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Pratidin Ek Kavita

PODCAST · arts

Pratidin Ek Kavita

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

  1. 1000

    Daant Ki Khidki | Nilesh Raghuvanshi

    दाँत की खिड़की। नीलेश रघुवंशीबारिश से पहले बादलों की गड़गड़ाहटबिजली के चमकने-सा मुस्कराता चेहरा सहेली कातिस पर "पहचाना-पहचाना' भरी बारिश में छपाक-छपाक की आवाज़हा याद आया अपन एक बार..कहते सिर खुजलानापीठ पर पड़ती धौल तुम क्यों पहचानोगी भैयाझमाझम बारिश में बिना छतरी के भीग-भीग जानागलबहियाँ डाल सहेली करो याद करो याद की रट लगाएघूमते हैं आँखों के आगे हजारों हज़ार चेहरेअँटता नहीं जिनमें चेहरा सहेली काचमकी बिजली ज़ोर से...स्कूल के दिनों में शरमाकर हँसती थी जब सहेलीझिलमिलाती थी उसके दाँतों के बीच की जगहजिसे हम सब दाँत की खिड़की कह चिढ़ाते खूबओह याद...याद आया मेरी प्यारी दात की खिडकीकह झूमती हूँ सहेली सेहटो दूर दूर हटो इतनी देर बाद पहचानींभरी बरसात में ज़ोर से चमकती है बिजलीदूर उड़ती जाती छतरी की तरह रुकती नहीं हमारी हँसी

  2. 999

    Kavita Kavi Ke Dimaag Mein | Aishwarya Tiwari

    कविता कवि के दिमाग में । ऐश्वर्या तिवारीकविता कवि के दिमाग में पलती है और जन्म लेती है कलम की कोख सेबड़ी होती है भाषाओं के मेले में दोस्ती करती है, तेज़ तर्रार मन को पसीज और झंझोड़ देने वाले शब्दों सेकभी आईना देखती है तो कभी आईना दिखलाती और एक दिन पूर्ण होकर ब्याह रचा लेती है अपने प्रियतम कागज से जो था बरसों से उसकी ताक में  कविता कवि के दिमाग में 

  3. 998

    Bachhe Kaam Par Ja Rahe Hain | Rajesh Joshi

    बच्चे काम पर जा रहे हैं। राजेश जोशी कुहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैंसुबह-सुबहबच्चे काम पर जा रहे हैंहमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यहभयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जानालिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरहकाम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदेंक्या दीमकों ने खा लिया हैसारी रंग-बिरंगी किताबों कोक्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौनेक्या किसी भूकंप में ढह गई हैंसारे मदरसों की इमारतेंक्या सारे मैदान, सारे बग़ीचे और घरों के आँगनख़त्म हो गए हैं एकाएकतो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?कितना भयानक होता अगर ऐसा होताभयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यहकि हैं सारी चीज़ें हस्बमामूलपर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुएबच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चेकाम पर जा रहे हैं।

  4. 997

    Baatein | Navin Sagar

    बातें । नवीन सागरबातें करते हुएबातों के परे हम एक-एक केहोते जाते हैंसोते जाते हैं जैसे सफ़र में बैठ-बैठ बातों में होते हैं हम जितनाउतने से कई गुना कहीं औरहोते हैंआख़िर को दिखते हैं ना होकरहोते हैं जहाँ वहाँदिखते ही नहीं हैं।

  5. 996

    Jung | Balraj Komal

    जंग ।  बलराज कोमलतीरगी में भयानक सदाएँ उठींऔर धुआँ सा फ़ज़ाओं में लहरा गयामौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़तिलमिलाने लगीऔर फिर एक दमसिसकियाँ चार-सू थरथरा कर उठींएक माँ सीना-कूबी से थक कर गिरीइक बहन अपनी आँखों में आँसू लिएराह तकती रहीएक नन्हा खिलौने की उम्मीद मेंसर को दहलीज़ पर रख के सोता रहाएक मा'सूम सूरत दरीचे से सर को लगाए हुएख़्वाब बुनती रहीमुंतज़िर थीं निगाहें बड़ी देर सेमुंतज़िर ही रहींमौत की सी सपेदी उफ़ुक़-ता-उफ़ुक़तिलमिलाती रही

  6. 995

    Safar Ke Saathi | Natasha

    सफ़र के साथी । नताशावे मेरे कोई नहीं थेजिनका रह गया पानी उधार मुझ परउन कंधों की स्मृति शेष हैजिन पर मेरी नींद विदा हो गई हैउन पर रह गया उधारमेरे चुंबन का स्पर्शबीच रस्ते में जिनसेबिछड़ जाना पड़ा थाउन चेहरों को निहारना थाजिन्होंने लंबे सफ़र मेंमेरी भूख को बाँटाजिनके संबोधन के सूत्रध्वनि में घुल मेरे घर चले आएमैं कैसे चुकाऊँगी ये कर्ज़उन अजनबियों केजो मेरे कोई नहीं थे!

  7. 994

    Chutti Ka Din | Shariq Kaifi

    छुट्टी का दिन । शारिक़ कैफ़ीये मेरी मौत पर छुट्टी का दिन हैकैलेंडर पर छपी ये आज की तारीख़मेरी मौत ही से लाल हो सकती थी शायदसवेरे तक जो काली रौशनाई (सियाही) से लिखी थीमज़ा ही कुछ अलग है ऐसी छुट्टी काअचानक जो मिले ये मेरा आख़िरी तोहफ़ा है अपने साथियों कोवगरना पीर (वृहस्पतिवार) का दिनकितना सर-दर्दी भरा होता है दफ़्तर काये दुनिया जानती है

  8. 993

    Baarish | Girdhar Rathi

    बारिश । गिरधर राठीबारिशजहाँ जोड़ती हैठीक वहीं तोड़ती हैगुनगुनाती हैअपने-आपलहरातीहहराती हैअपने-आपचुप हो जाती हैबरसती रहती है अपने-आपतुम्हें कुछ नहीं करने देती...दीवार हैबारिश हेबनती और टूटतीटूट-टूट पड़तीएकांत परएकांतबारिश में (भी)ढहता नहीं

  9. 992

    Badan Ka Faisla | Mohammad Alvi

    बदन का फ़ैसला । मोहम्मद अल्वीये बदनजिसे मैंबेहतरीन ग़िज़ाएँ (भोजन) खिलाता रहापानी की जगहशराब पिलाता रहायही बदनमुझ से कहता हैजाओदफ़ा हो जाओजन्नत के मज़े उड़ाओकि दोज़ख़ के अज़ाब उठाओमेरी बला सेमैं तो अबक़ब्र में सो रहूँगामिट्टी हूँमिट्टी का हो रहूँगा!!

  10. 991

    Mere Naseeb ka Likha | Shayar Jamali

     मिरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता था । शायर जमालीमेरे नसीब का लिक्खा बदल भी सकता थावो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता थाये तू ने ठीक किया अपना हाथ खींच लियामेरे लबों से तिरा हाथ जल भी सकता थाउड़ाती रहती है दुनिया ग़लत-सलत बातेंवो संग-दिल* था तो इक दिन पिघल भी सकता थासंग-दिल: पत्थर दिल उतर गया तिरा ग़म रूह की फ़ज़ाओं मेंरगों में होता तो आँखों से ढल भी सकता थामैं ठीक वक़्त पे ख़ामोश हो गया वर्नामिरे रफ़ीक़ों* का लहज़ा बदल भी सकता थारफ़ीक़: साथ रहने वालेअना को धूप में रहना पसंद था वर्नातेरे ग़ुरूर का सूरज तो ढल भी सकता थारगड़ सकी न मिरी प्यास एड़ियाँ वर्नाहर एक ज़र्रे से चश्मा* उबल भी सकता थाचश्मा: झरनापसंद आई न टूटी हुई फ़सील की राहमैं शहर-ए-तन* की घुटन से निकल भी सकता थाशहर-ए-तन: बदनवो लम्हा जिस ने मुझे रेज़ा-रेज़ा* कर डालाकिसी के बस में जो होता तो टल भी सकता थारेज़ा-रेज़ा: टुकड़े-टुकड़े

  11. 990

    Hum Rote Thodi Hain Pagal | Pradip Awasthi

    हम रोते थोड़ी हैं पागल । प्रदीप अवस्थीहमारे हिस्से आईं जो उदासियाँगले तक भर आए जो दुख के घड़ेजला गया आँखों को जो गरम पानीऔर जो कहानियाँ बनाईं अपने दिमाग़ मेंजिनमें हम सबसे उत्पीड़ित किरदारतुम्हें बाँहों में भरते ही गलेगा सबहम रोते थोड़ी हैं पागलये तो बस तस्वीरें अय्यारी करती हैं।

  12. 989

    Ye Kya Hai Mohabbat Mein | Shahryar

    ये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होता । शहरयारये क्या है मोहब्बत में तो ऐसा नहीं होतामैं तुझ से जुदा हो के भी तन्हा नहीं होताइस मोड़ से आगे भी कोई मोड़ है वर्नायूँ मेरे लिए तू कभी ठहरा नहीं होताक्यूँ मेरा मुक़द्दर (क़िस्मत) है उजालों की सियाहीक्यूँ रात के ढलने पे सवेरा नहीं होताया इतनी न तब्दील हुई होती ये दुनियाया मैं ने इसे ख़्वाब में देखा नहीं होतासुनते हैं सभी ग़ौर से आवाज़-ए-जरस* कोमंज़िल की तरफ़ कोई रवाना नहीं होता*(कारवाँ की घंटी की आवाज़)दिल तर्क-ए-तअ'ल्लुक़* पे भी आमादा नहीं हैऔर हक़ भी अदा इस से वफ़ा का नहीं होता*किसी रिश्ते का परित्याग करना

  13. 988

    Kitabein | Laxmikant Mukul

    किताबें । लक्ष्मीकांत मुकुलकितनी रहस्य भरी है किताबों की दुनियापन्नों के बीच दबे मोर-पंखयाद दिलाते हैं बचपन के कच्चे प्यारउनके लिखित उतरते जाते हैं हौले सेआत्मा की गहवर मेंउसके विस्तृत फैलाव में गुम हो जाती हैहमारी कूप मंडुकता!

  14. 987

    Jab Akhbaar Se Zyada Hon | Neelam Bhatt

    जब अख़बार से ज़्यादा हों । नीलम भट्टजब अख़बार से ज़्यादा हों पन्ने इश्तहारों केतो समझो त्योहारों का मौसम आ गया...जब रिश्तों पर हावी हो सौग़ातों का बोझतो समझो बाज़ार हम पर छा गया... क्या खरीदें, कहां से, कितना और कैसेआसान किश्तों पर खुशी खरीदने का चलन आ गया...

  15. 986

    Filwaqt Jahan Hun | Parul Pukhraj

    फ़िलवक़्त जहाँ हूँ। पारुल पुखराजजाना हैजहाँहो रही मेरी प्रतीक्षालौटना हैफ़िलवक़्त जहाँ हूँहोने की जगह मेरेअसंख्य नेवलों का वास हैसंभव है वेलुक-छिप साथ जाएँनिगलने प्रतीक्षा कोमेरी अनुपस्थिति में जोफन काढ़ती हैअक्सर

  16. 985

    Suraj Doob Raha Hai | Kumar Divyanshu Shekhar

     सूरज डूब रहा है  | कुमार दिव्यांशु शेखरसूरज डूब रहा हैऔर मन भी।गैयों के धूल उड़ाते खुरस्मृतियों के ललाते आकाश परछींटते हैंविस्मृतियों का धुँधलका।कच्ची नींद से उठबैसाख की दोपहरपूस की भोर मेंसानी-पानी देते हाथघूम जाते हैं धुँधलकों के पीछे।ललाती साँझ पर मिट्टी मलते गैयों के झुंड।जी चाहता है दो कदम तेज़ लपकसट लूँ इनसेदुलारूँ, गर्दन सहलाऊँपर मेरी बाहें छाती को चिपकी रहती हैं।फट के बह न जाए ज्वालामुखी इसलिए सीने को दबाकर बाँध दिया है इन्हेंबंधन ऐसा किनन्हें पिल्लों को दे सके बिस्कुट इतना हिलना भी है मुश्किल।सूरज डूब रहा हैडूब रही हैं आँखें-पनियायी आँखेंट्रैक्टर-थ्रेशर के इंतज़ार मेंआए तो फसल तैयार होकर पहुँचे घर को, औरपनियायी डूबी आँखें क्लासरूम में ऊपर बोर्ड के बाईं ओर कोने में पाठदाता बनकर।साँझ की ललाई कोधूमिल करते गैयों के खुरआकाश के कैनवस पर धुआँ उड़ाते हैं।धुएँ के पार छिटकी है चाँदनीवह लड़का दस बरस का अपनी ही तुकबंदियों पर नाचता है कैसेअगली भोर की चिंताओं से बेखबर।जी चाहता है दो कदम तेज़ लपकपार हो जाऊँ धुएँ केपर इतने भारी मन से धड़कता है दिलकभी भी रुक सकता हैसो धीरे चलना है मुनासिब गैयों के पीछे।सूरज डूब रहा हैऔर मन भी।

  17. 984

    Intezaar | Padma Sachdev

    इंतज़ार ।  पद्मा सचदेवफागुन की डयौढ़ी के आगेलग गया पहाड़ सूखी पत्तियों काकोई पत्ता सीधा कोई गोल-सा हुआ पड़ाकोई धीरे-धीरे ले रहा है साँसकोई लगता है यूँ बिल्कुल मरा-साटहनियों पर नए फूलआने को आतुर बड़ेहरी टहनियों के ऊपर जैसे हों मोती जड़ेखुलेगी जब कली आ ही जाएँगेमुट्ठी बंद, बंद आँख, बंद होंठसब ही तो खुल जाएँगेछोटे-छोटे हाथ पाँव, बाँह और छोटा-सा पेटखिलेगी पूरी बहारफागुन भी करता इसी का इंतज़ार

  18. 983

    Nirvaitikta - Ek Punarvichar | Satyam Tiwari

    निर्वैयक्तिकता: एक पुनर्विचार | सत्यम तिवारीहर ज़िम्मेदारी से भागने वालायही तर्क देता हैमहानता का पैमाना नहींइसलिए निर्वैयक्तिकता को देखोकथनी-करनी में अंतर की तरहएक आदमी बायाँ हाथ देकरदाहिने मुड़ जाता हैउसका इंडिकेटर ख़राब था कि मंशाआत्मरक्षा में आए दिन होती हैं हत्याएँअनजाने एक पत्ता भी नहीं हिलताजहाँ रात नहीं ढलतीजहाँ सूरज नहीं निकलताबिना गए ही वहाँ जा रहे हो कवि?ऐसा क्या पा लोगेइस ख़राबे से अलगउस ख़राबे में जुदाठोस भी होगा जो और उपयोगी भीअपनी कल्पना के कक्ष से बाहर निकलोदेखो कल्पवृक्ष ग़ायब हो चुका हैदेखोगे तो दिखेगा कि तुम्हारा व्रत टूट गया हैऔर दोषारोपण के लिए न असुर हैं न अप्सरा

  19. 982

    Main Gadhna Chahti Hoon | Priya Johri 'Muktipriya'

    मैं गढ़ना चाहती हूँ  | प्रिय जोहरी 'मुक्तिप्रिया' मैं गढ़ना चाहती हूँ एक पुरुषजो जानता होएक स्त्री होनाक्या होता है।जो जानता होगाँव छूटता है,मां-बाप का बसायाघर-संसार छूटता है,तो क्या होता है।जो जानता होकिस्त्री की कायासंसार की माया नहीं,जगत का सृजन है,हर मानस का जन्म है।जो जानता होकिसी औरत का हौसलाबनाना कोई एहसान नहीं.ईमान है उसका,सच्चे पुरुष होने काप्रमाण है उसका।जो जी सकें जीवन कोसिर्फ़एक मानव होकर,बटे बिना,किसी जेंडर की रेखा मेंदेख सकेस्त्री का समूचा संसारमर्दवादी आहम और दंभ छोड़कर।कभी दो वक्त सोचेक्यों सीता को ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ी,क्यों द्वौपदी का ही चीर हरण होता है,क्यों किसी भी औरत के चरित्र कोबिगाड़ देना इतना आसान होता है।खिला सकेदो निवालेप्रेम और करुणा सेअपनी संतान को,कर सके घर के कामपका सके दो वक्त की रोटी.कभी जाए और जलाएं अपने तन कोचूल्हे की आंच में,काटे अपने हाथ चाकू की धार सेनिकल कर देखे कि बाज़ार में क्या-क्याकहाँ मिलता है,घर के किस कोनेडिब्बे में क्या-क्या रखा हैकिस गमले में कौन सा फूलखिलता है.कब, किस तारीख कोएकादशी का व्रत अता है।जो समझे किप्रेम का सम्मानऔर रज़ामंदी के साथ होनाकितना ज़रूरी है,जो स्त्री को कोई पब्लिक असेट नहीं मानता होजो मानता होयह दुनियास्वर्ग से सुंदर होगीजब मेरे होनेऔर मेरी माँ के होने,और मेरी बहन के होनेऔर मेरी जीवन साथी के होने मेंकोई अंतर नहीं होगा।काश, ऐसा गढ़ा पुरुष समझ पाएकि एक स्त्री होना क्या होता है,बस एक स्त्री होना क्या होता है।

  20. 981

    Sapna Aur Deewaar | Langston Hughes | Translation - Dharamvir Bharti

    सपना और दीवार। लैंग्स्टन ह्यूज़अनुवाद : धर्मवीर भारतीबहुत दिन हो गए!मैं अपने सपने को लगभग भूल चुका था।लेकिन सपना अनश्वर थामेरे सामने,झिलमिलाते हुए सूरज की तरहमेरा सपना!और फिर दीवार उठी,धीरे-धीरे,मेरे और मेरे सपने के बीच।उठती गई धीरे-धीरेमेरे सपने की रोशनी कोधुँधला करते हुए,रोशनी का गला घोंटते हुए!यहाँ तक किआकाश चूमने लगीवह दीवार!दीवार की छाया......मैं काला हूँ...मैं काली छाया में कुलबुला रहा हूँ।मेरे सपनों की रोशनीन मेरे चारों ओर है,न मुझ पर आशीर्वाद-सी छाई है।सिर्फ़ काली पुख़्ता दीवारऔर उसकी कड़वी छाया!ओ मेरे हाथों!मेरी काली मज़बूत भुजाओ!तोड़ दो इस दीवार को,ढूँढ़ लाओ मेरे सपनेइस अँधेरे को चूर-चूर कर दोइस छाँह को चीर कर फेंक दो,सूरज की सहस्रों किरणें धधक उठें!लाल भट्टी की तरह सुलगते हुएलाखों सपनेपवित्र सूरज के!

  21. 980

    Ma Atithi Hai | Kumar Ambuj

    माँ अतिथि है | कुमार अम्बुजमाँ घर में आई है लेकिन वह अतिथि हैउसके पास उसके हज़ारों बाक़ी रह गए काम हैंउसके पास उसका अपना घर हैजिसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता सूनाजो भरा हुआ है बीते हुए समय सेमाँ धीरे-धीरे चली गई है इतनी दूरकि उसके सबसे स्मरणीय और चमकदार रूप के लिएलौटना होता है कई साल पहले के वक़्त मेंमैं चाहूँ तो भी नहीं रोक सकता माँ को जाने सेभूल चुका हूँ मैं हठ करनादूर-दूर तक नहीं बची रह गई है मुझमें अबोधताधीरे-धीरे मैं ख़ुद चला आया हूँ माँ से इतनी दूरकि मेरे घर में अबमाँ एक अतिथि है।

  22. 979

    Samarpan | Hemant Deolekar

    समर्पण | हेमंत देवलेकरप्रेम सबको बहा ले जाता है- नदी को भीसिर्फ़ एक शब्द है नदी के जीवन में-'समर्पण'प्रेम से ज़्यादा श्रमसाध्य कोई काम नहींजब हमें नदी के पानी मेंनदी का पसीना दिखाई देगासमुद्र के खारेपन के बारे मेंबदल जायेगी हमारी धारणाहम उसे भी एक शीशी में भरकर ले आयेंगे।

  23. 978

    Yugm | Vivek Nirala

    युग्म | विवेक निराला   एक समय में रहे होंगे कम-से-कम-दो जितने कि आवश्यक हैं सृष्टि के लिए।दो आवाज़ें भी रही होंगी कम-से-कम एक सन्नाटे की एक अँधेरे की।अँधेरा भी दो तरह का रहा होगा अवश्य एक भीतर का दूसरा बाहर का।जल-थल सर्दी-गर्मी दिन-रात युग्म में ही रहा होगा जीवनसुख-दुख से भरा हुआ।

  24. 977

    Main To Arrey Kar Ke Reh Gaya | Naveen Sagar

    मैं तो अरे! करके रह गया। नवीन सागरअरे!सब कुछ समझ से परेकोई क्या करे!क्या करे वह जो सुन रहा है अंतर्तम की आवाज़सीधे सरल जीवन की चाहआह!ओछेपन पर सर्वत्र वाह! वाह।हत्यारों पर आसमान से फूल झर रहे हैंजो मर रहे हैं उनके पासकोई नहीं हैमाँ स्तंभित है कब से रोई नहीं हैघरों में दुःख अट रहा हैअटूट बाज़ारों में सुख बिक रहा हैईश्वर से बड़ा यह कौन दिख रहा है जोहमारी दैनंदिनी लिख रहा हैजो फिंकना था वह सहेजा गया हैजो रखना था वो फिंक रहा हैअरे!मैं तो अरे करके रह गया!

  25. 976

    Vimla Ki Yatra | Savita Singh

    विमला की यात्रा | सविता सिंहउसे जाना है आज शाम चार बजे रेलगाड़ी सेजाना है पति के घर से इस बार पिता के घरएक घर से दूसरे घर जाते हैं वहीनहीं होता जिनका अपना कोई घरबारह साल की उम्र मेंविमला ब्याह दी गईजब वह गई पति के घर पहली बारउस घर को उसने बनाया अपनालीप-पोत कर चमकाया उसेकूट-पीस कर हमेशा इकट्ठा किया और रखासाल-भर का अनाजधोए सबके पाँवसिले सबके उधड़े-फटे कपड़ेकहते हैं पति का घर होता है पत्नी का घरइस बार लेकिनविमला को जाना है दुख की ऐसी यात्रा परजिसके पार उतरजीवन स्वयं अपने पार उतरता हैदुख से मिल दुखकिसी उजाड़ में जा भटकता हैपति की मृत्यु के बाद औरत का जैसे संसार बदलता हैसुबह से ही ठीक कर रही है विमलाअपने कपड़ेसँभाल रही है क़सीदाकारी के लकड़ी वाले फ्रेमरेशम के आधे-अधूरेउलझे-सुलझे धागेवे कपड़े जिन पर काढ़ रखे हैं उसने वे सारे फूलजिन्हें प्रकृति भी नहीं खिलातीवे फूल जो अमर होते हैंऔर सिर्फ़ स्त्री के हृदय में खिलते हैंया फिर विमला के लिएचुपचाप उसके गुमसुम संसार मेंपति की मृत्यु के बादआज शाम चार बजेविमला जा रही है अपने पिता के संगकुछ दिनों के लिए बहलाने मनवह जा रही है रेलगाड़ी से एक ऐसी यात्रा परजिसमें कहीं नहीं आता उसका अपना घरमन ही मन इसलिए वह मनाती हैहे ईश्वर हों जीवन में मेरे ऐसी यात्राएँ अब कमहो मेरा एक ही जीवनएक अपना घरजैसे है मेरी एक आत्मा

  26. 975

    Jab Milegi Roshni Mujhse Milegi | Ram Avtaar Tyagi

    जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी । रामावतार त्यागीइस सदन में मैं अकेला ही दीया हूँ;मत बुझाओ!जब मिलेगी, रोशनी मुझसे मिलेगी!!पाँव तो मेरे थकन ने छील डालेअब विचारों के सहारे चल रहा हूँ,आँसुओं से जन्म दे-देकर हँसी कोएक मंदिर के दीये-सा जल रहा हूँ;मैं जहाँ धर दूँ क़दम, वह राजपथ है;मत मिटाओपाँव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!!बेबसी, मेरे अधर इतने न खोलोजो कि अपना मोल बतलाता फिरूँ मैं,इस क़दर नफ़रत न बरसाओ नयन सेप्यार को हर गाँव दफ़नाता फिरूँ मैं;एक अंगारा गर्म मैं ही बचा हूँ;मत बुझाओ!जब जलेगी, आरती मुझसे जलेगी!!जी रहे हो जिस कला का नाम लेकरकुछ पता भी है कि वह कैसे बची है,सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े होवह हमीं बदनाम लोगों ने रची है;मैं बहारों का अकेला वंशधर हूँ,मत सुखाओ!मैं खिलूँगा, तब नई बगिया खिलेगी!!शाम ने सबके मुखों पर रात मल दीमैं जला हूँ, तो सुबह लाकर बुझूँगा,ज़िंदगी सारी गुनाहों में बिताकरजब मरूँगा, देवता बनकर पुजूँगा;आँसुओं को देखकर मेरी हँसी तुम -मत उड़ाओ!मैं न रोऊँ, तो शिला कैसे गलेगी!!

  27. 974

    Gair Vidrohi Kavita Ki Talaash | Lal Singh Dil

    गैर विद्रोही कविता की तलाश | लालसिंह दिल।  सत्यपाल सहगलमुझे गैर विद्रोहीकविता की तलाश हैताकि मुझे कोई दोस्तमिल सके।मैं अपनी सोच के नाखूनकाटना चाहता हूँताकि मुझे कोईदोस्त मिल सके।मैं और वहसदा के लिए घुलमिल जायें।पर कोई विषयगैर विद्रोही नहीं मिलताताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके।

  28. 973

    Manush Raag | Jitendra Srivastava

    मानुष राग ।  जितेन्द्र श्रीवास्तवधन्यवाद पिताकि आपने चलना सिखायाअक्षरोंशब्दोंऔर चेहरों को पढ़ना सिखायाधन्यवाद पिताकि आपने मेंड़ पर बैठना ही नहींखेत में उतरना भी सिखायाबड़े होकरबड़े-बड़े ओहदों पर पहुँचने वालों कीकहानियाँ ही नहीं सुनाईंछोटे-छोटे कामों का बड़ा महत्त्व बतायासिर्फ़ काम कराना नहींकाम करना भी सिखायाधन्यवाद पिताकि आपने मानुष राग सिखायाबहुत-बहुत धन्यवादयह जानते हुए भीकि पिता और पुत्र के बीचकोई अर्थ नहीं धन्यवाद काधन्यवादकि आपने कृतज्ञ होनाऔर धन्यवाद करना सिखायाधन्यवाद पितारोम-रोम से धन्यवादकि आपने लेना ही नहींउऋण होना भी सिखायाधन्यवादधन्यवाद पिता!! 

  29. 972

    Badi Hoti Ladki | Deepti Khushwah

    बड़ी होती लड़की ।  दीप्ति कुशवाहस्कूल से निकलकरपानठेलाफिर चौराहाआगेकटिंग सैलून तकलड़की नज़र नहीं उठातीकानों में पड़ती उन बातों पर,जिनके अभिप्रायकक्षा में पढ़ाए अर्थों सेहोते हैं सर्वथा ज़ुदाकोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शातीपरघर आकर वह चुप नहीं रहतीधर किनारे बस्ते कोमाँ से कहती है रोज़‘स्कर्ट को थोड़ा और लंबा कर दो’

  30. 971

    Aadmi Aadmi Se Milta hai | Jigar Muradabadi

    आदमी आदमी से मिलता है। जिगर मुरादाबादीआदमी आदमी से मिलता हैदिल मगर कम किसी से मिलता हैभूल जाता हूँ मैं सितम उस केवो कुछ इस सादगी से मिलता हैआज क्या बात है कि फूलों कारंग तेरी हँसी से मिलता हैसिलसिला फ़ित्ना-ए-क़यामत कातेरी ख़ुश-क़ामती से मिलता हैमिल के भी जो कभी नहीं मिलताटूट कर दिल उसी से मिलता हैकारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैंहोश जब बे-ख़ुदी से मिलता हैरूह को भी मज़ा मोहब्बत कादिल की हम-साएगी से मिलता है

  31. 970

    Unke Bathroom Mein | Gyanendrapati

    उनके बाथरूम में ।  ज्ञानेन्द्रपति उनके बाथरूम मेंवाशबेसिन के ऊपर लगेआईने की छाँव मेंरखे हैं दो टूथब्रशएक लम्बूतरे प्याले मेंबस माथ-भर दिखतेमुँह से मिलाए मुँहदो टूथब्रशजिस घनिष्ठता कावे एक छायाचित्र हैंवह पिचकी हुई ट्यूब में चिपकी हुई टूथपेस्ट-सीबसज़रा-सी बची हैउनके मुँह भूल गए हैं चूमना एक-दूसरे कोउन दोनों के मुँहदोमुँहेँ हो गए हैंधीरे-धीरेबेडरूम में और, ड्राइंगरूम में औरवहाँ, बाथरूम मेंवाशबेसिन के ऊपर, आईने के छाँव-तलेएक लम्बूतरे प्याले में रखे उनके टूथब्रशमाथ-भर दिखतेएक-दूसरे के गले लगे खड़े हैंअफसोस से भरेआईना उनके अफसोस को दुगना कर रहा है ।

  32. 969

    Yudh Aur Titliyaan | Deepak Jaiswal

    युद्ध और तितलियाँ । दीपक जायसवालतितलियों के दिलउनके पंखों में रहते हैंउनके पास दो दिल होते हैंलड़कियाँ उनके पंखों केप्यार में होती हैंवे उनमें भरती हैं अपना हृदयवे दुनिया कोतितलियों के पंखों के मानिंदख़ूबसूरत देखना चाहती हैं।फूलों की पंखुड़ियाँलड़कियों की आँखेंशांत नदीऔर सर्द मौसममरने नहीं देतेतितलियों को।लेकिन जब कहीं युद्ध छिड़ता हैजब किसी के हृदय को छला जाता हैजब फूल की पंखुड़ियाँसूख करगिरने लगती हैंउस क्षण तितलियाँ बूढ़ी होने लगती हैंउनके रंग पिघलने लगते हैंफिर वे लौटा देती हैं अपने पंखअपनी धरती कोयुद्ध रंगों को निगल जाते हैं।

  33. 968

    Pyar Karta Hun | Kailash Vajpeyi

    प्यार करता हूँ | कैलाश वाजपेयीमाथे की आँच सेडोरा सुलगता हैमोम नहीं गलतादेह बंद नदियाउफनाती हैनीली फिर काली फिर श्वेत हो जाती हैदार्शनिक उँगलियों सेचितकबरे फूल नहींझरती है राखअसहाय होता हूँजब-जब रिक्त होता हूँप्यार करता हूँवहीं एक सीढ़ी है नीचे उतरकरदुनिया कहलाने की।सागर के नीचे दरार हैकिरन कतराती हैपत्थर सरकाकरराह निकल जाती हैहवा की चोट सेबाँस झुलस जाता हैहरा-भरा अंधकार होता हूँप्यार करता हूँवही एक शर्त हैज़िंदा रह जाने की।

  34. 967

    Poochte Ho To Suno | Meena Kumari

    पूछते हो तो सुनो कैसे बसर होती है | मीना कुमारीपूछते हो तो सुनो, कैसे बसर होती हैरात ख़ैरात की, सदक़े की सहर होती है साँस भरने को तो जीना नहीं कहते या रबदिल ही दुखता है, न अब आस्तीं तर होती है जैसे जागी हुई आँखों में, चुभें काँच के ख़्वाबरात इस तरह, दीवानों की बसर होती है ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूँढता हैएक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है एक मर्कज़ की तलाश, एक भटकती ख़ुशबूकभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती हैदिल से अनमोल नगीने को छुपायें तो कहाँबारिशे-संग यहाँ आठ पहर होती हैकाम आते हैं न आ सकते हैं बे-जाँ अल्फ़ाज़तर्जमा दर्द की ख़ामोश नज़र होती है.

  35. 966

    Maut Bhi Jaise Khafa Ho Humse | Talat Siddiqui Natori

    मौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसे। तलअत सिद्दीक़ी नह्टोरीमौत भी हम से ख़फ़ा हो जैसेज़िंदगी एक सज़ा हो जैसेदिल के वीराने में वो यूँ आएफूल सहरा में खिला हो जैसेअपनी बर्बादी पे शर्मिंदा हूँये भी मेरी ही ख़ता हो जैसेअहमियत ये है तुम्हारे ख़त कीमेरी क़िस्मत का लिखा हो जैसेदिल मिरा यूँ हुआ पारा-पाराआइना टूट गया हो जैसेतुम मुझे हाथ उठा कर कोसोकोई मसरूफ़-ए-दुआ* हो जैसेमसरूफ़-ए-दुआ: प्रार्थना में व्यस्तउन के चेहरे पे वो अश्कों की नमीफूल शबनम से धुला हो जैसेबे-वजह मुझ से बिगड़ बैठे हैंमैं ने कुछ उन को कहा हो जैसेन तवज्जो न पयाम और सलाममुझ से वो रूठ गया हो जैसेमौज-ए-बेबाक* की मानिंद* हैं वोकोई तूफ़ाँ में पला हो जैसेमौज-ए-बेबाक: स्वतंत्र लहरमानिंद: की तरहवो ख़फ़ा हो के बहुत शरमाएआइना देख लिया हो जैसेऐसे अंजान बने वो 'तलअ'त'मेरा शिकवा न सुना हो जैसे

  36. 965

    Baans | Kanhaiyalal Sethia

    बाँस | कन्हैयालाल सेठियास्वयं उगतेनहीं उगाए जातेबाँस,नहीं होतेउनके सुमनकोई फलनहीं उनमेंचंदन की सुवास,पर बिना बाँसनहीं बनती बाँसुरी,ध्वनित होती हैजिसके छिद्रों सेराग रागिनियाँबिना उसकेनहीं बनती कलमजिससे व्यक्त होती हैंजीवन की अनुभूतियाँजो हैं अनमोलवह बिकते हैं कौड़ियाँ के मोल

  37. 964

    Vishwas | Abha Bodhisattva

    विश्वास । आभा बोधिसत्वमैंने अपने सिर परजो विश्वास की दीवार खड़ी कीवहाँ यही लिखा बार-बारदुख बहुत छोटा हैख़ुशी बहुत बड़ीछोटे और बड़े के फ़र्क़को जीना ही सागरबन जाना है एक दिनबूँद-बूँदजुड़ कर विश्व

  38. 963

    Vishwas Badhta Hi Gaya | Shivmangal Singh Suman

    विश्वास बढ़ता ही गया । शिवमंगल सिंह सुमन पथ की सरलता देखकरदो-चार डग जब बढ़ गयातब दृष्टि-पथ के सामनेआकर हिमालय अड़ गया।पथ के अथक अभ्यास परविश्वास बढ़ता ही गया।

  39. 962

    Pankh Diye Aakash Na Doge | Kanhaiyalal Sethia

    पंख दिए आकाश न दोगे | कन्हैयालाल सेठियापंख दिए, आकाश न दोगे?तो जड़ता चेतनता क्या है?फिर क्षमता-दर्बलता क्या है?केवल खेल, अगर रचना को-प्राण दिए, विश्वास न दोगे!व्यर्थ मृत्यु-जीवन की रेखा,निष्फल है कटु-मधु का लेखा,केवल कपट, अगर कोयल को-कंठ दिए, मधुमास न दोगे!हृदय-हीन की भाषा कैसी?मिलन-हीन अभिलाषा कैसी?कैवल व्यंग्य, अगर लोचन को-स्वप्न दिए, आभास न दोगे?पंख दिए, आकाश न दोगे?

  40. 961

    Bas Ek Kaam Yehi Baar Baar Karta Tha | Madhav Kaushik

    बस एक काम यही बार बार करता था ।  माधव कौशिकबस एक काम यही बार बार करता थाभँवर के बीच से दरिया को पार करता थाउसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख़्मों केजो हर लड़ाई में पीछे से वार करता थाअजीब शख़्स था ख़ुद अलविदा कहा लेकिनहर एक शाम मेरा इंतिज़ार करता थासुना है वक़्त ने उस को बना दिया पत्थरजो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता थाहवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादूनहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था

  41. 960

    Harmonium Ki Dukaan Se | Kumar Ambuj

    हारमोनियम की दुकान से । कुमार अम्बुजउस पुरानी-सी दुकान पर ग्राहक कोई नहीं थाबस एक बूढ़ा आदमी चुपचाप झुका हुआ एक हारमोनियम परइतना तन्मय और बाकी चीज़ों से इतना बेखबरकि जैसे वह उस हारमोनियम का ही कोई हिस्सावह बार-बार दबा रहा था एक रीड कोशायद उसकी स्प्रंग ठीक नहीं थीधम्मन चलाते हुए उसने कई बार उस रीड को दबायाएक हलका-सा सुर गूँजता था उस भीड़ भरे बाज़ार मेंजो दस क़दम की दूरी तय करते-करते तोड़ देता था दमगज़ब कोलाहल के बीच एक मद्धिम सुर को साध रहा था वह बूढ़ावह चिंतित था कि ठीक तरह से निकले वह सुरवह इस तरह से सुनता था उस मद्धिम सुर कोजैसे इस समय की एक सबसे ज़रूरी आवाज़मुझे याद अ रहे थे वे सारे गीत जिनमें बजता रहा हारमोनियमऔर बचपन की भजन संध्याएँजिनमें हारमोनियम बजाते थे ताऊ तो रुक जाता था पूर्णमासी का चाँदअचानक खुश हुआ वह बूढ़ाऔर तनिक सीधे होते हए धम्मन चलाकरउसने दबाई वही रीड जिसे  सुधार रहा था वह बहुत देर से

  42. 959

    Saarangi | Krishna Mohan Jha

    सारंगी | कृष्णमोहन झाउस आदमी ने किया होगा इसका आविष्कारजो शायद जन्म से ही बधिर होऔर जो अपनी आवाज़ खोजनेबरसों जंगल-जंगल भटकता रहा होया उस आदमी नेजिसने राजाज्ञा का उल्लंघन करने के बदलेकटा दी हो अपनी जीभऔर जिसकी देह मरोड़ती हुई पीड़ा की ऐंठनमुँह तक आकर निराकार ही निकल जाती होअथवा उसने रचा होगा इसेजो समुद्र के ज्वार से तिरस्कृत घोंघे की तरहअकिंचनता के द्वीप पर फेंक दिया गया होऔर जिसकी हर साँस पर काँपकर टूट जाती होउसके उफनते हृदय की पुकारया संभव हैजिसने खो दिया हो अपना घर-परिवारसाथ-साथ रोने के लिए किया हो इसका आविष्कारइस असाध्य जीवन मेंटूटने और छूटने के इतने प्रसंग हैं भरे हुएकि इसके जन्म का कारण कुछ भी हो सकता है…एक पक्षी के मरने से लेकर एक बस्ती के उजड़ने तकइसलिएजीवन के नाम पर जिन लोगों ने सिर्फ दुःख झेला हैउनकी मनुष्यता के सम्मान मेंअपनी कमर सीधी करके सुनिए इसेयह सुख के आरोह से अभिसिंचित कोई वाद्य यंत्र नहींसदियों से जमता हुआ दुःख का एक ग्लेशियर हैजो अपने ही उत्ताप से अब धीरे-धीरे पिघल रहा है…

  43. 958

    Reedh | Vishwanath Prasad Tiwari

    रीढ़। विश्वनाथ प्रसाद तिवारीकौन-सा अंग हैआदमी के शरीर में सबसे कीमतीप्रेममार्गियों ने कहा दिलज्ञानमार्गियों ने कहा दिमागकर्ममार्गियों ने कहा हाथपर रीढ़ न हो सीधीतो कैसे बनेगा आदमीकैसे खड़ा होगा वहगुरुत्वाकर्षण के विरुद्धखड़े होते हैं बंदर और भालू भीअपनी रीढ़ पर कभी-कभीपर गीदड़ और गधे कभी नहींरीढ़ झुकी है तो हाथ बँधे हैंहाथ बँधे हैं तो बँधी हैं आँखेंआँखें बँधी हैं तो बँधा है मस्तिष्कमस्तिष्क बँधा है तो बँधी है आत्मा।

  44. 957

    Bhasha | Vivek Nirala

     भाषा । विवेक निराला मेरी पीठ पर टिकीएक नन्ही-सी लड़कीमेरी गर्दन मेंअपने हाथ डाले हुएजितना सीख कर आती हैउतना मुझे सिखाती हैउतने में ही अपनासब कुछ दे जाती है।

  45. 956

    Antariksh Ki Sair | Trilok Singh Thakurela

    अंतरिक्ष की सैर | त्रिलोक सिंह ठकुरेलानभ के तारे कई देखकरएक दिन बबलू बोला।अंतरिक्ष की सैर करें माँले आ उड़न खटोला॥कितने प्यारे लगते हैंये आसमान के तारे।कौतूहल पैदा करते हैंमन में रोज हमारे॥झिलमिल झिलमिल करते रहतेहर दिन हमें इशारे।रोज भेज देते हैं हम तककिरणों के हरकारे॥कोई ग्रह तो होगा ऐसाजिस पर होगी बस्ती।माँ,बच्चों के साथ वहाँमैं खूब करुँगा मस्ती॥वहाँ नये बच्चों से मिलकरकितना सुख पाऊँगा।नये खेल सिखूँगा मैं,कुछ उनको सिखलाऊँगा॥

  46. 955

    Benaras | Kedarnath Singh

    बनारस | केदारनाथ सिंहइस शहर मे वसंतअचानक आता हैऔर जब आता है तो मैंने देखा हैलहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ सेउठता है धूल का एक बवंडरऔर इस महान पुराने शहर की जीभकिरकिराने लगती हैजो है वह सुगबुगाता हैजो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँआदमी दशाश्वमेध पर जाता हैऔर पाता है घाट का आख़िरी पत्थरकुछ और मुलायम हो गया हैसीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों मेंएक अजीब-सी नमी हैऔर एक अजीब-सी चमक से भर उठा हैभिखारियों के कटोरों का निचाट ख़ालीपनतुमने कभी देखा हैख़ाली कटोरों में वसंत का उतरना!यह शहर इसी तरह खुलता हैइसी तरह भरताऔर ख़ाली होता है यह शहरइसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शवले जाते हैं कंधेअँधेरी गली सेचमकती हुई गंगा की तरफ़इस शहर में धूलधीरे-धीरे उड़ती हैधीरे-धीरे चलते हैं लोगधीरे-धीरे बजाते हैं घंटेशाम धीरे-धीरे होती हैयह धीरे-धीरे होनाधीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लयदृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर कोइस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं हैकि हिलता नहीं है कुछ भीकि जो चीज़ जहाँ थीवहीं पर रखी हैकि गंगा वहीं हैकि वहीं पर बँधी है नावकि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँसैकड़ों बरस सेकभी सई-साँझबिना किसी सूचना केघुस जाओ इस शहर मेंकभी आरती के आलोक मेंइसे अचानक देखोअद्भुत है इसकी बनावटयह आधा जल में हैआधा मंत्र मेंआधा फूल में हैआधा शव मेंआधा नींद में हैआधा शंख मेंअगर ध्यान से देखोतो यह आधा हैऔर आधा नहीं हैजो है वह खड़ा हैबिना किसी स्तंभ केजो नहीं है उसे थामे हैंराख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभआग के स्तंभऔर पानी के स्तंभधुएँ केख़ुशबू केआदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभकिसी अलक्षित सूर्य कोदेता हुआ अर्घ्यशताब्दियों से इसी तरहगंगा के जल मेंअपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहरअपनी दूसरी टाँग सेबिल्कुल बेख़बर!

  47. 954

    Nav Varsh | Harivansh Rai Bachchan

    नव वर्ष | हरिवंशराय बच्चनवर्ष नव हर्ष नवजीवन उत्कर्ष नव।नव उमंग,नव तरंग,जीवन का नव प्रसंग।नवल चाह,नवल राह,जीवन का नव प्रवाह।गीत नवल,प्रीति नवल,जीवन की रीति नवल,जीवन की नीति नवल,जीवन की जीत नवल!

  48. 953

    Akhbaar | Balswaroop Rahi

    अखबार | बालस्वरूप राहीजिस दिन होता है इतवार, घर में आते ही अखबार, ऐसी छीन-झपट मचतीहो जाते हैं हिस्से चार!पापा को खबरों का चाव, माँ पढ़ती दालों के भाव,भैया खेलों में रमते, भाता मुझे बनाना नाव

  49. 952

    Ghar | Mohan Rana

    घर | मोहन राणाधन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षतधन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होताधन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रातधन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलतेधन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुखउसकी स्मृति कोधन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँजो बन जाती टॉकीज़,आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा मेंधन्य यह साँस,मैं कैसे भूल सकता हूँ घरऔर कोने पर धारे का पानी

  50. 951

    Hum Kya Jaane Qissa Kya Hai | Rahi Masoom Raza

    हम क्या जानें क़िस्सा क्या है  | राही मासूम रज़ाहम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोगउस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोगयादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएँहिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोगकौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती हैआपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोगफिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आईफिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोगहम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैंहम को दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोगउस महफ़िल में प्यास की इज़्ज़त करने वाला होगा कौनजिस महफ़िल में तोड़ रहे हों आँखों से पैमाने लोग

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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