EPISODE · Oct 1, 2023 · 3 MIN
67. सम्बद्ध और असम्बद्ध
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीकृष्ण हमें विश्वास दिलाते हैं कि अनासक्ति, जो की आसक्ति और विरक्ति को पार करना है, से कर्म करने से व्यक्ति परम अवस्था को प्राप्त करता है (3.19) और राजा जनक का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने केवल कर्म से ही सिद्धि प्राप्त की थी (3.20)। श्रीकृष्ण इस बात पर जोर देते हैं कि एक राजा जो विलासिता में डूबा रहता है और उनकी कई जिम्मेदारियां होती हैं, वह भी अनासक्ति से सभी कार्यों को करते हुए सर्वोच्च प्राप्त कर सकता है। इसका अर्थ यह है कि हम भी इसी तरह हमारी परिस्थितियों के बावजूद सर्वोच्च तक पहुंच सकते हैं। इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण होंगे जहां दो प्रबुद्ध लोगों ने बातचीत की हो। ऐसी एक बातचीत राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच है, जिसे अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है, जिसे साधकों के लिए सर्वोत्तम में से एक माना जाता है। कहते हैं कि एक बार एक गुरु ने अपने शिष्यों में से एक, जो लंगोटी और एक भीख के कटोरे के साथ रहते थे, को अंतिम पाठ के लिए राजा जनक के पास भेजा। वह जनक के पास आता है और सोचता है कि उसके गुरु ने उसे इस आदमी के पास क्यों भेजा जो विलासिता में डूबा रहता है लेकिन वह महल में रह जाता है। एक सुबह, जनक उसे नहाने के लिए पास की एक नदी में ले जाते हैं। डुबकी लगाने के दौरान उन्हें खबर मिलती है कि महल जल गया है। छात्र अपने लंगोटी के लिए चिंतित हो जाता है जबकि जनक अविचलित रहते हैं। उसी पल उस छात्र को यह बोध हुआ कि एक साधारण लंगोटी से लगाव भी लगाव है और इसे छोडऩे की जरूरत है। अनासक्ति से कर्म करना ही गीता का मूल उपदेश है। यह सम्बद्ध होने के साथ-साथ असम्बद्ध होने की स्थिति है। भौतिक दुनिया में, व्यक्ति को पूरी तरह से सम्बद्ध होकर दी गई स्थिति में अपना सर्वोत्तम प्रदर्शन करना है। साथ ही, वह आंतरिक रूप से असम्बद्ध है क्योंकि इस तरह के कार्यों के परिणाम उसे प्रभावित नहीं करेंगे। परिणाम, किए गए प्रयासों के अनुसार हो सकता है या यह पूरी तरह से विपरीत हो सकता है और किसी भी परिस्थिति में, वह न तो चिंतित है और न ही परेशान है। यह ‘कार्य-जीवन’ संतुलन बनाए रखने की कुंजी है।
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