EPISODE · Mar 1, 2023 · 4 MIN
40. कर्तापन की भावना को छोडऩा
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्लोक 2.48 में, श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, तुम आसक्ति / सङ्गं को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित होकर कर्तव्य कर्मों को कर। यह समत्व ही योग कहलाता है। दूसरे शब्दों में, हम जो कुछ भी करते हैं वह सामंजस्यपूर्ण होगा जब हम ध्रुवीयताओं के साथ पहचान करना बंद कर देंगे। हमारे दैनिक जीवन में निर्णयों और विकल्पों की एक श्रृंखला बनी रहती है। हमेशा निर्णय लेने वाला दिमाग उपलब्ध विकल्पों में से चुनता रहता है और श्रीकृष्ण उन्हें (2.38) सुख/दुख, लाभ/हानि, जीत/हार और सफलता/असफलता में वर्गीकृत करते हैं। समत्व का मतलब है इन ध्रुवों को समान मानना, जिसे आमतौर पर उन्हें पार करने के रूप में संदर्भित किया जाता है। जब यह अहसास गहरा होता है, तो मन शक्तिहीन हो जाता है और चुनाव रहित जागरूकता प्राप्त कर लेता है। जब हम नींद में या नशे में होते हैं तो विभाजन करने की क्षमता सहज ही खो देते हैं। लेकिन विभाजन करने के काबिल होने के बावजूद विभाजन नहीं करना ही समत्व है। यह केवल एक प्रेक्षक/दृष्टा बनकर वर्तमान क्षण में जीवित होना है। कर्म करते समय समता प्राप्त करने का व्यावहारिक मार्ग यह है कि कर्तापन को छोडक़र साक्षी बनना। यह पूरी तीव्रता, प्रतिबद्धता, समर्पण, दक्षता और जुनून के साथ किसी नाटक में भूमिका निभाने जैसा है; मूल रूप से दी गई परिस्थितियों में अपना सर्वश्रेष्ठ देना है। इसी तरह जीवन के भव्य मंच पर हमें जो भूमिकाएं दी जाती हैं, उन्हें हमें पूरी लगन के साथ निभाना चाहिए। यह एक पुत्र/पुत्री, पत्नी/पति, माता-पिता, मित्र, कर्मचारी, नियोक्ता, सहकर्मी, पर्यवेक्षक आदि की भूमिका हो सकती है। एक दिन में हम कई अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हैं और प्रत्येक भूमिका को निभाते हुए हमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाहिए, लेकिन यह अच्छी तरह से जानते हुए कि हमारी भूमिका सिर्फ नाटक का एक हिस्सा है। जीवन में हमें जो भूमिकाएं मिली हैं, उन सभी भूमिकाओं में कुछ दिनों के लिए इसका अभ्यास करना शुरू कर सकते हैं और अपने जीवन में आने वाले सामंजस्य को स्वयं देख सकते हैं।
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