EPISODE · May 25, 2023 · 4 MIN
52. समेटना ही बुद्धिमानी
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है’’ (2.58)। श्रीकृष्ण इंद्रियों पर जोर देते हैं क्योंकि यह हमारी अंतरात्मा और बाहरी दुनिया के बीच के प्रवेशद्वार हैं। वे सलाह देते हैं कि हमें अपनी इंद्रियों को वापस लेना चाहिए जब हम खुद को इंद्रियों की विषयों से जुड़ते हुए देखते हैं जैसे कि प्रतीकात्मक कछुआ खतरे का सामना करने पर अपने अंगों को समेट लेता है। इंद्रियों के दो भाग होते हैं। एक इंद्रिय यंत्र है जैसे कि नेत्रगोलक और दूसरा, मस्तिष्क का वह भाग जो नियंत्रक है, जो इस नेत्रगोलक को नियंत्रित करता है। संवेदी बातचीत दो स्तरों पर होती है। एक इन्द्रिय वस्तुओं की लगातार बदलती बाहरी दुनिया और इंद्रिय यंत्र (नेत्रगोलक) के बीच है जो विशुद्ध रूप से स्वचालित है। जब फोटॉन नेत्रगोलक तक पहुंचते हैं तो अपने भौतिक गुणों के अनुसार प्रभाव डालते हैं। दूसरी बातचीत नेत्रगोलक और उसके नियंत्रक के बीच होती है। देखने की इच्छा ही नेत्र के विकास का कारण है और वह इच्छा अभी भी इन्द्रिय के नियंत्रक भाग में विद्यमान है। इसे प्रेरित धारणा के रूप में जाना जाता है जहां हम वही देखते हैं जो हम देखना चाहते हैं और जो हम सुनना चाहते हैं उसे सुनते हैं। जैसे क्रिकेट के खेल में हमें लगता है कि, विपक्ष के पक्ष में अधिक निर्णय लिए जा रहे हैं और इससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि अंपायर अनुचित है। जब श्रीकृष्ण इन्द्रियों का उल्लेख करते हैं, तो वह नियंत्रक भाग के बारे में बात कर रहे हैं जो इन्द्रियों में इच्छा उत्पन्न करता है। इसलिए जब हम अपनी इंद्रियों को शारीरिक रूप से बंद कर देते हैं, तब भी मन अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग हमारी इच्छाओं को जीवित रखने के लिए करता है क्योंकि मन इन सभी नियंत्रकों के संयोजन के अलावा कुछ भी नहीं है। इस वैज्ञानिक श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण हमें इंद्रियोंके भौतिक भाग से नियंत्रक को अलग करने के लिए मार्गदर्शन कर रहे हैं ताकि हम हमेशा उत्तेजक या निराशाजनक बाहरी स्थितियों से परम स्वतंत्रता (मोक्ष) प्राप्त कर सकें। बुद्धिमानी यह जानने में है कि किसी भी स्थिति में कब समेटना है।
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