बाद मृत्यु का आना, विभाजन या पृथक्करण का होना -ये सभी सृष्टि के ऐसे रोचक नियम हैं जिन्होंने जीवन के विकास में योगदान दिया और अंततः हमारे जैसे जटिल जीवन-रूपों का निर्माण हुआ। ये विभाजन व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों स्तरों पर विद्यमान हैं -जैसे जाति, धर्म, नस्ल, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर -और ये हमें जीवन के आरंभिक चरण में ही प्रभावित कर देते हैं। चुनौती यह है कि हम इन विभाजनों से ऊपर उठें और इस दिशा में श्रीमद्भगवद्गीता हमारा पथ-प्रदर्शन करती है।ऐसी ही एक विधि है स्वकर्म के प्रति समर्पण। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं“अपने स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि (पूर्णता यामुक्ति) को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्याप्त है” (18.45-18.46)। यह निरन्तर सीखते रहने की प्रक्रिया है, जब तक हम इस प्रक्रिया का आनन्द लेते हैं और दूसरों की सम्पत्ति या शक्ति से विचलित नहीं होते। यदि हमारी प्रसन्नता दूसरों की सेवा करने में है तो हमें उसी मार्ग पर चलते रहना चाहिए -भले ही समाज उसे किसी भी दृष्टि से क्यों न देखे।हमें जो कार्य मिला है उसे अपनी पूरी क्षमता के साथ करते रहना चाहिए। क्षमा जैसे दैवी गुण (16.3) को विकसित करके द्वेष को त्यागकर कर्म करना चाहिए न कि दूसरों के मोहक कर्मों में उलझकर और न ही अपने अतीत के पश्चात्ताप या भविष्य की अपेक्षाओं में बंधकर। स्वकर्म के प्रति ऐसा समर्पण वास्तव में ईश्वर की उपासना ही है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने गीता के प्रसिद्ध श्लोक (2.47) में कहा है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, कर्मफल में नहीं; क्योंकि प्रत्येक कर्म में हमें सिद्धि की ओर ले जाने की क्षमता निहित है।
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