EPISODE · Feb 2, 2024 · 2 MIN
Atmasweekar | Gaurav Singh
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
आत्मस्वीकार | गौरव सिंहजो अपराध मैंने किये,वो जीवन जीने की न्यूनतम ज़रूरत की तरह लगे!मैंने चोर निगाहों से स्त्रियों के वक्ष देखेऔर कई बार एक लड़की का हृदय ना समझ सकने की शर्म के साथ सोयामुझे परिजनों की मौत पर रुलाई नहीं फूटीऔर कई दफ़े चिड़ियों की चोट पर फफककर रोयामैं अपने लोगों के बीच एक लम्बी ऊब के साथ रहाऔर चाय बेचती एक औरत का सारा दुःख जान लेना चाहामैंने रातभर जागकर लड़कियों के दुःख सुनेपर अपनी यातनाएँ कहने के लिए कोई नदी खोजता रहामुझे अपनी पीड़ाएँ बताने में संकोच होता हैमैं बीमारी से नहीं, उसकी अव्याख्येयता के कारण कुढ़ता हूँजीवन के कई ज़रूरी क्षण भूल रहा हूँऔर तुम्हारे तिलों की ठीक जगह ना बता पाने पर शर्मिंदा हूँमुझ पर स्मृतिहीन होने के लांछन ना लगाओमैं पानी के चहबच्चों की स्मृतियाँ लिए शहर-दर-शहर भटक रहा हूँजितनी मनुष्यता मुझे धर्मग्रंथों ने नहीं सिखायीउससे कहीं ज़्यादा प्रेम एक बीस साल की लड़की ने सिखायाप्रेम में होकर मैंने ज़िन्दगी पर सबसे अधिक गौर कियामैं यह मानने को तैयार नहीं कि प्रेम किसी को जीवन से विमुख कर सकता है।
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Atmasweekar | Gaurav Singh
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