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Bahamuni | Nirmala Putul

EPISODE · May 1, 2023 · 2 MIN

Bahamuni | Nirmala Putul

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

बहामुनी - निर्मला पुतुल तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हज़ारोंपर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेटकैसी विडम्बना है किज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाईयाँऔर पंखा बनाते टपकता हैतुम्हारे करियाये देह से टप....टप...पसीना...!क्या तुम्हें पता है कि जब कर रही होती हो तुम दातुनतब तक कर चुके होते हैं सैकड़ों भोजन-पानीतुम्हारे ही दातुन से मुँह-हाथ धोकर?जिन घरों के लिए बनाती हो झाड़ूउन्हीं से आते हैं कचरे तुम्हारी बस्तियों मे?इस ऊबड़-खाबड़ धरती पर रहतेकितनी सीधी हो बहामुनीकितनी भोली हो तुमकि जहाँ तक जाती है तुम्हारी नज़रवहीं तक समझती हो अपनी दुनियाजबकि तुम नहीं जानती कि तुम्हारी दुनिया जैसीकई-कई दुनियाएँ शामिल हैं इस दुनिया मेंनहीं जानतीकि किन हाथों से गुज़रतीतुम्हारी चीज़ें पहुँच जाती हैं दिल्लीजबकि तुम्हारी दुनिया से बहुत दूर है अभी दुमका भी!

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Bahamuni | Nirmala Putul

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