Atma-Bodha Lesson # 33 :
from Swami Atmananda Podcasts Hosted by Swami Atmananda Saraswati
आत्म-बोध के 33rd श्लोक में आचार्यश्री हमें बता रहे हैं की जैसे हम लोगों ने पिछले श्लोक में देखा की अपने आप को शरीर और इन्द्रियों से अलग देखने के कारण उनके धर्म भी हमारे नहीं रहते हैं, उसी प्रकार से अपने को मन से पृथक देखने के कारण मन के भी विकार हमारे नहीं होते हैं। मन के विकार, जैसे दुःख, राग, द्वेष, भय आदि। हम मन नहीं हैं - इस विषय में हम लोगों ने अनेकों युक्तियाँ देखि और अनुभूति भी है, और अब आचार्यश्री यहाँ श्रुति प्रमाण भी देते हैं, की, अप्राणो अमनः शुभ्र - की आत्मा निर्मल और चिन्मयी है, तथा उसमे कोई मन अथवा प्राण नहीं है। इस पाठ के प्रश्न : १. अनात्मा के निषेध का व्यावहारिक प्रमाण क्या है? २. दुःख, राग आदि से कैसे पूर्ण रूप से मुक्त होते हैं? ३. क्या प्रिय लोगों से राग अनुचित होता है?
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