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Atma-Bodha Lesson # 59 :  episode artwork

Oct 29, 2021 32 min

Atma-Bodha Lesson # 59 :

from Swami Atmananda Podcasts Hosted by Swami Atmananda Saraswati

आत्म-बोध के 59th श्लोक में भी भगवान् शंकराचार्यजी हमें ब्रह्म की एक और महिमा बता रहे हैं। संसारी लोगों की दुनिया से आये हम सब की बुद्धि एक बहुत बड़े दोष से युक्त होती है - और वो है की ब्रह्म को भी अन्य किसी विषय की तरह से बाहरी, ग्राह्य एवं कर्म के प्राप्त करने योग्य वस्तु समझना। कर्म की सीमाओं की चर्चा आत्म-बोध के प्रारम्भिक श्लोकों में करी जा चुकी है। अब यहाँ ब्रह्म को व्यवहार की वस्तु की तरह से एकदेशीय समझने की संभावना का निषेध किया जा रहा रहा है। जो वस्तु भी एकदेशीय होती है वो सीमित एवं संकुचित होती है - और ब्रह्म ऐसा नहीं होता है। ब्रह्म व्यवहार की समस्त वस्तुओं, व्यक्तोयों आदि को व्याप्त करता है। वो सबका सत्य होता है, सबको आत्मवान करता है। ब्रह्म ही सबको सत्तू, स्फूर्ति एवं प्रियता प्रदान करता है। आचार्य कहते हैं की जैसे दूध में मक्खन व्याप्त होता है, उसी तरह से जगत के कण-कण में ब्रह्म व्याप्त होता है, अर्थात ब्रह्म-ज्ञान से सब कुछ प्राप्त हो जाता है। इस पाठ के प्रश्न : १. संसारी वस्तुओं की अपेक्षा ब्रह्म प्राप्ति की क्या विलक्षणता होती है? २. किसी भी बाहरी वस्तु में क्या कमी होती है ? ३. सर्व-व्यापी ब्रह्म की प्राप्ति में क्या कर्म का कोई रोल होता है ? Send your answers to : vmol.courses-at-gmail-dot-com

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