EPISODE · Oct 18, 2023 · 3 MIN
69. अभिनेता के साथ-साथ दर्शक भी
from Gita Acharan · host Siva Prasad
हमारे दैनिक जीवन में, हम कुछ कर्मों से जुड़ जाते हैं, जिन्हें हम पसंद करते हैं, जिसे ‘आसक्ति’ के नाम से वर्णित किया जाता है या हम कुछ कर्मों से नफरत की वजह से दूर हो जाते हैं जिसे ‘विरक्ति’ के नाम से वर्णित किया जाता है। परन्तु, श्रीकृष्ण एक तीसरी अवस्था का उल्लेख करते हैं, जिसे ‘अनासक्ति’ कहते हैं, जो आसक्ति और विरक्ति को पार करना है। उनका कहना है कि, ‘‘कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते है, अनासक्त विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे’’ (3.25)। आसक्ति और विरक्ति पर आधारित कर्म हमें दु:खी कर सकते हैं। किसी प्रियजन (आसक्ति) की उपस्थिति हमें खुशी देती है और उनकी अनुपस्थिति हमें दु:खी करती है। इसी प्रकार, घृणा करने वाले (विरक्ति) की उपस्थिति हमें दु:खी करती है और उनकी अनुपस्थिति से राहत मिलती है। इसलिए, आसक्ति या विरक्ति दोनों हमें सुख और दु:ख की ध्रुवों के बीच झुलाने में सक्षम हैं। इसलिए, श्रीकृष्ण हमें परामर्श देते हैं कि किसी भी कार्य को करते समय, दोनों को पार कर अनासक्त बनें। संसार के कल्याण को करुणा के समान समझा जा सकता है जो अनासक्ति के साथ कर्म करने पर उभरकर आती है। जब आसक्ति या विरक्ति के साथ कर्म किया जाता है, तो यह एक कचरा ट्रक की तरह है जो हर जगह गंदगी फैलाती है, जिसकी वजह से समाज को क्षति पहुँचती है। अनासक्त नाटक में एक कलाकार होने और एक ही समय में दर्शक होने जैसा है। एक कलाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह उसे दी गई भूमिका में समर्पण के साथ और अपनी सर्वोत्तम क्षमताओं के साथ कर्म करे। इसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को संबंधित कार्य क्षेत्र में अपने कौशल, ज्ञान आदि को बढ़ाते रहना चाहिए। साथ ही दर्शकगण में बैठे नाटक का अवलोकन करते हुए दर्शकों का हिस्सा भी होना चाहिए। जबकि अभिनेता का हिस्सा बाहरी दुनिया में हमारा कर्तव्य है, दर्शक हमारे आंतरिक स्व के लिए है। गुणों से ही कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। कर्म करते समय अनासक्ति का अभ्यास किया जाना चाहिए इस एहसास के साथ कि जब हम इस प्रक्रिया में महारत हासिल कर लेते है तो हम समझ सकते हैं कि गीता कार्यान्वित हो गयी है।
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