Atma-Bodha Lesson # 26 :
from Swami Atmananda Podcasts Hosted by Swami Atmananda Saraswati
आत्म-बोध के 26th श्लोक में आचार्यश्री हमें जीव और आत्मा का भेद बताते हुए इसका विवेक प्रदान कर रहे हैं। पिछले श्लोक में भी कुछ ऐसी ही बात बताई थी, पुनः इस विषय को स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं की हम लोग जो अपने आपको ज्ञाता, दृष्टा आदि समझते हैं वह वस्तुतः हम लोगों के अज्ञान के कारण उत्पन्न गलत-फ़हमी है। यह समझना इसलिए गलत है क्यूंकि यहाँ पर जो दो चीज़ें आपस में मिश्रित होकर जीव बनी हैं उन्हें देखें - इस मोह से पर्दा उठ जायेगा। आत्मा में कोई विकार नहीं होता है और बुद्धि में अपनी कोई स्वतंत्र जीवंतता नहीं होती है - लेकिन जब कोई इन दोनों का यथार्थ नहीं जनता है तब बुद्धि को ही स्वतंत्र रूप से चेतन मान लेता है। ऐसे में बुद्धि की अनेकानेक संकुचिता आत्मा की संकुचित बन जाती है और हम सब के जीवन का आधार एक निराधार कल्पना हो जाती है।
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