Atma-Bodha Lesson # 22 :
from Swami Atmananda Podcasts Hosted by Swami Atmananda Saraswati
आत्म-बोध के 22nd श्लोक में आचार्यश्री हमें बता रहे हैं की जैसे अविवेकी लोग देह और इन्द्रिय के गुण और कर्म - निर्मल और निर्गुण आत्मा पर आरोपित कर उसे ही मलिन आदि समझने लगते हैं, उसी प्रकार से मन के अंदर विद्यमान कर्तापन आदि भी इसी अविवेक के कारण अपना ही कर्तापन आदि मानकर बोझे से युक्त होकर अंतहीन प्रयास करते रहते हैं। यहाँ पू गुरुजी बताते हैं की अज्ञान से तो हम एक विनम्र जिज्ञासु भी बन सकते हैं लेकिन सामान्यतः सब लोग कल्पना का आश्रय ले लेते हैं और ब्रह्म से जिव बन जाते हैं।
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