EPISODE · Jun 25, 2023 · 3 MIN
56. आध्यात्मिकता में कारण और प्रभाव
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘मन प्रसन्न होने पर व्यक्ति के सम्पूर्ण दु:ख नष्ट हो जाते हैं और उस प्रसन्नचित्त कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर परमात्मा में ही भलीभांति स्थिर हो जाती है’’ (2.65)। हमारी धारणा यह है कि, एक बार जब हमारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तो हम संतुष्ट हो जाते हैं और सुख को प्राप्त करते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण हमें पहले संतुष्ट होने के लिए कहते हैं और बाकी अपने आप हो जाता है। उदाहरण के लिए, हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि बुखार, दर्द आदि जैसे लक्षण होने पर हम स्वस्थ नहीं हैं। इन लक्षणों का दमन हमें तब तक स्वस्थ नहीं करेगा जब तक इन लक्षणों के जड़ का इलाज नहीं किया जाता है। वहीं दूसरी ओर पौष्टिक आहार, अच्छी नींद, फिटनेस व्यवस्था आदि हमें अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं। इसी तरह, भय, क्रोध और द्वेष, जो दु:ख का हिस्सा हैं, संतोष की कमी के संकेत हैं और उनका दमन हमें अपने आप संतुष्ट नहीं करेगा। इन संकेतों को दबाकर स्वीकार्य व्यवहार करने के लिए कई त्वरित सुधारों का अभ्यास किया जाता है। लेकिन यह दमन बाद में और अधिक जोश के साथ इन चीजों को वापस लाता है। उदाहरण के लिए, दफ्तर में अधिकारी के खिलाफ दबा हुआ गुस्सा अक्सर अपने साथियों या परिवार के सदस्यों पर निकल जाता है। आनंद के मार्ग में शामिल हैं, दुनिया की ध्रुवीय प्रकृति के बारे में जागरूक होना; कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना; सजग रहना कि हमारे कार्यों, विचारों और भावनाओं के लिए हम कर्ता नहीं बल्कि साक्षी हैं। देही/आत्मा जो हमारा अव्यक्त भाग है हमेशा संतुष्ट रहता है। रस्सी-सांप सादृश्य में भ्रमपूर्ण सांप की तरह हम प्रकट के साथ पहचान करते हैं, जो दु:ख का कारण बन जाता है। श्रीकृष्ण कहीं और बताते हैं कि आत्मा के साथ तादात्म्य होने से दु:ख दूर हो जाता है और इस अवस्था को वे आत्मरमन या आत्मवान होना कहते हैं (2.45)। यह न तो दु:ख का दमन है और न ही अभिव्यक्ति है बल्कि उन्हें देखने और पार करने में सक्षम होने के बारे है।
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