PODCAST · arts
Pratidin Ek Kavita
by Nayi Dhara Radio
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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1000
Pahadi Baccha | Nirmala Putul
पहाड़ी बच्चा । निर्मला पुतुल पहाड़ की गोद में पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों साखेलता है पहाड़ी बच्चा लड़खड़ाते कदमों से पहाड़ चढ़ते रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह पूरी ताकत से होने के लिए पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है पूरा का पूरा पहाड़,और पहाड़ों की गोद में होता है दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,पहाड़ी बच्चा देखता है पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़ और पूछता है पिता सेउस नए पक्षी के बारे में उस नए पक्षी के बारे में उस नए पक्षी के बारे में।
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999
Chupke Se Idhar Aa Jao | Shahryar
चुपके से इधर आ जाओ । शहरयारदरवाज़ा-ए-जाँ से हो करचुपके से इधर आ जाओइस बर्फ़ भरी बोरी कोपीछे की तरफ़ सरकाओहर घाव पे बोसे छिड़कोहर ज़ख़्म को तुम सहलाओमैं तारों की इस शब कोतक़्सीम करूँ यूँ सब कोजागीर हो जैसे मेरीये अर्ज़ न तुम ठुकराओचुपके से इधर आ जाओ
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998
Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire
इब्ने इंशा । स्वानंद किरकिरेहम इंशा जी के चेले हैंहम जोगी हैं बैरागी हैंहम प्रीत प्रेम के प्यासे हैंहम फ़ितरत से अनुरागी हैंइंशा की लय पर लिखते हैंकुछ उनकी तरह ही दिखते हैंइंशा की तरह हम प्रेमी हैंइंशा की तरह हम बाग़ी हैंहै चाँद से अपना यारानाहै मन उसका आना-जानाजिस शै से हमारा दिल है लगावो चाँद-चाँद कहलाती हैहज़ारों रातें चाँद हज़ारहर शब है मोहब्बत का बाज़ारहम जीते हैं अजी ऐसे हीहमें चाँद लगन जो लागी हैइस शब का चाँद तो आधा हैइसे कम कह दें या ज़्यादा हैइस चाँद के आगे पूनम है?या आगे इसके अमासी है?हम अंधी शब में जी लेंगेहम मन में चाँद दरस लेंगेहम इंशा जी के चेले हैंहमें कविता गढ़नी आती हैइंशा जी, कविता जीवन है?या जीवन कविता है, कह दोये जो भी है इसे जी लो जी...जिसे जैसी समझ में आती हैबड़ा ध्यान लगा कर हमने सुनोजीवन की कविता बाँची हैअपने घर नौ मन तेल है जीअपने दर राधा नाची है।
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997
Shareef Log | Abdul Bismillah
शरीफ़ लोग । अब्दुल बिस्मिल्लाहपत्थर के कोयले सेजो धुआँ उठता हैउसमें एक शहर महकता हैसुना है उस शहर मेंशरीफ़ लोग रहते हैंलेकिनशराफ़त काधुएँ से क्या नाता हैयह समझ में नहीं आताजैसे यहकि हर बार जंगल का राजाशेर ही क्यों हो जाता हैया यहकि बच्चों की फ़सलमुरझाने क्यों लगी हैकि बिना किसी बीमारी केमेरा जिस्मतलवार क्यों हो रहा हैक्या यह बातशरीफ़ों के कर्त्तव्य से बाहर हैकि वे धुएँ को ख़त्म करेंअथवापत्थर को जलने से रोकेंमैं समझता हूँइतना ही नहींजंगल का राज्यबच्चों की फ़सलमेरा जिस्मसबके प्रति उनकी ज़िम्मेदारी हैअगर शहर मेंसचमुच शरीफ़ लोग रहते हैं।
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996
Hatheli Ki Lakeerein | Madhav Kaushik
हथेली की लकीरें । माधव कौशिकचले तो साथ थे लेकिन न जाने कैसे हुआतुम्हारा हाथ किसी पिछले जन्म में शायद हमारे हाथ से छूटा तो छूटता ही गया हज़ारों साल से बिछड़ी हुई हैं दो आँखेंहज़ारों साल में जाकर कभी मिलें तो मिलेंकोई सुराग़ नहीं है इसीलिए शायदहथेलियों की लकीरों में ढूंँढता हूँ तुझे
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995
Usne Kaha | Shiv Kumar Gandhi
उसने कहा । शिव कुमार गांधीउसने कहा मुझसे ले चलो अपने शहरजो कहोगे वही करूँगाफिर पकड़ाई चाय जो गैस केचूल्हे पर बनी थीमैंने कहा मज़ाक़ में -जगह बदल लेते हैं हमऔर फिर वैसे भी शहर ख़ुद ही तो आ रहा हैतुम तकउसने कहा वहाँ छत पर बैठना शाम मेंअच्छा लगता है रोशनियों बीच और फिर हवा तो आती ही हैएक कारख़ाने में काम करता था उसका भतीजाजिसके साथ किसी छत पर बैठा था वह एक दिनइस शहर में रोशनियों बीचऔर उस दिन भी हवा तो आई ही थीतालाब किनारे चाँद को देखता लेटा हुआशाम में मैं ख़ुद कितने दिन काट लूँगा यहाँतालाब अभी भरा है फिर ख़ाली होगाऔर फिर भरेगा और ख़ाली होगाअगली बारपता नहीं भरे कि नहींऔर मैं कहूँगा किसी से ले चलो अब तो मुझेअपने साथजो कहोगे वह कर ही लूँगा!
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994
Is Ghat-Antar Baag-Bageeche | Kabir
इस घट-अंतर बाग़-बगीचे । कबीरइस घट-अंतर बाग़-बगीचे इसी में सिरजनहाराइस घट-अंतर सात समुंदर इसी में नौ लख ताराइस घट-अंतर पारस मोती इसी में परखनहाराइस घट-अंतर अनहद गरजै इसी में उठत फुहाराकहत 'कबीर' सुनो भाई साधो इसी में साईं हमारा
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993
Kya Kiya | Sushma Kumari
क्या किया। सुषमा कुमारीघोर अँधेरे मेंजब 'मुक्तिबोध' के शब्दगूंजते हैं कानों में- 'कहो इस जीवन में क्या किया?किसी मेमने की तरहघबराई,मैं भागने लगती हूँउल्टी दिशा में!बहुत-बहुत भाग करफिर पहुँचती हूँ वहीं!न बचने की हालत मेंबहुत-बहुत सोचती हूँ,और पाती हूँ।अँधेरी खदानों मेंखोदती रही जीवन।उम्मीदों की अनाज से,भरती रही बच्चों का पेट!मजदूरी कीझुकी हुई पीठ पर बोझा उठाया।कतरनों को चुन करगढ़े बहुत-बहत सपनें।बहुत-बहुत लड़ीबहुत-बहुत दुःखों के बीचखड़ी रही पलाश की तरह!जहाँ-जहाँ मुरझा जाना था मुझे वहीं-वहीं तो खिली!खाली हाँथो मेंसहेजे रखा हमेशाअपने पूर्वजों कीमुट्ठी भर जिजीविषा!
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992
Be-Awaaz | Veeru Sonkar
बे-आवाज़ । वीरू सोनकरजहाँ भाषा चूकती हैऔर अर्थ बे-आवाज़ ही रह जाते हैंजहाँ शब्दों को कोई ईश्वर नहीं मानताहम वहाँ मिलेंगेऔर अपनी चुप्पियों में कहेंगेकि आवाज़ एक ख़लल हैइस दुनिया को बिना किसी शर्त अब चुप हो जाना चाहिए!
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991
Meri Ma Ek Patang Hai | Kumar Divyanshu Shekhar
मेरी माँ एक पतंग है । कुमार दिव्यांशगु शेखर पतंग बने।नियत हुआ आकाश; पर किसी तौरउन्हें भाते रहेतार,पटरियों के ऊपर बिछे समानांतर।ओ मेरी मातः!तुम एक पतंग हो,तुमने नहीं चुना आकाश।कितना त्रासद है यहतार से चिपका-उलझा-फड़फड़ातानिरंतर सुलगताएक दिन गल जाएगातुम्हारा अस्तित्व।
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990
Harmony | Hemant Deolekar
हार्मनी। हेमंत देवलेकरसफ़ेद ओर काला अलग रहेंगेतो नस्ल कहायेंगेमिलकर रहेंगे तो संगीतहारमोनियमसाहचर्य की एक मिसाल है।उंगलियों के बीच की खली जगहउंगलियों से भर देने के लिए है
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989
Ummeed | Shailay
उम्मीद । शैलेयअँजुरी भर जलतलुवे भर ओसआँख भर सपनानींद भर लोरीहौसले कोजुगनू भर हिक़मतजुटा ही लेनी चाहिएनामुराद अंधड़ मेंकुछ तो मिट्टी टूटने से बचेगीकुछ तो उगी रह सकेगीदूबकि कभी न कभी तोफूट ही लेंगे कल्ले नए-नए।
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988
Ek Abhineta Ki Thakaan | Agney
एक अभिनेता की थकान। आग्नेयवह रंगमंच पर जा चुका हैवह अपनी भूमिका पूरी कर चुका हैउतार दी है पोशाकउस चरित्र की जिसका अभिनय किया उसनेवह नहीं जानताजब वह रंगमंच पर थाकरतल-ध्वनियाँ हुईं या नहींअथवा सन्नाटा पसरा रहादर्शकों के बीच रंगशाला मेंप्रत्येक वर्ष यह भूमिका करतेवह थक चुका हैकहाँ जाए रंगमंच छोड़करहो चुका है वह जो कुछ अभिनय करतेउसको छोड़कर जानाक्या उस पर निर्भर करता है
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987
Yah Number Maujood Nahi Hai | Manglesh Dabral
यह नंबर मौजूद नहीं । मंगलेश डबरालदिस नंबर डज़ नॉट एग्ज़िस्टजहाँ भी जाता हूँ जो भी फ़ोन मिलाता हूँअक्सर एक बेगानी-सी आवाज़ सुनाई देती हैदिस नंबर डज़ नॉट एग्ज़िस्ट यह नंबर मौजूद नहीं हैकुछ समय पहले इस पर मिला करते थे बहुत-से लोगकहते आ जाओ हम तुम्हें पहचानते हैंइस अंतरिक्ष में तुम्हारे लिए भी बना दी गई है एक जगहलेकिन अब वह नंबर मौजूद नहीं है वह कोई पहले का नंबर थाउन पुराने पतों पर बहुत कम लोग बचे हुए हैंजहाँ आहट पाते ही दरवाज़े खुल जाते थेअब घंटी बजाकर कुछ देर सहमे हुए बाहर खड़े रहना पड़ता हैऔर आख़िरकार जब कोई प्रकट होता हैतो मुमकिन है उसका हुलिया बदला हुआ होया वह कह दे मैं वह नहीं हूँ जिससे तुम बात करते थेयह वह नंबर नहीं है जिस पर तुम सुनाते थे अपनी तकलीफ़जहाँ भी जाता हूँ देखता हूँ बदल गए हैं नंबर नक़्शे चेहरेनाबदानों में पड़ी हुई मिलती हैं पुरानी डायरियाँउनके नाम धीरे-धीरे पानी में घुलते हुएअब दूसरे नंबर मौजूद हैं पहले से कहीं ज़्यादा तार-बेतारउन पर कुछ दूसरी तरह के वार्तालापमहज़ व्यापार महज़ लेनदेन ख़रीद-फरोख़्त की आवाज़ेंलगातार अजनबी होती हुईजहाँ भी जाता हूँ हताशा में कोई नंबर मिलाता हूँउस आवाज़ के बारे में पूछता हूँ जो कहती थीदरवाज़े खुले हुए हैं तुम यहाँ रह सकते होचले आओ थोड़ी देर के लिए यों ही कभी भी इस अंतरिक्ष में।
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986
Tum Ho | Nazim Hikmat
तुम हो । नाज़िम हिकमतअनुवाद : सुरेश सलिलतुम्हीं मेरी ग़ुलामी हो, तुम्हीं मेरी आज़ादीगर्मियों की किसी बेलिबास रात की तरह मेरा जिस्ममेरा वतन हो तुमपन्ने जैसी हल्की हरी आँखें,हैरतअंगेज़ हो तुम, ख़ूबसूरत और ज़िंदादिलमेरी हस्रत हो तुम, मेरी पहुँच से परे हरदम।
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985
Sankatgrasth | Vivek Nirala
संकटग्रस्त। विवेक निराला भूमंडलीकरण के इस युग में संकट ही संकट थे स्थानीय लोग कुछ वैश्विक संकटों से जूझ रहे थे और वैश्विक लोग स्थानीय संकटों से।मेरा संकट मेरी टूटी खाट थी जब कि मैं स्वप्न में था। किसानों के पास कर्ज था और उद्योगपतियों के पास मर्ज सरकार को किसी से हर्ज न था।खुदगर्ज सिर्फ़ हिन्दी का कवि था लेकिन वह भी संकट से दुबराया था।न उसकी किताब बिकती थी और न उसकी आत्मा। उसके शरीर में जन्म से एक ही गुर्दा था वह उसे भी नहीं बेच सकता था बस इसीलिए मुर्दा था।
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984
Ped | Omprakash Valmiki
पेड़ । ओमप्रकाश वाल्मीकिपेड़तुम पेड़ उसी वक़्त तकपेड़ हो,जब तक ये हरे पत्तेहिल रहे हैंतुम्हारी टहनियों पर।पेड़,तुम्हारा हरापन उसी वक़्त तक हैजब तक ये पत्ते सही सलामत हैंतुम्हारी टहनियों पर।पेड़,तुम उसी वक़्त तक पेड़ हो,जब तक ये पत्तेतुम्हारे साथ हैं।पत्ते झरते हीपेड़ नहीं ठूँठ कहलाओगेजीते जी मर जाओगे!
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983
Tum Muskurana | Anurag Tiwari
तुम मुस्कुराना । अनुराग तिवारीचाहे जैसी स्थितियां होहालात चाहे कैसे होदुख हो, निराशा होया फिर झूठी आशा होविफलता या असफलता होया फिर घोर विकलता होसंताप, वेदना, दर्द होया थक कर हारा मर्द होजब अपनी शक्ति क्षीण लगेहम-तुम सा वीर अधीर लगेजब निश्छल प्रेम अधूरा होअपना सोचा ना पूरा होतब मानों इक बात मेरी, ना घबरानातुम मुस्कुराना मुस्कुराना मुस्कुराना।।सपने अगर अधूरे होकोशिश हो ना पूरे होंराहों में कठिनाई होया खुद से तेरी लड़ाई होदिन में भी घोर अंधेरा होहर पल रातों ने घेरा होजब सूरज का ना आस रहेखुद पर ना अब विश्वास रहेजब दुनिया ने ठुकराया होमिल सबने तुम्हें गिराया होतब मानों इक बात मेरी, ना घबरानातुम मुस्कुराना मुस्कुराना मुस्कुराना ।मुश्किल में जीवन कटता होया हर कदमों पर खांइ होअपनों गैरों में उलझन होया लंका भेदी भाई होजब रोगों का ही साया होहर ईलाज गर ज़ाया होजब गीला तन भी सूखा होपेट भरा , मन भूखा होजब बातों में ना अर्थ रहेमिलना, बतियाना व्यर्थ रहेजब फूलों की उम्मीदों मेंकांटों को तुमने पाया होतब मानों इक बात मेरी, ना घबरानातुम मुस्कुराना मुस्कुराना मुस्कुराना ।।
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982
Mohabbat Mein Der Ho Sakti Hai | Zeeshan Sahil
मोहब्बत में देर हो सकती है। ज़ीशान साहिलजब तुम मुझे सुनोये कहते हुएएक ख़ूब-सूरत लड़की पे मरनाकितना आसान हैऔर उसी के लिए मर जानामैं पसंद करता हूँऔर इस के बादतुम मुझे देखोकई बरस तकअपने टूटे हुए दिल को जोड़तेगिरे हुए सितारों कोदोबारा आसमान में टाँकतेमिट्टी में मिले हुए फूलों कोफिर से खिलाने की कोशिश करतेएक ख़ूब-सूरत लड़की के लिएमोहब्बत में देर हो सकती है
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981
Shabd | Kamala Das | Translation - Ranjana Mishra
शब्द / कमला दास अनुवाद. - रंजना मिश्रामेरे चारों और शब्द, शब्द, शब्द हैंवे मुझपर पत्तों की तरह उगते हैंऐसा लगता है वे कभी मेरे भीतरधीमे धीमे उगना बन्द नहीं करतेपर मैं खुद से कहती हूँ — शब्दवे एक मुसीबत हैं, उनसे सावधान रहो,वे कई चीज़ें हो सकते हैं, जैसेकि खाईजहाँ तेज़ी से चलते क़दमों को ठहरना चाहिएदेखो, वे समुद्र की पंगु बनाने वाली लहरें हो सकते हैंगर्म हवाओं का भूचाल या तुम्हारे सबसे अच्छे मित्र का गलाकाटने को उद्धत चाक़ूशब्द रुकावट हैंपर वे मुझपर इस तरह उगते हैं, जैसे पेड़ों पर पत्तेलगता है, वे कभी उगना बन्द नहीं करतेगहरे मेरे भीतर, एक चुप्पी से
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980
Ek Aur Dhang | Shrikant Verma
एक और ढंग। श्रीकांत वर्माभागकर अकेलेपन से अपनेतुममें मैं गया।सुविधा के कई वर्षतुममें व्यतीत किए।कैसे?कुछ स्मरण नहीं।मैं और तुम! अपनी दिनचर्या केपृष्ठ परअंकित थेएक संयुक्ताक्षर!क्या कहूँ! लिपि की नियतिकेवल लिपि की नियतिथी—तुममें से होकर भी,बसकर भी,संग-संग रहकर भीबिल्कुल असंग हूँ।सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है।- लेकिन! क्यों लगता है मुझेप्रेमअकेले होने का हीएक और ढंग है।
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979
Ma | Amitabh
माँ । अमिताभहालाँकि मैं सबसे छोटा थाग़रीब दुर्बलपर माँ सर्वाधिक मेरे हिस्से में आईमैं ही था उसका अशिष्ट सेवकलापरवाह प्रेमीमैं ही अकेला चूम सकता था उसके गालवही जानती थी बस कि मैं कवि हूँ
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978
Buddh Chahiye Yuddh Nahi | Rajni Tilak
बुद्ध चाहिए युद्ध नहीं । रजनी तिलकक्यों खड़ी की तुमनेबारूद के ढेर पर हमारी दुनियामुझे जीवन की आस है।मैं सावन को आँखों में भरकरबहारों में झूलना चाहती हूँशाँति, ज्ञान, करुणा मेरा गहनायुद्ध, क्रूरता, तृष्णा तुम्हारा हथियारहिरोशिमा की तड़प मैं भूलना चाहती हूँ।तुमने जो मृत्यु बीजपरमाणु युद्ध क्यों बोया?यह घृणा-मृत्यु का वटवृक्षपल में लाखों को भी लेगा,बुद्ध के देश मेंपंचशील, संकल्प टूट जाएगा।मैं जीवन की हथेलियों मेंदुलारना चाहती हूँ,मैं अपने बच्चों कोइंसान बनाना चाहती हूँ,उस देश में भी मेरी सीमाएँअपने बच्चों पर अरमान सजाती होंगीवह भी उन्हें ‘कुछ’ बनाने कीललक लिए दुलारती होंगी।हिरोशिमा की माँओं की सिसकअभी बाक़ी है।ये जंग की तलवारहमारे सिर से हटा दोबारूद के ढेर परक्यों खड़ी हो हमारी दुनिया?हम जंग नहीं चाहते,जीना चाहते हैंहम विनाश नहीं सृजन चाहते हैंहम युद्ध नहींबुद्ध चाहते हैं।
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977
Mohabbat Mein Karein Kya Kuch | Daag Dehlvi
मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता । दाग़ देहलवीमुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकतामेरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नही सकतान रोना है तरीक़े का न हंसना है सलीके़ कापरेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकताख़ुदा जब दोस्त है ऐ 'दाग़' क्या दुश्मन से अन्देशाहमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता
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976
Bhejna | Tribhuvan
भेजना | त्रिभुवनलौटते पत्र के साथकुछ बादल भेजनासमुद्र के कुछ पेड़पत्तियों के बीच चहचहाते कुछ पक्षीऔर पानी की कुछ लहरें भेजनाअपनी सुंदर आँखों के अक्स भेजनाभेजना चेहरे की लालिमा के कुछ लैंडस्केपऔर रात भर नशा करके बैठी सुबह की कुछ छवियाँ भेजनाहाँ, एक खुली खिड़की भेजनाएक मदमाती पतली अकेली गली का वह कोना भेजनाजहाँ मैं तुमसे मिल सकूँऔर अपनी उँगलियों की छुअन भेजनाजिसे अपनी चाहत की दीवारों में गाड़करअपने भरोसे की गठरी टाँग दूँ!
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975
Na Hoga Kuch Tab | Ritu Kumar Ritu
न होगा कुछ तब। ऋतु कुमार ऋतुहमें मालूम हैएक न एक दिन हम सब मिल जाएँगेइसी मिट्टी मेंएक न एक दिनहमें मालूम हैहोगी निष्प्राण यह सृष्टिहमें मालूम हैएक न एक दिनअपने यक़ीन पर आ जाएँगेहम सबऔर किसी सबूत की ज़रूरत नहीं होगी!
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974
Idhar Se Abr Uth Kar | Meer Taqi Meer
इधर से अब्र उठ कर जो गया है । मीर तक़ी मीरइधर से अब्र उठ कर जो गया हैहमारी ख़ाक पर भी रो गया हैमसाइब और थे पर दिल का जानाअजब इक सानेहा सा हो गया हैमुक़ामिर-ख़ाना-ए-आफ़ाक़ वो हैकि जो आया है याँ कुछ खो गया हैकुछ आओ ज़ुल्फ़ के कूचे में दरपेशमिज़ाज अपना उधर अब तो गया हैसिरहाने 'मीर' के कोई न बोलोअभी टुक रोते रोते सो गया है
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973
Wahi Baat | Pratibha Katiyar
वही बात । प्रतिभा कटियारउनके पास थीं बंदूकेंउन्हें बस कंधों की तलाश थी,उन्हें बस सीने चाहिए थेउनके हाथों में तलवारें थीं,उनके पास चक्रव्यूह थे बहुत सारेवे तलाश रहे थे मासूम अभिमन्युउनके पास थे क्रूर ठहाकेऔर वीभत्स हँसीवे तलाश रहे थे द्रौपदी।उन्होंने हमें ही चुना हमें मारने के लिएहमारे सीने परहमसे ही चलवाई तलवारहमें ही खड़ा किया ख़ुदहमारे ही विरुद्धऔर उनकी विजय हुई हम पर।उन्होंने बस इतना कहाऔरतें ही होती हैंऔरतों की दुश्मन, हमेशा।
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972
Parvat Pradesh Mein Pavas | Sumitranandan Pant
पर्वत प्रदेश में पावस । सुमित्रानंदन पंतपावस ऋतु थी, पर्वत प्रदेश,पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश।मेखलाकार पर्वत अपारअपने सहस्र दृग-सुमन फाड़,अवलोक रहा है बार-बारनीचे जल में निज महाकार,- जिसके चरणों में पला तालदर्पण-सा फैला है विशाल!गिरी का गौरव गाकर झर-झरमद में नस-नस उत्तेजित करमोती की लड़ियों-से सुंदरझरते हैं झाग भरे निर्झर!गिरिवर के उर से उठ-उठ करउच्चाकांक्षाओं से तरुवरहै झाँक रहे नीरव नभ परअनिमेष, अटल, कुछ चिंतापर।उड़ गया,अचानक लो,भूधरफड़का अपार पारद1 के पर!रव-शेष रह गए हैं निर्झर!है टूट पड़ा भू पर अंबर!धँस गए धरा में सभय शाल!उठ रहा धुआँ,जल गया ताल!- यों जलद-यान में विचर-विचरथा इंद्र खेलता इंद्रजाल।
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971
Adivasi Stree Ki Kavita | Sushma Kumari
आदिवासी स्त्री की कविता । सुषमा कुमारी एक आदिवासी ख्त्रीजब लिखती है कविता,तो कविता के देवता कहते हैं -'उसकी कविता से 'भाषा' गायब है!जिनके हाथों में किताबें तकनहीं पहुँचतीकविता लिखते हुएभला वह स्री 'भाषा' तककैसे पहुँचती ?भाषा के 'भ' से पहलेआता है अस्मिता का 'अ''अ' को जाने बिनास्री 'भाषा' तक कैसे पहुँचती?'अ' से 'भ' तक की यात्रा मेंपहले वह लिखना चाहती है 'अ' से अभिव्यक्तिऔर 'आ' से आज़ादी!'अ' और 'आ' तक पहुँचे बिनास्त्री भाषा तक कैसे पहुँचती ?उसकी कच्ची पगडंडियों कीकविताओं कोतुम शहरो तक पहुँचने दो।उसके समाज में'भ' से 'भाषा' के पहलेआती है - "भ' से भूख !स्रीयों की कविता में'भाषा' आयेगीजब उसे भरपूर सुना जाएगा!
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970
Peeli Titli | Jyotsna Milan
पीली तितली। ज्योत्स्ना मिलनउड़ रही थीछोटी-सीपीली तितलीउड़े जा रही थीजैसे बैठना भूल चुकी होया उड़ना ही उड़नाजानती होपौधे से पौधे तकउड़ती जातीफूल की उम्मीद मेंकि फूलों के बीचपहचानी न जाएतितली की तरहइस क़दर उड़ रही थीकि अपने उड़ने मेंफूल हुई जा रही थी तितली।
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969
Chandroday Humne Kabse Nahi Dekha | Gyanendrapati
चन्द्रोदय हमने कब से नहीं देखा । ज्ञानेन्द्रपति चन्द्रोदय!हमने कब से नहीं देखाप्रायः उस समयटी.वी. के किसी-न-किसी चैनल परकोई-न-कोई नैनसुख कार्यक्रम चलता रहता हैकोई-न-कोई चन्द्रमुखीउजागर कर रही होती हैहमारे जीवन का अँधेराऔर कभी जबदेर से घर लौटतेकिसी क्षितिजवान सड़क के माथ पर औचकदिखा कभी नवोदित चाँद, देखताअनदेखी की हमनेआँख मिलाने से डरेसड़क पकड़े चलते गए आदतनकि आँखें मिलने पर पूछना होगा हाल-चालअफसोस के दो शब्द कहने होंगेहो जाएगी अवेरजबकि जल्दी है आजजबकिशुक्ल पक्ष का था वह चाँदहर दिन अपनी एक कला बढ़ाताउदार हँसमुखकृष्ण पक्ष का क्रमशः कृश भी होता वहअँजोर-भरी होती उसकी अँजुरीहृदय में न टिकने देती अंधियाराचन्द्रोदय!हमने कब से नहीं देखाचन्द्रोदय! जिसे निहारती है नदीअपने सूर्य-क्लान्त सीने में उतारती है।
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968
Abhinay | Manglesh Dabral
अभिनय । मंगलेश डबरालएक गहन आत्मविश्वास से भरकरसुबह निकल पड़ता हूँ घर सेताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँएक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँवह एकाएक देख लेता है मेरी उदासीएक से तपाक-से हाथ मिलाता हूँवह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांतएक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँवह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते होजिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखावे कहते हैं अरे आप टी.वी. पर दिखे थे एक दिनबाज़ारों में घूमता हूँ नि:शब्दडिब्बों में बंद हो रहा है पूरा देशपूरा जीवन बिक्री के लिएएक नई रंगीन किताब है जो मेरी कविता केविरोध में आई हैजिसमें छपे सुंदर चेहरों को कोई कष्ट नहींजगह-जगह नृत्य की मुद्राएँ हैं विचार के बदलेजनाब एक पूरी फ़िल्म है लंबीआप ख़रीद लें और भरपूर आनंद उठाएँशेष जो कुछ है अभिनय हैचारों ओर आवाज़ें आ रही हैंमेकअप बदलने का भी समय नहीं हैहत्यारा एक मासूम के कपड़े पहनकर चला आया हैवह जिसे अपने पर गर्व थाएक ख़ुशामदी की आवाज़ में गिड़गिड़ा रहा हैट्रेजडी है संक्षिप्त लंबा प्रहसनहरेक चाहता है किस तरह झपट लूँसर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार।
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967
Baat Yah Nahi Hai | Teji Grover
बात यह नहीं है । तेजी ग्रोवरबात यह नहीं है कि कहीं भी मन नहीं लगता, कहीं भी जड़ महसूस नहीं होती, कहीं भी अकेलापन साथ नहीं छोड़ता।बात ठीक इससे उलट है। हर जगह मन लगता है। हर जगह जड़ महसूस होती है। हर जगह सान्निध्य है, स्नेह है, साथ है। आत्मीयता से भरे हुए नक्षत्र पर किससे कहूँ कि ऐसा है... कौन मेरी बात का विश्वास करेगा?
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966
Haan Dost | Agyeya
हाँ, दोस्त। अज्ञेयहाँ, दोस्त,तुम ने पहाड़ की पगडंडी चुनीऔर मैं ने सागर की लहर।पहाड़ की पगडंडी :सँकरी, पथरीली,ढाँटी,पर स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई :मातबर और भरोसेदारपगडंडी जो एक दिन निश्चय तुम्हेंपड़ाव पर पहुँचा देगी।सागर की लहरविशाल, चिकनी,सपाटपर बिछलती फिसलती हमेशा अज्ञात अदृश्य को टेरती हुई,बेभरोस और आवारा...लहर जो न कभी कहीं पहुँचेगी न पहुँचाएगीन पहुँचने देगी, जो डुबोएगी नहीं तो वहींलौटा लाएगीजहाँ से चले थे, सिवा इस केकि वह वहीं तब तक नहीं रह गया होगा।ठीक है, दोस्तमैं ने लहर चुनीतुम ने पगडंडी :तुमअपनी राह परसुख से तो हो?जानते तो हो कि कहाँ हो?मैं-मैं मानता हूँ कि इतना ही बहुत है कि अभीजानता हूँ कि आशीर्वाद में हूँ-जियो, मेरे दोस्त,जियो, जियो, जियो...
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Seedhi | Padmaja Sharma
सीढ़ी । पद्मजा शर्माजो किसी कोसीढ़ी बनाकरऊपर चढ़ रहे हैंवह मुझसे कह रहे हैंतुम कमज़ोर होकब से खड़ी होबीच रास्तेहट जाओवे नहीं जानतेकि सीढ़ी के हटते हीवे गिरेंगेमैंफिर भीखड़ी रहूँगी
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Lekar Seedha Naara | Shamsher Bahadur Singh
लेकर सीधा नारा। शमशेर बहादुर सिंहलेकर सीधा नाराकौन पुकाराअंतिम आशाओं की संध्याओं से?पलकें डूबी ही-सी थीं -पर अभी नहीं;कोई सुनता-सा था मुझेकहीं;फिर किसने यह, सातों सागर के पारएकाकीपन से ही, मानो -हार,एकाकी उठ मुझे पुकाराकई बार?मैं समाज तो नहीं; न मैं कुलजीवन;कण-समूह में हूँ मैं केवलएक कण।- कौन सहारा!मेरा कौन सहारा!
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963
Pasand Ki Jane Wali Stree | Savita Singh
पसन्द की जाने वाली स्त्री । सविता सिंह प्रेम करती हुई स्त्री ही अब भी पसन्द की जाती हैछल में भी एक अजीब जादू हैजो झूठ में नहींकितना मिलता-जुलता है झूठ भी सच से आख़िरमृत्यु ज्यों प्रेम सेअन्त में सच ही बचाता है हर स्त्री कोलेकिन तब तक वह तब्दील हो चुका होता हैझूठ में कुछ इस तरहकि वह उस के किसी काम का नहीं रहताछल रहता है ज्यों का त्यों तब भीअपने काम करताप्रेम और मृत्यु का रथ हाँकता
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962
Kis Jane Kis Ki Pyas Bujhane Kidhar Gayin | Kaifi Azmi
क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं । कैफ़ी आज़मीक्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईंइस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईंदीवाना पूछता है ये लहरों से बार बारकुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईंअब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँवीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईंपैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझेग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईंपाया भी उन को खो भी दिया चुप भी हो रहेइक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं
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961
Choolha | Tanwir Sheikh 'Ilham'
चूल्हा । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’ चूल्हे ने संभालापितृसत्ता कोऔर बनाएं रखा अपना वर्चस्वये चूल्हास्त्रियों के ऊपरऐसे स्थापित किया गयाजो पुरुषों के रौब कोआजीवन कायम रख सकेपितृसत्ता नेचूल्हे के सहारे सेस्त्रियों के सत्य को, उनके सपने को और उनके व्यक्तित्व कोहमेशा जलाए रखाकितनी ही स्त्रियों को ब्याहा गयासिर्फ चूल्हे में झोंकने कोमानो ये चूल्हापकवान बनाने के लिएआविष्कार नहीं बल्किपुरुषों के अधिकार कोउनके वर्चस्व कोस्थायित्व बनाए रखने के लिएकिया गया होइस चूल्हे नेन जाने कितने स्वप्नतिलांजित किए होंगेताकि पुरुष कीपौरुष शक्ति कायम रहेसुनो लड़कियोंअब वक्त हैंउस चूल्हे कोलांघने का औरउस चूल्हे को उसी मेंतिलांजित करने काताकि चूल्ह से चांद कासफ़र करो तुमतो अब हुंकार भरोछोड़ो हाथों से बेलन औरथामों कलम-किताब जोतुम्हारे लिए साबित हो इंकलाबताकितुम पा सको उस गगन कोजो तुम्हारे उड़ान को तत्पर है औरउस समाज पर काबिज़ हो जाओजो तुम्हारे छलांग से भयभीत हैजो तुम्हारे आगाज़ से भयभीत हैं.!
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Wo Ladke Kaun They | Gautam Kumar
वो लड़के कौन थे | गौतम कुमारख़ामोशी तोड़ोक्यों देखते होअगली बारिश की राहक्यों कर रहे होअपनी मिट्टी से उठने वाली सौंधी ख़ुशबू का इंतज़ारअब कौन-सी फ़सल हैजिसकी फ़िक्र तुम्हें सता रही हैखेतों तुम किसका पेट भरना चाहते होकिसे भूखा रखना चाहते होखेतों तुम नहीं शरीक-ए-जुर्मपर सनद रहेतुम्हारी मिट्टीआबाद फ़सलों के पस-ए-मंज़र मेंबर्बाद नस्लों के ख़ून से सनी हैतुम बोलोतुम तो जानते होवो लड़की कौन थीवो लड़के कौन थे
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Roop Naran Ke Tat Par | Rabindranath Tagore | Translation - Hans Kumar Tiwari
रूप-नारान के तट पर । रवींद्रनाथ टैगोरअनुवाद : हंसकुमार तिवारीरूप-नारान के तट परजाग उठा मैं।जाना, यह जगत्सपना नहीं है।लहू के अक्षरों में लिखाअपना रूप देखा;प्रत्येक आघातप्रत्येक वेदना मेंअपने को पहचाना।सत्य कठिन हैकठिन को मैंने प्यार किया—वह कभी छलता नहीं।मरने तक के दुःख का तप है यह जीवन -सत्य के दारुण मूल्य को पाने के लिएमृत्यु में सारा ऋण चुका देना।
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958
Dharti | Sharad Bilore
धरती । शरद बिलौरेदो बरस की नीलूआसमान तकती हैपापा से कहती हैपापा मुझे आसमान चाहिए।पापा ने कभी आसमान जैसी चीज़अपने बाप से नहीं माँगीएक बार तारे ज़रूर माँगे थे।पापा डरे हुए हैं सोचते हैंमैं धरती पर खेल कर बड़ा हुआक्या नीलू आसमान ताक कर बड़ी होगीऔर यहकि मैंने अपने बाप से औरनीलू ने मुझसेधरती क्यों नहीं माँगी।क्या सचमुच धरतीबच्चों के खेलने की चीज़ नहीं!
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957
Ahimsa | Kanhaiyalal Sethia
अहिंसा । कन्हैयालाल सेठिया नहीं हैहिंसा कानकारात्मक बोधअहिंसाएक मौलिक शोधचिंत्य है जिसमेंदृष्टि से परेदर्शनजीवन से परेआत्माजिसकीमीमांसाअनेकांतभूमिकासर्वोदय!
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956
Unghta Santri | Vishwanath Prasad Tiwari
ऊँघता संतरी। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीउसे मत जगाओवह सपने देख रहा हैबच्चे लौट रहे हैं उसके सपने मेंपक्षी चहचहा रहे हैं उसके सपने मेंबदल रहे हैं इंद्रधनुष के रंग उसके सपने मेंझर रहे हैं गुलमुहर के फूल उसके सपने मेंउसे मत जगाओउसकी नींद पर पाबंदी हैअभी एक झपकी में वह लूट लेगा ब्रहमांडअभी एक हलका-सा पदचापचकनाचूर कर देगा उसका शीशमहलदेवदूत की तरह सो रहा है वहउसे मत जगाओअभी वह उछलकर खड़ा हो जाएगासीधे तने वृक्ष की तरहसजग और तैयारकिसी पर भी गोली चला देने के लिए।
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Daant Ki Khidki | Nilesh Raghuvanshi
दाँत की खिड़की। नीलेश रघुवंशीबारिश से पहले बादलों की गड़गड़ाहटबिजली के चमकने-सा मुस्कराता चेहरा सहेली कातिस पर "पहचाना-पहचाना' भरी बारिश में छपाक-छपाक की आवाज़हा याद आया अपन एक बार..कहते सिर खुजलानापीठ पर पड़ती धौल तुम क्यों पहचानोगी भैयाझमाझम बारिश में बिना छतरी के भीग-भीग जानागलबहियाँ डाल सहेली करो याद करो याद की रट लगाएघूमते हैं आँखों के आगे हजारों हज़ार चेहरेअँटता नहीं जिनमें चेहरा सहेली काचमकी बिजली ज़ोर से...स्कूल के दिनों में शरमाकर हँसती थी जब सहेलीझिलमिलाती थी उसके दाँतों के बीच की जगहजिसे हम सब दाँत की खिड़की कह चिढ़ाते खूबओह याद...याद आया मेरी प्यारी दात की खिडकीकह झूमती हूँ सहेली सेहटो दूर दूर हटो इतनी देर बाद पहचानींभरी बरसात में ज़ोर से चमकती है बिजलीदूर उड़ती जाती छतरी की तरह रुकती नहीं हमारी हँसी
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Kavita Kavi Ke Dimaag Mein | Aishwarya Tiwari
कविता कवि के दिमाग में । ऐश्वर्या तिवारीकविता कवि के दिमाग में पलती है और जन्म लेती है कलम की कोख सेबड़ी होती है भाषाओं के मेले में दोस्ती करती है, तेज़ तर्रार मन को पसीज और झंझोड़ देने वाले शब्दों सेकभी आईना देखती है तो कभी आईना दिखलाती और एक दिन पूर्ण होकर ब्याह रचा लेती है अपने प्रियतम कागज से जो था बरसों से उसकी ताक में कविता कवि के दिमाग में
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Bachhe Kaam Par Ja Rahe Hain | Rajesh Joshi
बच्चे काम पर जा रहे हैं। राजेश जोशी कुहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैंसुबह-सुबहबच्चे काम पर जा रहे हैंहमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यहभयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जानालिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरहकाम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदेंक्या दीमकों ने खा लिया हैसारी रंग-बिरंगी किताबों कोक्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौनेक्या किसी भूकंप में ढह गई हैंसारे मदरसों की इमारतेंक्या सारे मैदान, सारे बग़ीचे और घरों के आँगनख़त्म हो गए हैं एकाएकतो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?कितना भयानक होता अगर ऐसा होताभयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यहकि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूलपर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुएबच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चेकाम पर जा रहे हैं।
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952
Baatein | Navin Sagar
बातें । नवीन सागरबातें करते हुएबातों के परे हम एक-एक केहोते जाते हैंसोते जाते हैं जैसे सफ़र में बैठ-बैठ बातों में होते हैं हम जितनाउतने से कई गुना कहीं औरहोते हैंआख़िर को दिखते हैं ना होकरहोते हैं जहाँ वहाँदिखते ही नहीं हैं।
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Jung | Balraj Komal
जंग । बलराज कोमलतीरगी में भयानक सदाएँ उठींऔर धुआँ सा फ़ज़ाओं में लहरा गयामौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़तिलमिलाने लगीऔर फिर एक दमसिसकियाँ चार-सू थरथरा कर उठींएक माँ सीना-कूबी से थक कर गिरीइक बहन अपनी आँखों में आँसू लिएराह तकती रहीएक नन्हा खिलौने की उम्मीद मेंसर को दहलीज़ पर रख के सोता रहाएक मा'सूम सूरत दरीचे से सर को लगाए हुएख़्वाब बुनती रहीमुंतज़िर थीं निगाहें बड़ी देर सेमुंतज़िर ही रहींमौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़तिलमिलाती रही
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ABOUT THIS SHOW
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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Nayi Dhara Radio
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