PODCAST · arts
Pratidin Ek Kavita
by Nayi Dhara Radio
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
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1000
Bin Gharni Ghar Bhoot ka Dhera | Abha Bodhisattva
बिन घरनी घर भूत का डेरा । आभा बोधिसत्वहज़ारों ग्रहों मेंयह धरती बहुत छोटी-सी है,हज़ारों घरों मेंबहुत छोटा हैतुम्हारा घरतुम्हारा छोटा-सा घर था,ढेर सारे छोटे-छोटे समानों से भराफिर भी तुम्हारा मन नहींलगता था उससेतुमने अपने मनोरथ के लिए,लिया मेरा साथ,क्योंकिबिना घरनी के तुम्हारा घर थाभूत का डेरा
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999
Kehte Hain Taare Gaate Hain | Harivansh Rai Bachchan
कहते हैं, तारे गाते हैं! । हरिवंश राय बच्चनकहते हैं, तारे गाते हैं!सन्नाटा वसुधा पर छाया,नभ में हमने कान लगाया,फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!कहते हैं, तारे गाते हैं!स्वर्ग सुना करता यह गाना,पृथ्वी ने तो बस यह जाना,अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!कहते हैं, तारे गाते हैं!ऊपर देव तले मानवगण,नभ में दोनों गायन-रोदन,राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं!कहते हैं, तारे गाते हैं!
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998
Antim Sipahi Ki Tarah | Leeladhar Mandloi
अंतिम सिपाही की तरह । लीलाधर मंडलोईमैं उनके लिए पागल हूँ जिन्हें बचा नहीं सकामैं उनके लिए रोता हूँ जो लड़ते हुए क़ब्र में अब भी ज़िंदा हैंमैं रस्मी मातम में शरीक़ नहींमैं उन आवाज़ों में हूँ जिनमें मुक्ति का गान गूँजता हैमैं उनके लिए अपनी घृणाओं को आकाश करना चाहता हूँमैं न्याय के लिए अंतिम सिपाही की तरहजीत के लिए मर जाना चाहता हूँ।
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997
Har Baar Deewaar | Jyotsna Milan
हर बार दीवार। ज्योत्स्ना मिलनआसमान होगा की उम्मीद मेंबाहर देखती खिड़की सेबाहरदीवार होती सामनेऔर होतीफाँक भर धूपदो दीवारों के बीच धरी-सीदीवार की जगहआसमान नहीं निकला कभीघास का मैदान भी नहींखिड़की के बाहरहर बारएक दीवारआसमान के बदले।
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996
Main Dhoondhta Hun Jisey | Kaifi Azmi
मैं ढूँडता हूँ जिसे । कैफ़ी आज़मीमैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलतानई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलतानई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाएनए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलतावो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिराकिसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलतावो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हेकि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलताजो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँयहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलताखड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल मेंतुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
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995
Mujhko Tera Shabab Le Baitha | Shiv Kumar Batalvi
मुझ को तेरा शबाब ले बैठा। शिव कुमार बटालवीअनुवाद: आकाश 'अर्श'मुझ को तेरा शबाब ले बैठारंग, गोरा गुलाब ले बैठादिल का डर था कहीं न ले बैठेले ही बैठा जनाब ले बैठाजब भी फ़ुर्सत मिली है फ़र्ज़ों सेतेरे रुख़ की किताब ले बैठाकितनी बीती है कितनी बाक़ी हैमुझ को इस का हिसाब ले बैठामुझ को जब भी है तेरी याद आईदिन-दहाड़े शराब ले बैठाअच्छा होता सवाल ना करतामुझ को तेरा जवाब ले बैठा'शिव' को इक ग़म पे ही भरोसा थाग़म से कोरा जवाब ले बैठा
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994
Janamdin | Baby Shaw
जन्मदिन । बेबी शॉ तुम्हें सोचते हुएरोज़एक नई दुनिया रचती हूँमिट्टी के चावलधूल की सब्ज़ीपत्ते की रोटीखेल-घर जैसी...एक ऐसी दुनियाजिसे कोई नहीं जानताजहाँप्रकाश-लोभ सेस्वयं को जलाती हूँ मैं...
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993
Apna Yatna Mein | Savita Singh
अपनी यातना में । सविता सिंह वह सो चुकी थी कई नींदेंकई दिन और रातें बीत चुकी थींकई ज़िंदगियाँ बन और बिखर चुकी थीं इस बीचलेकिन एक सपना था जो अब भी झिलमिला रहा थाजिसकी झालर को पकड़ वह उठी थीऔर उन फूलों को ढूँढ़ने लगी थीजिन्हें सीने से लगा वह सोने गई थीजागने पर यह संसार उसे अब भीबहुत जाना-पहचाना ही लगा थाफूल भले अनुपस्थित थेलेकिन उसके प्रेमी वहाँ खड़े थे बाँहें फैलाएहर हाल में प्रेम बचा रहता है उसने सोचा थाफिर आह्लादित हो ख़ुद से कहा थाआसमान को छत और धरती को बिस्तर बनासमुद्र की तरह कोई गीत गाना चाहिएतभी उसका एक प्रेमी उसे बालों से पकड़खींचता हुआ ले गया नींद और सपनों से बाहरसमेटे हुए अपने सीने में चुराए उसके सारे फूलजहाँ सब कुछ नया था अपनी यातना में
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992
Vismriti ka Phool | Gobind Prasad
विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद...मैं हूँमैं हूँ किसी का...हूँ किसी कासपनादेखा हुआ अनदेखाअपनास्मृति में जैसे बसा-किसी कीविस्मृति का फूलबन, खिलने की हसरत मेंदिन-रात तपनापहरों-पहरों, देह की देहरी पररह-रहकर अंगार-सादहकना
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991
Rone Wala Hi Gaata Hai | Gopaldas Neeraj
रोने वाला ही गाता है । गोपालदास नीरजरोने वाला ही गाता है!मधु-विष हैं दोनों जीवन मेंदोनों मिलते जीवन-क्रम मेंपर विष पाने पर पहले मधु-मूल्य अरे, कुछ बढ़ जाता है।रोने वाला ही गाता है!प्राणों की वर्त्तिका बनाकरओढ़ तिमिर की काली चादरजलने वाला दीपक ही तो जग का तिमिर मिटा पाता है।रोने वाला ही गाता है!अरे! प्रकृति का यही नियम हैरोदन के पीछे गायन हैपहले रोया करता है नभ, पीछे इंद्रधनुष छाता है।रोने वाला ही गाता है!
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990
Karbala | Rajesh Joshi
कर्बला। राजेश जोशीपानी पियो तो याद करो प्यास इमाम हुसैन की!पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो बादलों कानदियों, तालाबों और समुंदरों काशुक्रिया अदा करो समुंदरों कासमुद्रों का पानी पीने के काम न आए तो भी!पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो कुम्हारों काजिन्होंने बनाए पृथ्वी की तरह गोल मटकेऔर बहुत सुंदर सुराहियाँ जिनकी गरदनेंसुंदर स्त्रियों की तरह पतली और लंबी हैं!पानी पियो तो सोचो।काटी तो नहीं तुमने दूसरों की नहरेंकिसी की प्यास के रास्ते में तुम यज़ीद तो नहीं?पानी पियो तो याद करो उस शख़्स कोतपते रास्तों में जिसने दियागुड़ और पानीजिसने रास्तों में बिठाईं ठंडे पानी की सबीलेंउसका शुक्रिया अदा करो!उसका भी जिसने कम से कम इच्छा कीप्याऊ लगाने की!पानी पियो तो सोचोखारा तो नहीं हुआ है तुम्हारी आत्मा का जलपानी पियो तो सोचो नन्हे अली असग़र के बारे मेंसोचो कहीं अंधे तीर में तो नहीं बदल गई हैतुम्हारी घृणा!
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989
Jharkhand Ke Pahadon Ka Aranyarodan | Gyanendrapati
झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन । ज्ञानेन्द्रपतिडबडबा आया है भुरुकवापूरब में भिनसार का भान हैचिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहलेअँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज हैवह कौन हैइस नीरव झारखण्ड मेंअपने कलपने कोअपने भी कानों से दूरहिरदै की मुट्ठी में कसे हुए?वे छोटानागपुर के ठिगने पहाड़ हैंयहाँ के काले दुबले हड़ियल बूढ़ेआदिवासियों की तरह ही चुप्पा कठिननए दिन के लिए वे तैयार कर रहे हैं ख़ुद कोअब आएँगे पर्वतों के पंख काटने वाले वज्रधर इन्द्र के वंशजअपनी फटफटिया में भड़भड़िया मेंऔर फटाफट धड़ाधड़चालू हो जाएँगे क्रशरबारूद की गन्ध फैल जाएगी हवा मेंउनके टूटने की गन्ध के ऊपरऔर वे बोल्डरों में गिट्ठियों में खण्ड-खण्ड हो जाएँगेचौड़े पंजरों वाले ट्रकों के पेटटायरों की हवा तक भरते जाएँगे जल्दी-जल्दीऔर धीरे-धीरे चमक बढ़ती जाएगीउन चेहरों परजिनकी जेब में उन्हें तोड़ने का पट्टा है यानी एक मुहर लगा बेमतलब-सा पर मतलबी कागज़और ख़ुश जो मन ही मन कहेंगेआज ठर्रा नहीं, विलायती चलेगीएक नया दिनकि पुराना दिनहै इन प्राचीन पहाड़ों के सामनेतेज़ हवाओं में जिनकी ठोस काया में भीतर ही भीतरअभी भी बज उठता है मैग्मा-धरती का वह मूल द्रव्य-जलतरंग-साजिनकी आग्नेय चट्टानेंधरती की प्राचीनतम रचनाएँ हैंहिमालय के पर्वत-वलय जिनके बच्चे-बुतरूधुँधली आँखें उठाए नेह से निहारते हैं वे। भुकम्प-तरंगें छोड़ती एड़ियाँ उचका नभ में उठतेहिमालय के वर्फीले-गर्वीले शिखरों के युवमाथसत्तर करोड़ वर्षों का समय पसरा हुआ हैउनकी काली घिसी हुई देह मेंवे पर्वतकुल के आदि पुरुष हैंबस सात करोड़ वर्ष हुए हैं, इनके कुल-खुँट मेंउगी थी हिमालय की कोंपलविन्ध्याचल तब नाच-नाच उठा था मगन अरावली पर्वत-मालाओं ने गाए थे सोहरआशीष दिया था इन पठारों सेआदिपर्वतों नेये वही पुरखे पहाड़ हैं जिनके हाड़आज लालची मानव-गिद्धों का भोजन-भरपूरब मेंडबडबा आया है भुरुकवाकि जैसे वह छोटानागपुर के छीजते जंगलों, मिटती वनस्पतियों, खंखुरते खनिजों कीआँख होकि क्या धरा है भू मेंइन भूधरों की छाँह के गुज़र जाने के बादबस आतप और बिपत ।
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988
Phir Kahe Ki Dooriyan | Anwar Suhail
फिर काहे की दूरियाँ । अनवर सुहैलदेखकर मुझको तुम्हें याद आती बिरयानी कीमिलकर मुझसे बातें करते शराब-शबाब से लबरेज़ ग़ज़लों कीतुम्हारे संवाद में अचानक उर्दू कुछ ज़्यादा आ जातीऔर अपने उर्दू ज्ञान से प्रभावित करने के लिएकहते मुझे जनाब की जगह ‘ख़ुदा-हाफ़िज़’जबकि मैं तुम्हारी तरह इसी मिट्टी की उपज हूँउतना ही हिंदी, उतना ही देसी, उतना ही देहाती जितने तुमफिर मुझे क्यों देखते हो एक परदेसी की तरहमैं कोई एलियन नहीं हूँ भाईखान-पान, बरत-त्यौहार, रीत-रिवाज अलग होते हुए भीकितने एक से हैं...देखो न,बेटियाँ बिदा के वक़्त रोती हैं तुम्हारे यहाँऔर भर आती हैं आँखें लड़के वालों की भीहमारे यहाँ भी तो ऐसा ही होता है भाईफिर काहे का अंतर...फिर काहे की दूरियाँ...
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987
Mitti Ki Kaaya | Vishwanath Prasad Tiwari
मिट्टी की काया । विश्वनाथ प्रसाद तिवारीइसी में बहती हैमंदाकिनी अलकनंदाइसी में चमकते हैंकैलाश नील्कंठइसी में लिखते हैंब्रह्मकमलइसी में फड़फड़ाते हैंमानसर के हंसमिट्टी की काया है यहइसी में छिपती हैब्रह्मांड की वेदना।
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986
Tope | Viren Dangwal
तोप । वीरेन डंगवाल कंपनी बाग़ के मुहाने परघर रखी गई है यह 1857 की तोपइसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिलेकंपनी बाग़ की तरहसाल में चमकाई जाती है दो बारसुबह-शाम कंपनी बाग़ में आते हैं बहुत से सैलानीउन्हें बताती है यह तोपकि मैं बड़ी जबरउड़ा दिए थे मैंनेअच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जेअपने ज़माने मेंअब तो बहरहालछोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर यह फ़ारिग़ होतो उसके ऊपर बैठ करचिड़ियाँ ही अक्सर करती हैं गपशपकभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैंख़ास कर गौरैयेंवे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोपएक दिन तो होना ही है उसका मुँह बंद
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985
Zara Zara Sa | Sunita Jain
ज़रा-ज़रा-सा। सुनीता जैनजी में जी खुलता हैज़रा-ज़रा-साफागुन ऋतु का बौरहवा घुलता हैज़रा-ज़रा-सागेरू रंग मधुमाखी हैरंग पीला ततै -य्या ज़हरीलातितली के तो रंग गिनूँ क्याहर रंग ही चट -कीलाअंतस में ज्वार उमड़ताकहाँ कहाँ काज़रा-ज़रा-सा
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984
Yehi hai Saadgi | Pablo Neruda | Translation - Prabhati Nautiyal
यही है सादगी । पाब्लो नेरूदा अनुवाद - प्रभाती नौटियालख़ामोश है ताक़त (पेड़ बताते हैं मुझे)और गहराई (बताती हैं जड़ें)और शुद्धता (बताता है आटा) किसी पेड़ ने नहीं कहा मुझसे”मैं सबसे ऊँचा हूँ।“किसी जड़ ने नहीं कहा :”मैं ही आती हूँ सबसे गहराई से ।“और कभी नहीं कहा रोटी ने :”कुछ भी नहीं है रोटी जैसा ।“
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983
Abhida Ki Ek Sham | Vivek Nirala
अभिधा की एक शाम। विवेक निराला एक छोटी शाम जोलम्बी खिंचती जाती थीबिल्कुल अभिधा में।रक्ताभा लिए रविलुकता जाता था।लक्षणा के लद चुकेदिनों के बादअभिधा की एक छोटी-सी शामधीरे-धीरेकरती रही अपना प्रसारबढ़ती जाती थी भीड़सिकुड़ता रहा सभागार।रचना ही बचना हैकोहराम मचना है-कहा कभी किसी नेबे दांत जबड़ों के बीचकुतरे जाते हुए।अहंकार से लथपथशतपथी ब्राहम्णों केपान से ललाये मुखसे होते हुए आख़िरपेट में जा पचना है।आयताकार प्रकाश पुंज फैला है भीतरबाहर शाम कोलील रहा अंधकारमंच पर आसीनपहने कौपीनलकदक लिये घातक हथियारआतुर थे करने को एकल संहार।वायु-मार्ग से आयेऋषिगण करते आलोचनलोहित लोचन।थके चरण वह वधस्थल को जाता उन्मन नतनयन।माला और दुशाला कोडाला एक कोने में:वध के पश्चात रक्तसहेज कर भगोने में,तेज़ धार वह कटारपोंछ-पाछ साफ़ करअन्तिम यह वाक्य कहा-"हल्का है, बासी है कल का है,डिम्ब है न बिम्ब हैअभिधा है, अभिधा हैअग्नि को जो अर्पण हैमेरी प्रिय समिधा है।"
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982
Prakriya | Kedarnath Singh
प्रक्रिया । केदारनाथ सिंहमैं जब हवा की तरहदृश्यों के बीच से गुज़रता हुआअकेला होता हूँतो क्षण भर के लिएमुझे कहीं भी देखा जा सकता हैकिसी भी दिशा सेकिसी भी मोड़ परकिसी भी भाषा के अज्ञातशब्दकोश मेंपर मैंजब कहीं नहीं होतासिर्फ़ कहीं होने की लगातार कोशिश मेंसामने की भीड़ कोदूर से पहचानता हुआहवा के आर-पारएक प्रश्न उछालता हूँऔर हँसता हूँतो न जाने क्योंमुझे लगता हैकि गूँज-हीन शब्दों के इस घने अंधकार मेंमैं—अर्थ-परिवर्तन कीएक अबूझ प्रक्रिया हूँजिसके भीतरये लोगझाड़ियाँबत्तख़ें और भविष्यहर चीज़ एक-दूसरे मेंघुली-मिली हैजड़ें रोशनी में हैंरोशनी गंध में,गंध विचारों मेंविचार स्मृतियों में,स्मृतियाँ रंगों में...और मैं चुपचापइस संपूर्ण व्यतिक्रम कोभीतर सँभाले हुएचलते-चलतेझुककररास्ते की धूल सेएक शब्द उठाता हूँऔर पाता हूँ कि अरेगुलाब!
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981
Vismriti | Sushma Kumari
विस्मृति। सुषमा कुमारी हम दूसरी दुनिया केचौथे, पाँचवे या सबसे निचले दर्जे केबचे हुए मुट्ठी भर अनाज हैं,आधे गेहूँ और आधे घून की तरहबची हुई हमारी नियतिजातें में पीसने को तैयार है!गेहूँ है, घून हैचक्की है, आटा है,भूख अब भी बैठी है आँत मेंहवा बदली है, मौसम बिगड़ा है।अख़बारों में युद्ध अब सबसे बड़ा मुद्दा नहीं,चूल्हे का सवालइन दिनों सबसे बड़ा सवाल है!और चूहेदानी में फंसेरोटी के टुकड़े सबसे बड़ा जाल है!पत्थर से आगऔर आग से चूल्हा जलाने वाले लोगइन दिनों विस्मृति का शिकार हैं!
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980
Sau Sau Janam Pratiksha Kar Lun | Bharat Bhushan
सौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँ। भारत भूषणसौ-सौ जनम प्रतीक्षा कर लूँप्रिय मिलने का वचन भरो तो!पलकों-पलकों शूल बुहारूँअँसुअन सींचू सौरभ गलियाँभँवरों पर पहरा बिठला दूँकहीं न जूठी कर दें कलियाँफूट पडे पतझर से लालीतुम अरुणारे चरन धरो तो!रात न मेरी दूध नहाईप्रात न मेरा फूलों वालातार-तार हो गया निमोहीकाया का रंगीन दुशालाजीवन सिंदूरी हो जाएतुम चितवन की किरन करो तो!सूरज को अधरों पर धर लूँकाजल कर आँजूँ अँधियारीयुग-युग के पल छिन गिन-गिनकरबाट निहारूँ प्राण तुम्हारीसाँसों की ज़ंजीरें तोड़ूँतुम प्राणों की अगन हरो तो!
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979
O Achchi Ladkiyon | Pratibha Katiyar
ओ अच्छी लड़कियों | प्रतिभा कटियार ओ अच्छी लड़कियो,तुम मुस्कुराहटों में सहेज देती हो दुःखओढ़ लेती हो चुप्पी की चुनरजब बोलना चाहती हो दिल सेतो बाँध लेती हो बतकही की पाजेबनाचती-फिरती होअपनी ही ख़्वाहिशों परऔर भर उठती हो संतोष सेकि ख़ुश हैं लोग तुमसेओ अच्छी लड़कियो,तुम अपने ही कंधे पर ढोना जानती होअपने अरमानों की लाशतुम्हें आते हैं हुनर अपनी देह को सजाने केनिभाने आते हैं रीति-रिवाज, नियमजानती हो तुम कि तेज़ चलने वाली औरखुलकर हँसने वाली लड़कियों कोज़माना अच्छा नहीं कहतातुम जानती हो कि तुम्हारे ही अच्छे होने पर टिका हैइस समाज का अच्छा होनाओ अच्छी लड़कियो,तुम देखती हो सपने में कोई राजकुमारजो आएगा और ले जाएगा किसी महल मेंजो देगा ज़िंदगी की तमाम ख़ुशियाँसँभालोगी उसका घर परिवारउसकी ख़ुशियों पर निसार दोगी ज़िंदगीबच्चो की खिलखिलाहटों में सार्थकता होगी जीवन कीऔर चाह सुहागन मरने कीओ अच्छी लड़कियोंतुम थक नहीं गयीं क्या अच्छे होने की सलीब ढोते ढोतेसुनो, उतार दो अपने सर से अच्छे होने का बोझलहराओ न आसमान तक अपना आँचलहँसो इतनी तेज़ कि धरती का कोना-कोनाउस हँसी में भीग जाएउतार दो रस्म-ओ-रिवाज़ के ज़ेवर और मुक्त होकर देखो संस्कारों की भारी-भरकम ओढ़नी सेअपनी ख़्वाहिशों को गले से लगाकर रो लो जी भर केआँखों में समेट लो सारे ख़्वाबजो डर से देखे नहीं तुमने अब तकओ अच्छी लड़कियों,अब किसी और का नहींसँभालो सिर्फ़ अपना मानबेलगाम नाचने दो अपनी ख़्वाहिशों कोऔर फूँक मारकर उड़ा दो सीने में पलतेसदियों पुराने दुःख कोपहन के देखोलोगों की नाराज़गी का ताज एक बारऔर फोड़ दो अच्छे होने का ठीकराओ अच्छी लड़कियों!
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978
Auratein Kaam Karti Hain | Shubha
औरतें काम करती हैं । शुभाचित्रकारों, राजनीतिज्ञों, दार्शनिकों कीदुनिया के बाहरमालिकों की दुनिया के बाहरपिताओं की दुनिया के बाहरऔरतें बहुत से काम करती हैंवे बच्चे को बैल जैसा बलिष्ठनौजवान बना देती हैंआटे को रोटी मेंकपड़े को पोशाक मेंऔर धागे को कपड़े में बदल देती हैंवे खंडहरों कोघरों में बदल देती हैंऔर घरों को कुएँ मेंवे काले चूल्हे मिट्टी से चमका देती हैंऔर तमाम चीज़ें सँवार देती हैंवे बोलती हैंऔर कई अंधविश्वासों को जन्म देती हैंकथाएँ और लोकगीत रचती हैंबाहर की दुनिया केआदमी को देखते हीऔरतें ख़ामोश हो जाती हैं।
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977
Laut Te Nahi Pita | Kumar Divyanshu Shekhar
लौटते नहीं पिता । कुमार दिव्यनशु शेखर नीम-अँधेरे घर से निकले पिताअँधेरे से पहले लौट आने की बात दोहरा के।लौटी एक ख़बरलौटा एक एम्बुलेस।नीम-अँधेरे निकले पिताफिर नहीं लौटे।स्मृतियाँ लौट आती हैंबार-बारलौट आती हैं हिदायतेंलौटता है चेहराआँखों को बाँह ढाँपे लौट आता है सावनलौटती है गंगा की धारागाय के नाँद में चाराबारिश की नालियाँ-भुट्टों में बालियाँतुलसी का पत्ता-बया का जत्थाभोर की ओसबेठोसलौट आती है।तारीख लौट आती हैलौटते नहीं पिता।
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976
Hulchal | Anurag Tiwari
हलचल। अनुराग तिवारी तेज़ कुछ भी हो सकता हैकिंतुसबसे तेज़ क्या हैचीते की चालबाज़ की नज़रनहीं।सबसे तेज़ हलचल होती हैजैसे आज एक हलचल हुई,मेरी आहट से दीवार पर चिपकी छिपकलीकोने में घुस गई।सबसे तेज़ हलचल शेयर बाज़ार में नहीं होती!एक्ज़िट पोल में भी हलचल तेज़ नहीं होती!भारत पाक मैच में दिन भर हलचल रहती हैलेकिन सबसे तेज़ नहीं।सबसे तेज़ हलचलउस चेतना में होती हैजिसे भ्रम था सदैव स्वतंत्र रहने का!सबसे तेज़ हलचलउस राष्ट्र की भूमि में होती हैजिसे वरदान था अखण्ड होने काजो सदा उर्वर रही वासियों के पोषण को!सबसे तेज़ हलचलउस पेट में होती हैजिसके चूहे आख़िरी साॅंस तक कूदने के बादअब मर चुके हैं!सबसे तेज़ हलचलउस हिरण की आंखों में होती हैजिसने देख लिया है बाघदूर से!सबसे तेज़ हलचलउस स्त्री की धड़कन में होती हैजिसने बाघ नहीं देखाकिंतु देख लिया है एक जानवरजो मांस नहीं खाताख़ून नहीं पीताहड्डियां भी नहीं चूसतावह चमड़ियो को कूरेदता हुआनष्ट कर देता है आपकी आत्मा से'आबरू' जैसा कोई शब्द!
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975
Bacha Rahe Humare Beech Ka Ishwar | Arun Kumar Singh
बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर । अरुण कुमार सिंह तुम जागती करवटों से लिखते हो कोई नामसुबह चादर बूँद-बूँद निचोड़ती है अपनी पीड़ाबहेलिए ने मारा फिर कैद कीएक चिड़ियाजिसके पेट में मिली थी प्रेम कविताउसे क्रांति की कविता भी कहा गया।जिस रात ठंड को याद कर चादर ओढ़ी थी,गर्मी बहुत थी और हम पसीने से तरबतर।ये कैसी त्रासदी जी रहे हैं हम,पास बने रहने के लिए दूर जाना ज़रूरीजिन रातों में कुछ नहीं लिखा तुमनेजीवन लिख रहा था तुम्हारे माथे पर अपनी कविता।कोई किसी की पीठ पर सिर टिकाकर करता है प्रार्थनाकि उनके बीच का ईश्वर बचा रहे।कितना कुछ छिपा रहता है शब्दों की चुप्पी के भीतरकिसी दिन झाडू लेकर बु्हार देंगे सारे शब्दऔर बटोर लेंगे चुप्पी किसी लिपिवादक को बुलाकर अनुवाद कराना उसका।पलकों की सलवटों में सांप बसने लगेंतो ज़हरीली दिखती है दुनिया।रक्षक बनने की प्रवृत्ति के दोषी हैं हम, सखीक्या एक दिन ख़ुद ही के बनाए संकट में डालकरएक दूसरे को बचाने का खेल खेलेंगे हम?और हार जायेंगे सारी बाज़ी।तुम्हारे ईश्वर की मूर्ति में दरार दिखेगी,तो क्या अपने आंसुओं से भरोगे उसे?सुनो, हारने से ठीक पहले रख देनामेरे माथे पर अपना माथाहम आखिरी प्रार्थना फिर करेंगे,कि बचा रहे हमारे बीच का ईश्वर।
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974
Chaton Par Ladkiyan | Alok Dhanwa
छतों पर लड़कियाँ । आलोक धन्वाअब भीछतों पर आती हैं लड़कियाँमेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिएजो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैंनाले के ऊपर बनी सीढ़ियों पर औरफ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों परचाय पी रहे हैंउस लड़के को घेर करजो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन परआवारा और श्री 420 की अमर धुनें।पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकानसामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं।उनमें सभी छात्र नहीं हैंकुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,और कुछ लफंगे भीलेकिन उन सभी के ख़ून मेंइंतज़ार है एक लड़की का !उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों सेकिसी शाम प्यार आयेगा !
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Hoke Mayoos Na Yun Sham Se Dhalte Rahiye | Kunwar Bechain
हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए। कुंवर बेचैनहो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिएज़िंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिएएक ही ठाँव पे ठहरेंगे तो थक जाएँगेधीरे धीरे ही सही राह पे चलते रहिएआप को ऊँचे जो उठना है तो आँसू की तरहदिल से आँखों की तरफ़ हँस के उछलते रहिएशाम को गिरता है तो सुब्ह सँभल जाता हैआप सूरज की तरह गिर के सँभलते रहिएप्यार से अच्छा नहीं कोई भी साँचा ऐ 'कुँवर'मोम बन के इसी साँचे में पिघलते रहिए
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Stree Ki Neend | Nilesh Raghuvanshi
स्त्री की नींद। नीलेश रघुवंशी एक छोटे से डाकखाने मेंवो स्त्री अपनी सीट पर इतनी उदास इतनी अकेलीसमय उसके आसपास नहीं होता ऊँघते और झपकियाँ लेतेएक ही गलती को दोहराती है बार-बार कंप्यूटर परकाउंटर पर ठक-ठक की आवाज़नींद और आलस से बाहर लाती है उसेवह लिफाफे की इबारत और भेजने वाले केहाथों के कंपन से होती है कोसों दूरनींद से भरी हुई इस स्त्री को देखदफ्तर के लोग पीटते हैं सिर कोसते हैं अपने बीच उसके होने कोघर और दफ्तर के कभी न खत्म होने वाले कामों के बीचस्त्री की नींद कसमसाती है
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Parantu | Kumar Ambuj
परंतु । कुमार अम्बुजबुद्धिजीवी भी सड़क पर आ सकते हैंपरंतु क्या करें यह सरकार ठीक नहीं हैमाना कि यह लोकतंत्र हैऔर हम सुधारना चाहते हैं यह समाजपरंतु इधर ठाकुरों के वोट बहुत हैंबेचारा ज़िला दंडाधिकारी भीकरना तो चाहता है कुछ हस्तक्षेपपरंतु उसके अधिकारों में भीनिर्बल को ही दंडित कर सकना सीमित हैकहते हैं कि इस देश में कई लोग हैं दयालुपरंतु उनकी संपन्नता से ज़ाहिर हो जाती है उनकी क्रूरतायों तो मैं ख़ुश हूँपरंतु मुझे शर्म आती हैअपनी समकालीन कायरता परमैं शब्दों से काम चलाता हूँपरंतु मुझे अब कुछ दूसरे औज़ार भी लगेंगेपरंतु संकल्प की कृशकायानामालूम खाई की तरफ़ लिए ही चली जाती हैविचार मेरे पास श्रेष्ठ हैपरंतु पराजित होता हुआरोज़-रोज़ वह अल्पसंख्यक होता जाता हैसोचता हूँ उसे रखना होगा जीवितपरंतु हम सबको मिल कर हीजो धीरे-धीरे अब बहुत अकेले हैं।
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970
Kitab Ke Phool | Tanwir Sheikh 'Ilham'
किताब के फूल । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’जब भीअपने प्रेमिका कोदेना गुलाबदेना संग किताबें भीताकी उन किताबों मेंउस गुलाब को संजो सकेतुम्हारे दिए खतों कोउस किताब के पन्नों में छुपा सकेऔर आजीवन के लिएइस पल को अपने स्मृति में सहेज सकेवो जब-जब उस किताब को पढ़ेतो उस गुलाब की ख़ुश्बूतुम्हारे होने का साक्षी बनेंगीऔर उसे यादों में ले जाएंगीजो उसे पुलकित करेंगेंये किताबें तुम्हारे प्रेम को जीवित रखने काकर्तव्य निभाती रहेगीऔर सहेजे रखेगी तुम्हारे स्मृतियों कोतो जब भी देना गुलाबदेना संग किताबें भी..!
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969
Swaron Ka Samarpan | Shrikant Verma
स्वरों का समर्पण । श्रीकांत वर्माडबडब अँधेरे में, समय की नदी मेंअपने-अपने दिये सिरा दो;शायद कोई दिया क्षितिज तक जा,सूरज बन जाए!!हरसिंगार जैसे यदि चुए कहीं तारे,अगर कहीं शीश झुकाबैठे हों मेड़ों परपंथी पथहारे,अगर किसी घाटी भटकी हों छायाएँ,अगर किसी मस्तक परजर्जर हों जीवन कीत्रिपथगा ऋचाएँ;पीड़ा की यात्रा के ओ पूरब-यात्री!अपनी यह नन्हीं-सी आस्था तिरा दोशायद यह आस्था किसी प्रिय कोतट तक ले जाए!!
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968
Deewar | Saqi Farooqui
दीवार । साक़ी फ़ारुक़ीरगों में नाच रहा है इक आतिशीं ज़हराबआतिशीं: अग्निमय ज़हराब: ज़हरीला पानीतिरी तलाश फ़क़त जिस्म का तक़ाज़ा हैतिरी तलब के जहन्नम में जल रहा है बदनतलब: तलाशलहू पुकारता है क्या सुना नहीं तू नेकि मैं ने रूह की दीवार ही गिरा दी है
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967
Ichhayein | Asteek Vajpeyi
इच्छाएँ । आस्तीक वाजपेयीलकड़ी की अलमारी पर धूल,उनसे चिपकी दीवार पर टँगी इच्छाएँ।जैसे मैं अलमारी को,वैसे पूरी न हुई इच्छाएँ मुझे,झाड़ने आती हैं।
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966
Zindagi Jab Bhi Teri Bazm Mein | Shahryar
ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें । शहरयारज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमेंये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमेंसुर्ख़ फूलों से महक उठती हैं दिल की राहेंदिन ढले यूँ तिरी आवाज़ बुलाती है हमेंयाद तेरी कभी दस्तक कभी सरगोशी सेरात के पिछले-पहर रोज़ जगाती है हमेंहर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यूँ हैअब तो हर वक़्त यही बात सताती है हमें
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965
Milan | Bharat Bhushan Aggarwal
मिलन । भारतभूषण अग्रवालछलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान,मुस्कुरा पाया न ओठों पर प्रणय का गान;ज्यों जुड़ीं आँखें, मुड़ीं तुम, चल पड़ा मैं मूक -इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण।
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964
Diya | Om Prakash Valmiki
दिया । ओमप्रकाश वाल्मीकि कच्चे घर मेंजलते दीए की रोशनी परक़ब्ज़ा करके बैठ गए हो तुम।लौ के ठीक ऊपर काला धुआँ है।जो पर्त दर-पर्तकालिख पोत रहा हैदीवार पर,नीचे गहरा अँधेरा हैजिसमें दीपदान को पकड़े रहा हूँ मैंहज़ार-हज़ार वर्षों से अनवरत।मेरी पिंडलियोंऔर भुजाओं के माँस से बनी हैं बातीहड्डियों को निचोड़करनिकाला गया है तेल।अँधेरे में,कालिख पुता मेरा जिस्मजिसे तुमने अपवित्रघोषित कर दियातिल-तिल जल रहा हैतुम्हें रोशनी देने के लिए।किंतु इतना याद रखोजिस रोज़ इंकार कर दियादीया बनने सेमेरे जिस्म नेअँधेरे में खो जाओगेहमेशा-हमेशा के लिए।
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963
Mobile | Manglesh Dabral
मोबाइल । मंगलेश डबरालवे गले में सोने की मोटी जंज़ीर पहनते हैंकमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे एक आधे अँधेरे और आधे उजले रेस्तराँ में घुसते हैंऔर खाने और पीने का ऑर्डर देते हैंवे आपस में जाम टकराते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंउनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसीचाँदी जैसा या रहस्यमय नीलाउनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षकवे अपने नए मोबाइलों को अपनी नई प्रेमिकाओं की तरह देखते हैंऔर उन पर बात करते हैंवे एक-दूसरे के मोबाइल हाथ में लेकर खेलते हैंऔर उनकी विशेषताओं का वर्णन करते हैंवे एक अँधेरे-उजले रेस्तराँ में घुसते हैंऔर ज़्यादा खाने और ज़्यादा पीने का ऑर्डर देते हैंवे धरती का एक टुकड़ा ख़रीदने का ऑर्डर देते हैंवे जंगल पहाड़ नदी पेड़और उनमें दबे खनिज को ख़रीदने का ऑर्डर देते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे पता करते रहते हैंकहाँ कितना खा और पी सकते हैंकहाँ कितनी संपत्ति बना सकते हैंवे पता करते रहते हैंधरती कहाँ पर सस्ती है खाना-पीना कहाँ पर महँगा हैवे फिर से एक अँधेरे-उजले रेस्तराँ में बैठते हैंऔर सस्ती धरती और महँगे खाने-पीने का ऑर्डर देते हैंऔर मोबाइलों पर बात करते हैंवे फिर से अपनी जंज़ीरें ठीक करते हैं बेल्ट कसते हैंवे अपने मोबाइलों को अपने हथियारों की तरह उठाते हैंऔर फिर से कुछ ख़रीदने का आर्डर देने चल देते हैं।
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962
Ve Kaise Din The | Kirti Chowdhary
वे कैसे दिन थे। कीर्ति चौधरीवे कैसे दिन थेजब चीज़ें भागती थींऔर हम स्थिर थेजैसे ट्रेन के एक डिब्बे में बंद झाँकते हुएओझल होते थे दृश्यपल के पल में—...कौन थी यह तार पर बैठी हुईबुलबुल, गौरय्या या नीलकंठ?आसमान को छूता हुआसवन का जोड़ा था?दूरी पर झिलमिल-झिलमिल करतीनदिया थी?या रेती का भ्रम?कभी कम कभी ज़्यादाप्रश्न ही प्रश्न उठते थेहम विमूढ़ ठगे-सेसुलझाते ही रहतेऔर चीज़ें हो जाती थीं ओझलवे कैसे दिन थेजो रहे नहीं।सीख ली हमने चाल समय कीभागने लगे सरपटबदल गए सारे दृश्यशाखों पर दुबकी भूरी चिड़ियों नेकुतूहल से देखा हमेंहवा ने बढ़ाई बाँहरसभीनी गंधमयीलेकिन हम रुके नहींहमने सुनी ही नहींझरनों की कलकलताड़ पत्रों की बाँसुरीपोखर में खिले रहे दल के दल कमलऔर मुरझाए-से हमआगे और आगेभागते ही रहेछोड़ते चले ही गएजो कुछ पा सकते थेहाथ रही केवलयही अंतहीन दौड़और छूटते दिनों के संगपीछे सब छूट गया।
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961
Hey Meri Uttara | Ashutosh Sharma
हे मेरी उत्तरा! । आशुतोष शर्मामेरे शस्त्र की धारमयी रति कोतुम्हारी भाषा के वैराग्य ने छीन लिया थाहे मेरी उत्तरा!मेरे रण में जाने से पूर्वतुम्हारे ऑँचल का सतीत्वमुझे आगाह कर रहा थाएक भयंकर सामूहिक पाप के प्रतिमेरे मातुल की वंशी सेएक मौन भाप की ध्वनि आ रही थीगांडीव अपने चरण मुझसे दूर हटा रहा थाआधा सा लग रहा था पिता भीम का आश्वासनहै मेरी उत्तरा!तुम्हारे बाल वैधव्यता सेकुरुक्षेत्र के मंडप में होगा मेरा विवाहमैं यह जानता था किधर्मक्षेत्र मेरी शोणित के योगदान का आकांक्षी है।इतिहास मेरी वीरता का आनन्द लेना चाहता है।हे मेरी उत्तरा!हमारे प्रेम का साहित्यछंदबद्ध नहीं हैअसंकलित, अज्ञात कहींमेरे मस्तक की भांतिजयद्रथ के पैरों तलेया सेनापतियों के विजयी रथों के नीचेसिपाहियों के शर्वों साइतिहासहीन पड़ा हैगौरव करने वाली जातिर्यों का सचकलम का सौदा करने वाले घातियों ने खा लिया हैहे मेरी उत्तरा!चक्रवर्तियों की सभा मेंपासों से तुम्हारी नियति को न खेल जाए कोई राजवंशतुम्हारा दाव पर लग जानामेरे पौरुष पर घाव सा न लग जाएइसी चिन्ता का नाम महाभारत है।हे मेरी उत्तरा!अपने ललाट का सिन्दूरमेरे भीगे पीताम्बर से पोंछनासंभवतः तुम्हारी माँग की अरुणिमा में और वृदधि हो जायव मेरा बलिदान कहीं और गौरवशालीऔर पुकारूं मैं तुम्हेंनिर्जीव पड़े श्रृंगारों सेहे मेरी संगिनी!हे मेरी अर्धागिनी!हे मेरी वीरांगना!हे मेरी उत्तरा!हे मेरी उत्तरा!हे मेरी उत्तरा!
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960
Ladna | Pawan Karan
लड़ना। पवन करणमुझे उन सबकी ख़ूब याद आती हैजिन्होंने मुझसे कई बार कहाकि मुझे लड़ना चाहिएमैं उन सबको कभी भूल नहीं पाताजो मुझसे हमेशा कहते रहे कि मुझेलड़ने से डरना नहीं चाहिएमैं उनसे माफ़ी माँगना चाहता हूँजिन्होंने मुझसे कहा कि मैं हीनहीं लड़ूँगा तो फिर कौन लड़ेगामैंने उनकी मानी होतीतो मैं भी लड़कर हारा होता
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959
Pahadi Baccha | Nirmala Putul
पहाड़ी बच्चा । निर्मला पुतुल पहाड़ की गोद में पहाड़ के छोटे-छोटे टुकड़ों साखेलता है पहाड़ी बच्चा लड़खड़ाते कदमों से पहाड़ चढ़ते रोपता है पहाड़ी धरती पर पाँव पहाड़ी माहौल में पहाड़ की तरह पूरी ताकत से होने के लिए पहाड़ी बच्चों के भीतर होता है पूरा का पूरा पहाड़,और पहाड़ों की गोद में होता है दौड़ता, भागता पहाड़ी बच्चा,पहाड़ी बच्चा देखता है पहाड़ के ऊपर से गुज़रता जहाज़ और पूछता है पिता सेउस नए पक्षी के बारे में उस नए पक्षी के बारे में उस नए पक्षी के बारे में।
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958
Chupke Se Idhar Aa Jao | Shahryar
चुपके से इधर आ जाओ । शहरयारदरवाज़ा-ए-जाँ से हो करचुपके से इधर आ जाओइस बर्फ़ भरी बोरी कोपीछे की तरफ़ सरकाओहर घाव पे बोसे छिड़कोहर ज़ख़्म को तुम सहलाओमैं तारों की इस शब कोतक़्सीम करूँ यूँ सब कोजागीर हो जैसे मेरीये अर्ज़ न तुम ठुकराओचुपके से इधर आ जाओ
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957
Ibn-e-Insha | Swanand Kirkire
इब्ने इंशा । स्वानंद किरकिरेहम इंशा जी के चेले हैंहम जोगी हैं बैरागी हैंहम प्रीत प्रेम के प्यासे हैंहम फ़ितरत से अनुरागी हैंइंशा की लय पर लिखते हैंकुछ उनकी तरह ही दिखते हैंइंशा की तरह हम प्रेमी हैंइंशा की तरह हम बाग़ी हैंहै चाँद से अपना यारानाहै मन उसका आना-जानाजिस शै से हमारा दिल है लगावो चाँद-चाँद कहलाती हैहज़ारों रातें चाँद हज़ारहर शब है मोहब्बत का बाज़ारहम जीते हैं अजी ऐसे हीहमें चाँद लगन जो लागी हैइस शब का चाँद तो आधा हैइसे कम कह दें या ज़्यादा हैइस चाँद के आगे पूनम है?या आगे इसके अमासी है?हम अंधी शब में जी लेंगेहम मन में चाँद दरस लेंगेहम इंशा जी के चेले हैंहमें कविता गढ़नी आती हैइंशा जी, कविता जीवन है?या जीवन कविता है, कह दोये जो भी है इसे जी लो जी...जिसे जैसी समझ में आती हैबड़ा ध्यान लगा कर हमने सुनोजीवन की कविता बाँची हैअपने घर नौ मन तेल है जीअपने दर राधा नाची है।
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956
Shareef Log | Abdul Bismillah
शरीफ़ लोग । अब्दुल बिस्मिल्लाहपत्थर के कोयले सेजो धुआँ उठता हैउसमें एक शहर महकता हैसुना है उस शहर मेंशरीफ़ लोग रहते हैंलेकिनशराफ़त काधुएँ से क्या नाता हैयह समझ में नहीं आताजैसे यहकि हर बार जंगल का राजाशेर ही क्यों हो जाता हैया यहकि बच्चों की फ़सलमुरझाने क्यों लगी हैकि बिना किसी बीमारी केमेरा जिस्मतलवार क्यों हो रहा हैक्या यह बातशरीफ़ों के कर्त्तव्य से बाहर हैकि वे धुएँ को ख़त्म करेंअथवापत्थर को जलने से रोकेंमैं समझता हूँइतना ही नहींजंगल का राज्यबच्चों की फ़सलमेरा जिस्मसबके प्रति उनकी ज़िम्मेदारी हैअगर शहर मेंसचमुच शरीफ़ लोग रहते हैं।
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955
Hatheli Ki Lakeerein | Madhav Kaushik
हथेली की लकीरें । माधव कौशिकचले तो साथ थे लेकिन न जाने कैसे हुआतुम्हारा हाथ किसी पिछले जन्म में शायद हमारे हाथ से छूटा तो छूटता ही गया हज़ारों साल से बिछड़ी हुई हैं दो आँखेंहज़ारों साल में जाकर कभी मिलें तो मिलेंकोई सुराग़ नहीं है इसीलिए शायदहथेलियों की लकीरों में ढूंँढता हूँ तुझे
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954
Usne Kaha | Shiv Kumar Gandhi
उसने कहा । शिव कुमार गांधीउसने कहा मुझसे ले चलो अपने शहरजो कहोगे वही करूँगाफिर पकड़ाई चाय जो गैस केचूल्हे पर बनी थीमैंने कहा मज़ाक़ में -जगह बदल लेते हैं हमऔर फिर वैसे भी शहर ख़ुद ही तो आ रहा हैतुम तकउसने कहा वहाँ छत पर बैठना शाम मेंअच्छा लगता है रोशनियों बीच और फिर हवा तो आती ही हैएक कारख़ाने में काम करता था उसका भतीजाजिसके साथ किसी छत पर बैठा था वह एक दिनइस शहर में रोशनियों बीचऔर उस दिन भी हवा तो आई ही थीतालाब किनारे चाँद को देखता लेटा हुआशाम में मैं ख़ुद कितने दिन काट लूँगा यहाँतालाब अभी भरा है फिर ख़ाली होगाऔर फिर भरेगा और ख़ाली होगाअगली बारपता नहीं भरे कि नहींऔर मैं कहूँगा किसी से ले चलो अब तो मुझेअपने साथजो कहोगे वह कर ही लूँगा!
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Is Ghat-Antar Baag-Bageeche | Kabir
इस घट-अंतर बाग़-बगीचे । कबीरइस घट-अंतर बाग़-बगीचे इसी में सिरजनहाराइस घट-अंतर सात समुंदर इसी में नौ लख ताराइस घट-अंतर पारस मोती इसी में परखनहाराइस घट-अंतर अनहद गरजै इसी में उठत फुहाराकहत 'कबीर' सुनो भाई साधो इसी में साईं हमारा
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Kya Kiya | Sushma Kumari
क्या किया। सुषमा कुमारीघोर अँधेरे मेंजब 'मुक्तिबोध' के शब्दगूंजते हैं कानों में- 'कहो इस जीवन में क्या किया?किसी मेमने की तरहघबराई,मैं भागने लगती हूँउल्टी दिशा में!बहुत-बहुत भाग करफिर पहुँचती हूँ वहीं!न बचने की हालत मेंबहुत-बहुत सोचती हूँ,और पाती हूँ।अँधेरी खदानों मेंखोदती रही जीवन।उम्मीदों की अनाज से,भरती रही बच्चों का पेट!मजदूरी कीझुकी हुई पीठ पर बोझा उठाया।कतरनों को चुन करगढ़े बहुत-बहत सपनें।बहुत-बहुत लड़ीबहुत-बहुत दुःखों के बीचखड़ी रही पलाश की तरह!जहाँ-जहाँ मुरझा जाना था मुझे वहीं-वहीं तो खिली!खाली हाँथो मेंसहेजे रखा हमेशाअपने पूर्वजों कीमुट्ठी भर जिजीविषा!
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Be-Awaaz | Veeru Sonkar
बे-आवाज़ । वीरू सोनकरजहाँ भाषा चूकती हैऔर अर्थ बे-आवाज़ ही रह जाते हैंजहाँ शब्दों को कोई ईश्वर नहीं मानताहम वहाँ मिलेंगेऔर अपनी चुप्पियों में कहेंगेकि आवाज़ एक ख़लल हैइस दुनिया को बिना किसी शर्त अब चुप हो जाना चाहिए!
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ABOUT THIS SHOW
कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
HOSTED BY
Nayi Dhara Radio
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