Pratidin Ek Kavita
by Nayi Dhara Radio
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Episodes
-
Paragan | Hemant Deolekar
परागण। हेमंत देवलेकर तितली के होठों में दबे हैं दुनिया के सबसे सुंदर प्रेम पत्र तितली एक उड़ता हुआ फूल है हँसी किसी फूल की उड़कर जाती है एक उदास फूल के पास उड़कर जाता है मन एक फूल को, एके फूल का स्वप्न उतरता है किसी फूल के स्वप्न में दो फूलों के बीच का समय कल्पना है नए संसार की तितली की तरह…
more -
Camere Ki Aankh | Kalpana Manorama
कैमरे की आँख । कल्पना मनोरमा कैमरे की आँख होती है शातिर कहते होंगे लोग सच्चे दुख कहाँ पकड़ पाती कैमरे की आँख वह तो खोखली मुस्कान में रह जाती है फँसकर दरअस्ल, कैमरे की आँख में बैठा है आदमी का दुःख जो बचाकर आँख कैमरे की हुँकारता है बेरहमी से जिसे देखकर भाग जाता है सुख, दुम दबाकर दर्द फिर सिलने लगता…
more -
Mera Pata | Amrita Pritam
मेरा पता | अमृता प्रीतम आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ यह एक शाप है, यह एक वर है और जहाँ भी आज़ाद रूह की झलक पड़े समझना वह मेरा घर है।
-
Thakna Bhi Lazmi Tha | Zafar Iqbal
थकना भी लाज़मी था । ज़फ़र इक़बाल थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अंधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल…
more -
Nazm | Zeeshan Sahil
नज़्म | ज़ीशाल साहिल ज़िंदगी खो नहीं गई लेकिन ऐसा लगता है दिल के पास बहुत एक बे-नाम सी उदासी है एक बे-वज्ह सा अंधेरा है आग जलती नज़र नहीं आती रात ढलती नज़र नहीं आती रह गुज़र है मगर तिरी ख़्वाहिश राह चलती नज़र नहीं आती
-
Yeh Prithvi Kya Kewal Tumhari Hai ? | Gyanendrapati
यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है। ज्ञानेन्द्रपति एक शक्तिशाली राष्ट्र के सिरमौर! तुम्हारी उल्लसित कल्पनाओं में पृथ्वी तुम्हारी उँगलियों पर नाचता क्रीड़ा-कंदुक -ठीक वैसा जैसा 'दि ग्रेट डिक्टेटर' में चैपलिन ने दिखाया था तुम उसे राष्ट्र की शक्ति-साधना कहते हो जब परमाणु बम के भूमिगत परीक्षण से फिर-फिर...
-
Prarthna | Arun Kumar Singh
प्रार्थना। अरुण कुमार सिंह मैंने नदी से कहा कि मेरे घर चलो तो उसने एक बूँद दे दी। मैं उसे हृथेली में लेकर घर चला आया और अपने ग्लास में रखा। ग्लास कुऑँ बन गया। मैंने जंगल से कहा मेरे घर चलो तो उसने एक पत्ती दे दी। मैं उसे जेब में रखकर घर आ गया और गमले में बो दिया। अगले दिन उसमें जंगल उगाया। मैंने...
-
O Sheher | Jacinta Kerketta
ओ शहर! | जसिंता केरकेट्टा भागते हुए छोड़कर अपना घर पुआल, मिट्टी और खपरे पूछते हैं अक्सर ओ शहर! क्या तुम कभी उजड़ते हो किसी विकास के नाम पर?
-
Abki Baar Lauta To | Kunwar Narayan
अबकी बार लौटा तो । कुँवर नारायण अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूँगा चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं कमर में बाँधे लोहे की पूँछे नहीं जगह दूँगा साथ चल रहे लोगों को तरेर कर न देखूँगा उन्हें भूखी शेर-आँखों से अबकी अगर लौटा तो मनुष्यतर लौटूँगा घर से निकलते सड़कों पर चलते बसों पर चढ़ते ट्रेनें पकड़ते…
more -
Kabhi Kabhi Yun Bhi Humne | Nida Fazli
कभी कभी यूँ भी हम ने । निदा फ़ाज़ली कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन…
more -
Main Dekh Raha Hun | Agyeya
मैं देख रहा हूँ । अज्ञेय मैं देख रहा हूँ झरी फूल से पँखुरी - मैं देख रहा हूँ अपने को ही झरते। मैं चुप हूँ : वह मेरे भीतर वसंत गाता है।
-
Jism Kya Hai Rooh Tak | Adam Gondvi
जिस्म क्या है रूह तक । अदम गोंडवी जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़ उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये मतस्यगंधा फिर कोई होगी...
-
Yaad | Kailash Vajpeyi
याद । कैलाश वाजपेयी जहाँ में नहीं गया उन सभी देशों के वे सारे फूल मैं जिनके नाम नहीं जानता जैसे वसंत की प्रतीक्षा किए बिना खिल-खिल गए हों।
-
Kal Raat | Nida Fazli
कल रात । निदा फ़ाज़ली कल रात वो थका हुआ चुप चुप उदास उदास सुनता रहा सड़क से गुज़रती बसों का शोर पीपल का पत्ता टूट के दीवार ढा गया आंतों का दर्द नींद की परियों को खा गया झुँझला के उस ने चाँदी का दीपक बुझा दिया आकाश को समेट के नीचे गिरा दिया फैली हुई ज़मीं को धुएँ सा उड़ा दिया फिर कुछ नहीं न खेत, न...
-
Wo Zamana Guzar Gaya Kab Ka | Javed Akhtar
वो ज़माना गुज़र गया कब का । जावेद अख़्तर वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढता था जो इक नई दुनिया लूट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर…
more -
Zinda Rahein To Kya Hai | Muneer Niyazi
ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या । मुनीर नियाज़ी ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाए हम तो क्या। दुनिया में ख़ामोशी से गुज़र जाए हम तो क्या। हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, एक ख़्वाब हैं जहां में बिखर जाए हम तो क्या। अब कौन मुंतज़िर (इंतज़ार करने वाला) है हमारे लिये वहाँ, शाम आ गई...
-
Nayi Sanskriti | Doodhnath Singh
नई संस्कृति । दूधनाथ सिंह आसमान में बसा हुआ नगर निर्वसन हवा को नींव में चुनवा कर, आपस में टकराते, जूझते मकान। बँधे हुए कुत्तों का मुँह नोचते व्यवसायी जूतों के तल्लों में सोना चिपकाए कंधों पर लादे— मसान। बेतहाशा भागती हुई भीड़ अमर-बेलि की काली लतरों पर, और दुहरे चुटीले अँधेरे में गुँथे हुए पीली...
-
Maun | Arti Abodh
मौन । आरती अबोध अर्धविकसित चेतना के बहेलिए ने अव्यक्त आकांक्षाओं के मेरे मृग की हत्या कर दी जिस संग मुझे मरने का सुख भोगना था उसके न होने का संताप मेरी आत्मा में उतर आया और इस तरह प्रेम में मेरी भाषा मौन बनकर बही।
-
Prem Ke Baare Mein Ek Shabd Nahi | Viren Dangwal
प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं । वीरेन डंगवाल शहद के बारे में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूँगा वह जो बहुश्रुत संकलन था सहस्र पुष्प कोषों में संचित रहस्य रस का जो न पारदर्शी न ठोस न गाढ़ा न द्रव न जाने कब एक तर्जनी की पोर से चखी थी उसकी श्यानता गई नहीं अब भी वह काकु से तालु से जीभ के बीचों-बीच से आँखों...
-
Ghar Ek Muktibodh-Numa Kavita Hai | Kumar Divyanshu Shekhar
घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है । कुमार दिव्यनशु शेखर कुल जमा चार लोग रहते हैं छुट्टियों में गिनती कुछ बढ़ जाती है घर एक मुक्तिबोध-नुमा कविता है। अलग-अलग अँधेरे हिस्सो में अपनी ही प्राणवायु के बीच साँय-साँय करते लोग जोड़ रहे हैं लेखा-जोखा―'अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!' एक लड़का है जिसकी दाढ़ी सफेद…
more -
Kharepan Ka Ehsaas | Kanhaiya Lal Nandan
खारेपन का अहसास । कन्हैयालाल नंदन खारेपन का अहसास मुझे था पहले से पर विश्वासों का दोना सहसा बिछल गया कल, मेरा एक समंदर गहरा-गहरा सा मेरी आंखों के आगे उथला निकल गया।
-
Khut Jayein | Nilesh Raghuvanshi
खुट जाएँ । नीलेश रघुवंशी नए साल के आगमन पर पूछा गया सिंघाड़े बेचने वाली से नए साल के बारे में क्या सोचा है तुमने सिंघाड़े बेचती स्त्री ने कहा नए साल में हम खुट जाएँ खुट जाएँ मतलब.. खुट जाएँ मतलब खुट जाएँ याने हम मर जाएँ ही ही हा हा ही हा अरे अरे ए ऐसा नहीं कहते हँसी ठसक से सिंघाड़े वाली मुश्किल…
more -
Ek Baar | Rajula Shah
एक बार । राजुला शाह बह जाने देना उड़ जाने देना अपने आप को एक बार तुम भी। गुब्बारे-सा हवा के बुलबुले-सा हल्का होगा तुम्हारा मन और कहीं भी जा सकेगा बिला रोक-टोक फिर- प्रेम से इन्तज़ार में इन्तज़ार से मौन में मौन से निपट शून्य में और तुम्हें लगेगा, सबसे ताकतवर हो तुम ऊपर और ऊपर और ऊपर उठते हुए....
-
Chandini | Ramvilas Sharma
चाँदनी । रामविलास शर्मा चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुहरे पर भीगी चाँदनी; आँखों में बादल-से आँसू, हँसती है उन पर चाँदनी। दु:ख की दनिया पर बुनती है माया के सपने चाँदनी। मीठी मुस्कान बिछाती है भीगी पलकों पर चाँदनी।...
-
Parcham | Kumar Ambuj
परचम। कुमार अम्बुज वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला कोई उसे छू भी नहीं रहा है किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा लेकिन देखो, वह खिला हुआ है बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को जज़्ब करते हुए एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में आसपास की हर चीज़ इशारा करती है तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते…
more -
Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar
बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का पाखण्ड-पर्व कभी नहीं…
more -
Prem Ki Anivaaryata | Hemant Deolekar
प्रेम की अनिवार्थता । हेमंत देवलेकर बहुत असंभव-से आविष्कार किए प्रेम ने और अंततः हमें मनुष्य बनाया लेकिन अस्वीकार की गहरी पीड़ा उस प्रेम के हर उपकार का ध्वंस करने पर तुली दिया जिसने सब कुछ न्यौछावर कर देने का भोलापन, तर्क न करने की सहजता और रोने की मानवीय उपलब्धि प्रेम ने हमारी ऊबड़ - खाबड़,...
-
Sandhya Vandana | Sumitranandan Pant
सांध्य वंदना । सुमित्रानंदन पंत जीवन का श्रम ताप हरो हे! सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे! सूने जग गृह द्वार भरो हे! लौटे गृह सब श्रान्त चराचर नीरव, तरु अधरों पर मर्मर, करुणानत निज कर पल्लव से विश्व नीड प्रच्छाय करो हे! उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल, स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल तन्द्रिल पलकों में, निशि…
more -
Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma
आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा आज शाम है बहुत उदास केवल मैं हूँ अपने पास । दूर कहीं पर हास-विलास दूर कहीं उत्सव-उल्लास दूर छिटक कर कहीं खो गया मेरा चिर-संचित विश्वास । कुछ भूला सा और भ्रमा सा केवल मैं हूँ अपने पास एक धुन्ध में कुछ सहमी सी आज शाम है बहुत उदास । एकाकीपन का एकान्त कितना...
-
Pin Bahut Saare | Kunwar Bechain
पिन बहुत सारे। कुँअर बेचैन जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे । इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है 'पिन-कुशन' जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया है और चुभने के लिए हैं पिन बहुत सारे। निम्न-मध्यमवर्ग के परिवार की अल्पमासिक आय-सी है जिंदगी वेतनों का अर्थ चुकना हो गया…
more -
Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari
बागी बियाबान औरतें। ऐश्वर्या तिवारी लोग कहते हैं वो औरत है ही कहाँ, ज़्यादा सही शब्द है आफ़त। उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं, एक सूखी नदी लटकी है जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी और आधे में ही डर गया। वो हँसती है तो लगता है जैसे किसी पुराने मकान की दीवार अचानक गिर पडी हो - लोग भागते हैं...
-
Pyaar | Sarveshwar Dayal Saxena
प्यार । सर्वेश्वरदयाल सक्सेना इस पेड में कल जहाँ पत्तियाँ थीं आज वहाँ फूल हैं जहाँ फूल थे वहाँ फल हैं जहाँ फल थे वहाँ संगीत के तमाम निर्झर झर रहे हैं उन निर्झरों में जहाँ शिला खंड थे वहाँ चाँद तारे हैं उन चाँद तारों में जहाँ तुम थीं वहाँ आज मैं हूँ और मुझमें जहाँ अँधेरा था वहाँ अनंत आलोक फैला हुआ...
-
Mera Uska Parichay Itna | Ansar Kambari
मेरा उसका परिचय इतना । अंसार कम्बरी मेरा उसका परिचय इतना वो नदिया है, मैं मरुथल हूँ। उसकी सीमा सागर तक है मेरा कोई छोर नहीं है। मेरी प्यास चुरा ले जाए ऐसा कोई चोर नहीं है। मेरा उसका इतना नाता वो ख़ुशबू है, मैं संदल हूँ। उस पर तैरें दीप शिखाएँ सूनी सूनी मेरी राहें। उसके तट पर भीड़ लगी है कौन करेगा...
-
Idhar Se Dekhein To Apna Makaan Lagta Hai | Shamsur Rehman Farooqi
इधर से देखें तो अपना मकान लगता है । शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी इधर से देखें तो अपना मकान लगता है इक और ज़ाविए से आसमान लगता है जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक वो दिल जो वक़्त-ए-दुआ बे-ज़बान लगता है शुरू-ए-इश्क़ में सब ज़ुल्फ़ ओ ख़त से डरते हैं अख़ीर उम्र में इन ही में ध्यान लगता है सरकने…
more -
Hawa Jab Aayegi | Champa Vaid
हवा जब आएगी | चंपा वैद हवा जल आएगी अकेली बैठा लूँगी अपने पास चले चलेंगे हम दोनों उस कविता के पर्वत पर उड़ते, पेड़ लगाते, एक हज़ार चश्मों से एकत्रित कर जल और सूरज के प्रबल प्रकाश मैं भी धूप बटोरूँगी दिन भर हवा तुम्हारे साथ
-
Lehron Ka Geet | Sumitranandan Pant
लहरों का गीत । सुमित्रानंदन पंत अपने ही सुख से चिर चंचल हम खिल खिल पडती हैं प्रतिपल, जीवन के फेनिल मोती को ले ले चल करतल में टलमल! छू छू मृदु मलयानिल रह रह करता प्राणों को पुलकाकुल; जीवन की लतिका में लहलह विकसा इच्छा के नव नव दल! सुन मधुर मरुत मुरली की ध्वनी गृह-पुलिन नांध, सुख से विह्वल, हम हुलस...
-
Tabla | Vivek Nirala
तबला । विवेक निराला किसी की खाल है जो खींच कर मढ़ दी गई है मढ़ी हुई है मृतक की जीवन्त भाषा। मृतक के परिजनों का विलाप कस गया है इस खाल के साथ। वादक की फूँक से नहीं खाल के मालिक की आख़िरी साँस से बज रही है वह बाँसुरी जो सँगत पर है। धा-धा-धिन-धा और तिरकिट के पीछे एक विषादी स्वर है।
-
Prem Samandar | Pallavi Vinod
प्रेम समंदर। पल्लवी विनोद प्रेम समंदर-सा ही है धरती पर इतना कि सब डूब जाए इतना कि प्यास ही ना बुझे इतना कि डूबकर भी उतराता रहे निकल बाहर फिर इसी में समाता रहे प्रेम को पाना हो तो मछली बन जाना सीपी बन जाना, चाहें बन जाना कोई डूबा जहाज़ अगर मनुष्य बनोगे तो समंदर आश्चर्य देगा वैविध्य देगा गहराई देगा...
-
Bilbilaata Surya | Wazda Khan
बिलबिलाता सूर्य। वाज़दा खान डर और दबाव के घटाटोप अनधकार में बिलबिलाता सूर्य, कितना भीतर से जन्मा है सृष्टि के? भरी दुपहरी के आखिरी पलों में भी चढ़ नहीं पाया आकाश बन जाता आकाश सुनहरा तो सूर्य की रश्मियां अपराजेय हो जातीं पहुंच जातीं उन नसों में जहां डर, दबाव और ख़ून एकमेक होकर बहता है।
-
Prem Ke Baare Mein | Savita Singh
प्रेम के बारे में । सविता सिंह सिल्विया प्लाथ आओ मेरी आत्मा में बसो निश्चिंतता महसूस करो यहाँ अकेलापन कोई यातना नहीं जो ले जाए तुम्हें गैस स्टोव तक नहीं प्रेम के बदले नहीं मिला प्रेम कोई महादुख यहाँ जीवन की हल्की रोशनी में फूलों की तरह खिली हुई मिलेंगी जीवन जीने की अमूल्य सलाहें अब एक फूल जिनमें…
more -
Tumse Alag Hokar | Sarveshwar Dayal Saxena
तुमसे अलग होकर। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना तुमसे अलग होकर लगता है अचानक मेरे पंख छोटे हो गए हैं, और मैं नीचे एक सीमाहीन सागर में गिरता जा रहा हूँ। अब कहीं कोई यात्रा नहीं है, न अर्थमय, न अर्थहीन; गिरने और उठने के बीच कोई अंतर नहीं। तुमसे अलग होकर हर चीज़ में कुछ खोजने का बोध हर चीज़ में कुछ पाने की...
-
Gaon Dehaat Ki Betiyaan | Neera Parmar
गांव-देहात की बेटियां । नीरा परमार लू के थपेड़े हाड़ कंपाते जाड़े भरी बरसात में जंगल-पहाड़ नदी-नाले को लांघकर स्कूल जाती हैं दूर-दराज बियाबान में बसे गांव-देहात की बेटियां न तन ढंकने लायक कपड़े न पैरों में ढंग की चप्पल पौ फटते दो कौर बासी भात पेट में डाल घर गृहस्थी छोटे भाई-बहन मां-बाप के सौ टंटे...
-
Teddy Bear Main Bache Hue Bhalu | Gyanendrapati
टेडी बियर में बचे हुए भालू। ज्ञानेन्द्रपति बच्चियाँ जब अपने टेडी बियर को छाती से चिपकाए दुलार रही होंगी छीज रहे भारतीय जंगलों में और खोजी दलों और अनुसंधान-स्टेशनों के कचरालय बने जा रहे ध्रुवीय प्रदेशों में बेमौत मारे जा रहे होंगे भालू काले भालू और भूरे भालू बगैर किसी रंग-भेद के कौन मार रहा होगा...
-
Bachcha | Indu Jain
बच्चा । इन्दु जैन औरत के सिर पर गठरी है कमर पर बच्चा मर्द हाथ में बक्सा लटकाये है बच्चा रो रहा है लगातार हाथ-पाँव पटक रहा बार-बार औरत के समझाने मर्द के झुँझलाने के बावजूद वह पैर-पैर चलना चाहता है और गठरी अपने सिर पर उठाना चाहता है।
-
Kavitayein | Dharmesh
कविताएँ । धर्मेश ख़त्म हो चुकी हैं कविताएँ शब्दों ने कर ली है सामूहिक आत्महत्या मजनूँ के क़त्ल हो जाने के डर से लैला ने तिलांजलि दे दी है अपने प्रेम की जंगल की हत्या पर आमादा शहर चीर चुका है नदी का हृदय सियारों को गाली देने वाले आदमी ने नोच खाया है एक और आदमी को मेरी आँखों में अब भी बचा है प्रेम…
more -
Angootha Chaap Neta | Kaka Hathrasi
अँगूठा छाप नेता । काका हाथरसी चपरासी या कलर्क जब करना पड़े तलाश। पूछा जाता—क्या पढ़े, कौन क्लास हो पास? कौन क्लास हो पास, विवाहित हो या क्वारे। शामिल रहते हो या मात-पिता से न्यारे? कह ‘काका’ कवि, छान-बीन काफ़ी की जाती। साथ सिफ़ारिश हो, तब ही सर्विस मिल पाती॥ कर्मचारियों के लिए, है अनेक…
more -
Bitiya Murmu Ke Liye | Nirmala Putul
बिटिया मुर्मू के लिए | निर्मला पुतुल उठो कि अपने अँधेरे के ख़िलाफ़ उठो उठो अपने पीछे चल रही साज़िश के ख़िलाफ़ उठो, कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो जैसे तूफ़ान से बवण्डर उठता है उठती है जैसी राख में दबी चिनगारी देखो ! अपनी बस्ती के सीमान्त पर जहाँ धराशाई हो रहे हैं पेड़ कुल्हाड़ियों के सामने असहाय रोज़...
-
Santulan Ke Liye | Shayak Alok
संतुलन के लिए । शायक आलोक वे जिस दुनिया में आए हैं वह है एक हँसती खिलखिलाती दुनिया। सब सुंदर है, लगे उन्हें इसलिए मैं मुस्कुरा देता हूँ नए बच्चों की तरफ़ आँखें मिचमिचा देता हूँ। एक दुख की कथा से दूसरे दुख के किरदार को मिलता है सहारा इसलिए मैंने अपवित्र पवित्रताओं को जीवन में उतारा। दुनिया के...
-
Koi Mere Saath Chale | Sarveshwar Dayal Saxena
कोई मेरे साथ चले। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना मैंने कब कहा कोई मेरे साथ चले चाहा ज़रूर! अक्सर दरख्तों के लिये जूते सिलवा लाया और उनके पास खडा रहा वे अपनी हरीयाली अपने फूल फूल पर इतराते अपनी चिडियों में उलझे रहे मैं आगे बढ गया अपने पैरों को उनकी तरह जडों में नहीं बदल पाया यह जानते हुए भी कि आगे बढना…
more -
Ahaa Buddhimanon Ki Basti | Mahesh Anagh
अहा बुद्धिमानों की बस्ती । महेश अनघ अहा बुद्धिमानों की बस्ती या तो चुप्पी या तकरार - कोने-कोने भूत बियाने सारा घर सन्नाटेदार । सूचीबद्ध हुई दिनचर्या मज़बूरी रेखांकित है चौके से चूल्हे की अनबन हर भांडा आतंकित है किसी ख़ास दिन ख़ास वजह से काग़ज़ पर लिखते हैं प्यार। यों तो इस भुतहा बाखर में कोई आएगा...
About this show
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
Hosted by
Nayi Dhara Radio