EPISODE · Aug 9, 2023 · 3 MIN
61. अनिश्चित मन के लिए निश्चितता
from Gita Acharan · host Siva Prasad
गीता के तीसरे अध्याय को कर्मयोग के रूप में जाना जाता है, जो कि श्लोक 2.71 का विस्तार है, जहां श्रीकृष्ण ने कहा कि ‘निर्-मम’ और ‘निर-अहंकार’ शाश्वत अवस्था को प्राप्त करने का मार्ग है। अर्जुन एक संदेह प्रस्तुत करते हैं, यदि आप बुद्धि को श्रेष्ठ मानते हैं, तो आप मुझे युद्ध के भयानक कार्य में क्यों लगाते हैं (3.1)। आप मुझे निश्चय के साथ बताएं कि मेरे कल्याण के लिए सबसे अच्छा क्या है, उलझाने वाले वाणी से मुझे भ्रमित किए बिना (3.2)। विभाजन से हमेशा तर्कहीन और आवेगपूर्ण निर्णय होता है क्योंकि यह सत्य पर आधारित नहीं होता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने विभाजन को छोडऩे की सलाह दी (2.50)। अर्जुन ने सिर्फ एक कारण के आधार पर युद्ध न करने का निर्णय लिया कि वह युद्ध में अपने रिश्तेदारों को मारने में कोई अच्छाई नहीं देखता (1.31)। इसके बाद, वह अपने निर्णय के समर्थन में कई औचित्य प्रस्तुत करता है। वर्तमान का प्रश्न भी बेहतर समझ की तलाश के बजाय उसी औचित्य का एक हिस्से जैसा लगता है। हमारी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है क्योंकि हमारे होश में आने से बहुत पहले ही हमारी पहचान धर्म, जाति, पारिवारिक स्थिति, राष्ट्रीयता, लिंग आदि के आधार पर बनाई गयी और जीवन भर हम उस पहचान को सही ठहराने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। दूसरे, अर्जुन श्रीकृष्ण से निश्चितता की उम्मीद कर रहे हंै। भले ही अनित्यता इस भौतिक जगत की रीत है, हम सभी निश्चितता की आशा करते हैं क्योंकि यह हमें आराम देता है। तर्कसंगत निर्णय के लिए सबूतों को इकठ्ठा करने की आवश्यकता होती है जिसके लिए प्रतीक्षा और धैर्य जरूरी है। इस कारण से हम जल्द ही वर्गीकरण की ओर बढ़ते हैं। लेकिन निश्चितता अपने स्वयं के जीवन के अनुभवों से आती है और इसे कठिन तरीके से अर्जित करना पड़ता है। हम सभी को इस राह पर खुद चलना होगा क्योंकि यह अनुभव किताबों से या दूसरों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। यह गाड़ी या साइकिल चलाने जैसा है जो हर एक का अपना अनुभव होता है।
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