EPISODE · Apr 13, 2024 · 2 MIN
Aparibhashit | Ajay Jugran
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अपरिभाषित | अजेय जुगरानबारह - तेरह के होते - होते कुछ बच्चेखो जाते हैं अपनी परिभाषा खोजते - खोजतेकिसी का मन अपने तन से नहीं मिलताकिसी का तन बचपन के अपने दोस्तों से।ये किशोर कट से जाते हैं आसपास सबसेऔर अपनी परिभाषा खोजने की ऊहापोह मेंअपने तन पर लिखने लगते हैंसुई काँटों टूटे शीशों सेएक घनघोर तनाव - अपवाद की भाषाजो आस्तीनों - मफ़लरों के नीचे से यदाकदा झलककभी - कहीं उनकी माँओं को आ ही जाती है नज़र।तब उनसे बंद कमरों में शुरू होती है ऐसी बातचीतजिसे बाहर दरवाज़े से कान लगा सुनसुन्न हो जाते हैं कई सहमे हुए बापऔर फिर वो रोने - कोसने लगते हैंअपने आप, अपनी क़िसमत, और परिभाषाओं को।ऐसे में अभिभावक अकसर भूल जाते हैंप्रकृति में शरीर रूप - रचनाओं की अनेकताऔर ठहराने लगते हैं ज़िम्मेदार एक दूसरे को।अफसोस इस सारी कटु क़वायद के केंद्र में“लोग क्या कहेंगे” से डरा अस्वीकार होता हैकोई अपरिभाष्य किशोर नहीं।इस कारण सुलझती नहीं ये पहेलीबस असुलझी सुलगती रहती हैधुएँ के एक काले बादल नीचेऔर अफसोस फिर मिलतीं हैंनस कटी, रेल के पहियों तले और पंखों पर लटकींलाशें कई अपरिभाषित - अर्धनारीश्वरीय संतानों कीजो सरल स्वीकार से जी सकतीं थीं होकर परिभाषित।
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