Atma-Bodha Lesson # 32 :
from Swami Atmananda Podcasts Hosted by Swami Atmananda Saraswati
आत्म-बोध के 32nd श्लोक में आचार्यश्री हमें बता रहे हैं की पिछले श्लोक में हमने देखा की आत्मा के ऊपर से आत्मा का जो अध्यारोप हुआ है हमें मात्र उसका निषेध करना होता है - और मुक्ति प्राप्त हो जाती है। अब यहाँ इस श्लोक में कह रहे हैं की अनात्मा के निषेध के साथ-साथ अभी तक जो इसके साथ सम्बन्ध रहा था उसके कारण अनात्मा के अनेकानेक धर्म हमारे दिल और दिमाग में विद्यमान होते हैं - उन्हें भी दूर करना होता है। इस श्लोक में देह और इन्द्रिय की चर्चा करते हैं। जब हम देह नहीं हैं तब इसके विविध धर्म भी हमारे नहीं हैं। देह के धर्म - अर्थात जन्म, वृद्धि, बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु। इन सब की खुशियां और पीड़ाएँ हम लोगों के दिलोदिमाग में बैठ गयी हैं। हमें यह देखना चाहिए की ये सब हमारे नहीं हैं। किसी का जन्म जरूर होता है, लेकिन हमारा नहीं। अतः हमें इन दोनों को बहुत स्पष्टता से देखना होगा। उसी तरह से हम इन्द्रियां नहीं है, अतः विषयों के साथ हमारा कोई भी संग नहीं है - यह विषयों के मध्य में रहते हुए देखना होगा। इस पाठ के प्रश्न : १. अनात्मा के समग्र निषेध के लिए उसके धर्मों के भी निषेध का क्या अर्थ है? ? २. देह के धर्म कौन-कौन से हैं? ३. इन्द्रियों के समग्र निषेध के लिए उसके विषयों के साथ संग की समाप्ति भी क्यों जरूरी है?
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