EPISODE · Jul 15, 2023 · 3 MIN
Bas Ek Reteela Sapaat Aur Sookha Nahi hai Wah | Nandkishore Acharya
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
बस एक रेतीला सपाट है - नंदकिशोर आचार्य न ऊँचाइयाँ है, न गहराइयाँ, बस एक रेतीला सपाट हैदूर तक पसरा हुआ निश्छाय तपता जपता नाम कोईकहाँ तक उड़ता आबाद बंसल में प्यासा कलपता पाखीढूँढ़ता छाया अपने ही परछाई मेंआ गिरता रेत पर बेबस, तड़पता झुलस जाता हैसपना पल रहा था जो आँखों से निकलकर ढुलकने भी नहीं पातासूख जाता है नि:संघ पसरा हुआ निश्छाय रेतीला सपाटतपता रहता है।सूखा नहीं है वहवे समझते हैं तुम्हारा कोई अतीत नहीं हैऐसे ही सूखे रहे हो तुम सदा, क्योंकिजिनका कोई भी अतीत रहा होता है वे सदा बिसूरते रहते हैंहाँ, एक दुख वह भी होता है जो पत्थर कर देता हैलेकिन अंदर उबलता रहता है चश्मा और एक दिन फोड़कर उसे निकल आता हैलेकिन तुम तो रेत हो, यानी जो भीतर ही भीतरहो सकता वह भी गया होगा सूखनहीं सूखा नहीं है वह, नहीं तो यों सँजोए नहीं रहतेअपनी जर्जर छाती में वे सारे जीवाश्मजो कभी दुनिया थी तुम्हारीजब तक अपनी दुनिया की यादें दबी है मन में, जीवाश्म सी ही सहीतब तक दुख है इसलिए सपने भीवह जितना गहरा है चश्मा उसी शिद्दत से कभी फूटेगा।
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