EPISODE · May 13, 2024 · 3 MIN
79. समय से परे
from Gita Acharan · host Siva Prasad
श्रीमद्भगवद्गीता दो स्तरों का एक सुसंगत समिश्रण है और हमें गीता को समझने के लिए इसके बारे में जागरूक होने की आवश्यकता है। कभी-कभी श्रीकृष्ण मित्र या मार्गदर्शक के रूप में अर्जुन से व्यवहार करके मनुष्यों के सामने आने वाली दैनिक समस्याओं को समझाते हैं। कभी-कभी वह परमात्मा के रूप में आते हैं और उस अवस्था में वह कहते हैं कि मैंने यह अविनाशी योग विवस्वत को दिया था, जो उत्तराधिकार में राज-ऋषियों को सौंप दिया गया था (4.1) और समय के साथ यह योग लुप्त हो गई थी (4.2)। विवस्वत का अनुवाद सूर्य-भगवान के रूप में किया गया है, जो प्रकाश का एक रूपक है। यह स्वीकार किया जाता है कि इस ब्रह्माण्ड की शुरुआत प्रकाश से हुई और बाद में पदार्थ का गठन हुआ। मगर श्रीकृष्ण संकेत कर रहे हैं कि वे प्रकाश से भी पहले थे। श्रीकृष्ण राज-ऋषियों को संदर्भित करते हैं जो समय के विभिन्न बिंदुओं पर प्रबुद्ध लोगों के अलावा और कुछ नहीं हैं। यह ज्ञान लुप्त हो गया क्योंकि समय के साथ यह एक अनुभवात्मक स्तर से कर्मकांड या अनुष्ठान में बदल गया। अभ्यास कम और उपदेश अधिक हो गया एवं धर्मों और संप्रदायों का आकार ले लिया। अर्जुन प्रश्न करते हैं कि श्रीकृष्ण ने सूर्य को यह कैसे सिखाया क्योंकि उनका जन्म हाल ही में हुआ है (4.4)। श्रीकृष्ण जवाब देते हैं कि मेरे और आपके कई जन्म हुए और आप उनके बारे में नहीं जानते, जबकि मैं जानता हूँ (4.5)। अर्जुन का यह प्रश्न मानवीय स्तर पर बहुत स्वाभाविक और तार्किक है। इस स्तर पर, हम जन्म और मृत्यु का अनुभव करने के लिए समय के नियंत्रण में रहते हैं। जन्म से पहले क्या था और मृत्यु के बाद क्या होगा, इसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है। श्रीकृष्ण का उत्तर परमात्मा के स्तर पर है जो समय से परे है। इससे पहले, श्रीकृष्ण ने आत्मा के बारे में समझाया था जो शाश्वत है और भौतिक शरीरों को बदल देती है जैसे कि हम पुराने कपड़ों को त्याग देते हैं। जो कोई भी उस शाश्वत अवस्था तक पहुँच जाता है वह समय से परे है। उदाहरण के लिये एक फूल को अपनी खिलने की शक्ति का पता नहीं होता है जबकि यह शक्ति पहले भी थी और फूल के जीवन के बाद भी रहेगी।
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