Apne Purkhon Ke Liye | Vishwanath Prasad Tiwari episode artwork

EPISODE · Aug 9, 2024 · 2 MIN

Apne Purkhon Ke Liye | Vishwanath Prasad Tiwari

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

अपने पुरखों के लिए | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी मिट्टी मेंमिली हैं उनकी अस्थियाँअँधेरी रातों मेंजो करते रहते थे भोर का आवाहनबेड़ियों में जकड़े हुएजो गुनगुनाते रहते थे आज़ादी के तरानेमाचिस की तीली थे वेचले गए एक लौ जलाकरथोड़ी सी आग जो चुराकर लाये थे वे जन्नत सेहिमालय की सारी बर्फऔर समुद्र का सारा पानीनहीं बुझा पा रहे हैं उसेलड़ते रहे, लड़ते रहे, लड़ते रहेवे मछुआरे जर्जर नौका की तरहसमय की धार में डूब गएकैसे उन्होंने अपने पैरों को बना लिया हाथऔर एक दिन परचम की तरह लहरा दिए उसेकैसे वे अकेले पड़ गएअपने ही बनाए सिंहासनों, संगीनों और बूटों के आगेऔर कैसे बह गए एक पतझर में गुमनामजंगल की खामोशी तोड़ने के लिएउन्होंने ईजाद की थीं ध्वनियाँऔर आँधी-तूफान में भी ज़िंदा रखने के लिएधरती में बोए थे शब्दअपनी खुरदरी भाग्यरेखाओं वालेकाले हाथों सेउन्होंने मिट॒टी में बसंतऔर बसंत में फूल और फूल में भरे थे रंगधधकाई थीं भट्ठियाँचट्टानों को बनाया था अन्नदाकिसी राजा का नहींइतिहास है यहशरीर में धड़कते हुए खून कामेरे बच्चों युद्ध थे वे हमें छोड़ गए एक युद्ध में ।

अपने पुरखों के लिए | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी मिट्टी मेंमिली हैं उनकी अस्थियाँअँधेरी रातों मेंजो करते रहते थे भोर का आवाहनबेड़ियों में जकड़े हुएजो गुनगुनाते रहते थे आज़ादी के तरानेमाचिस की तीली थे वेचले गए एक लौ जलाकरथोड़ी सी आग जो चुराकर लाये थे वे जन्नत सेहिमालय की सारी बर्फऔर समुद्र का सारा पानीनहीं बुझा पा रहे हैं उसेलड़ते रहे, लड़ते रहे, लड़ते रहेवे मछुआरे जर्जर नौका की तरहसमय की धार में डूब गएकैसे उन्होंने अपने पैरों को बना लिया हाथऔर एक दिन परचम की तरह लहरा दिए उसेकैसे वे अकेले पड़ गएअपने ही बनाए सिंहासनों, संगीनों और बूटों के आगेऔर कैसे बह गए एक पतझर में गुमनामजंगल की खामोशी तोड़ने के लिएउन्होंने ईजाद की थीं ध्वनियाँऔर आँधी-तूफान में भी ज़िंदा रखने के लिएधरती में बोए थे शब्दअपनी खुरदरी भाग्यरेखाओं वालेकाले हाथों सेउन्होंने मिट॒टी में बसंतऔर बसंत में फूल और फूल में भरे थे रंगधधकाई थीं भट्ठियाँचट्टानों को बनाया था अन्नदाकिसी राजा का नहींइतिहास है यहशरीर में धड़कते हुए खून कामेरे बच्चों युद्ध थे वे हमें छोड़ गए एक युद्ध में ।

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This episode is 2 minutes long.

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This episode was published on August 9, 2024.

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अपने पुरखों के लिए | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी इसी मिट्टी मेंमिली हैं उनकी अस्थियाँअँधेरी रातों मेंजो करते रहते थे भोर का आवाहनबेड़ियों में जकड़े हुएजो गुनगुनाते रहते थे आज़ादी के तरानेमाचिस की तीली थे वेचले गए एक लौ जलाकरथोड़ी सी आग जो चुराकर लाये थे वे...

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