EPISODE · Apr 16, 2024 · 3 MIN
Agar Tum Meri Jagah Hotey | Nirmala Putul
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अगर तुम मेरी जगह होते | निर्मला पुतुल ज़रा सोचो, कितुम मेरी जगह होतेऔर मैं तुम्हारीतो, कैसा लगता तुम्हें?कैसा लगताअगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी मेंहोता तुम्हारा गाँवऔर रह रहे होते तुमघास-फूस की झोपड़ियों मेंगाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथऔर बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी मेंदेखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरातो, कैसा लगता तुम्हें?कैसा लगता?अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ताकोस-भर दूर से ढोकर झरनों से पानीऔर घर का चूल्हा जलाने के लिएतोड़ रहे होते पत्थरया बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, या फिरअपनी खटारा साइकिल परलकड़ियों का गट्टर लादेभाग रहे होते बाज़ार की ओर सुबह-सुबहनून-तेल के जोगाड़ में!कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चेगाय, बैल, बकरियों के पीछे भागतेबगाली कर रहे होतेऔर तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाएकिसी स्कूल जाते बच्चे को?ज़रा सोचो न, कैसा लगता?अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठीचाय सुड़क रही होती चार लोगों के बीचऔर तुम सामने हाथ बाँधे खड़ेअपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होतेकिसी काम के लिएबताओ न कैसा लगता?जब पीठ थपथपाते हाथअचानक माँपने लगते माँसलता की मात्राफ़ोटो खींचते, कैमरों के फ़ोकसहोंठो की पपड़ियों से बेख़बरकेंद्रित होते छाती के उभारों परसोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,कि अगर किसी पंक्ति में तुमसबसे पीछे होतेऔर मैं सबसे आगे, और तो औरकैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होतेऔर चिपटी होती तुम्हारी नाकपाँवों में बिवाई होती?और इन सबके लिए कोई फब्ती कसलगाता ज़ोरदार ठहाकाबताओ न कैसा लगता तुम्हें...?कैसा लगता तुम्हें...
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अगर तुम मेरी जगह होते | निर्मला पुतुल ज़रा सोचो, कितुम मेरी जगह होतेऔर मैं तुम्हारीतो, कैसा लगता तुम्हें?कैसा लगताअगर उस सुदूर पहाड़ की तलहटी मेंहोता तुम्हारा गाँवऔर रह रहे होते तुमघास-फूस की झोपड़ियों मेंगाय, बैल, बकरियों और मुर्गियों के साथऔर बुझने को आतुर ढिबरी की रोशनी मेंदेखना पड़ता भूख से बिलबिलाते बच्चों का चेहरातो, कैसा लगता तुम्हें?कैसा लगता?अगर तुम्हारी बेटियों को लाना पड़ताकोस-भर दूर से ढोकर झरनों से पानीऔर घर का चूल्हा जलाने के लिएतोड़ रहे होते पत्थरया बिछा रहे होते सड़क पर कोलतार, या फिरअपनी खटारा साइकिल परलकड़ियों का गट्टर लादेभाग रहे होते बाज़ार की ओर सुबह-सुबहनून-तेल के जोगाड़ में!कैसा लगता, अगर तुम्हारे बच्चेगाय, बैल, बकरियों के पीछे भागतेबगाली कर रहे होतेऔर तुम, देखते कंधे पर बैग लटकाएकिसी स्कूल जाते बच्चे को?ज़रा सोचो न, कैसा लगता?अगर तुम्हारी जगह मैं कुर्सी पर डटकर बैठीचाय सुड़क रही होती चार लोगों के बीचऔर तुम सामने हाथ बाँधे खड़ेअपनी बीमार भाषा में रिरिया रहे होतेकिसी काम के लिएबताओ न कैसा लगता?जब पीठ थपथपाते हाथअचानक माँपने लगते माँसलता की मात्राफ़ोटो खींचते, कैमरों के फ़ोकसहोंठो की पपड़ियों से बेख़बरकेंद्रित होते छाती के उभारों परसोचो, कि कुछ देर के लिए ही सोचो, पर सोचो,कि अगर किसी पंक्ति में तुमसबसे पीछे होतेऔर मैं सबसे आगे, और तो औरकैसा लगता, अगर तुम मेरी जगह काले होतेऔर चिपटी होती तुम्हारी नाकपाँवों में बिवाई होती?और इन सबके लिए कोई फब्ती कसलगाता ज़ोरदार ठहाकाबताओ न कैसा लगता तुम्हें...?कैसा लगता तुम्हें...
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