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Belly Dancer | Dinesh Kumar Shukla

EPISODE · Jun 3, 2023 · 4 MIN

Belly Dancer | Dinesh Kumar Shukla

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

बेली डान्‍सर - दिनेश कुमार शुक्लबमाको शहर केखण्डहरों में मेरा जन्म हुआमाली के प्राचीन परास्त राजकुल में ...माँ के सूखते स्तनों सेमिला मुझे मज्जा का स्वाद,जब गोद में ही थी मैंसुनी मैंने मृत्यु की पहली पदचापक्षयग्रस्त माँ की मंद होती धड़कन में,गोद में ही लग गई लत मुझेज़िंदा बने रहने कीसूखी हुई घास, कटीली नागफनी औरठुर्राई झाड़ियों की मिट्टी ने पाला पोसा मुझेसीखा मैंने ज़हरीले साँपों को भून कर खानाचट्टानों से पाया मैंने नमकसहारा की रेत से बनी मेरी हड्डियाँओ हड्डी-की-खाद के सौदागरतुम मुझे क्यों घूरते हो इस तरह!दास प्रथा का तो अन्त हुएबीत गये कितने सालकहते हैं अफ्रीका भीअब बिल्कुल आज़ाद हैअब मुझे भी गिनती आती हैओ पेट्रोल के सौदागरतुम्हारी आँखों में क्यों इतनी आग हैकि हमारी दुनिया ही ख़ाक हुई जाती हैमुझे अपनी सिगरेट के धुएँ में डुबाते हुएमेरे भाइयों से तुम्हें क्यों नहीं लगता डर !कोई हिरनी क्या दौड़ेगी मुझसे तेज़ चने-सा चबा सकती हूँ बंदूक के छर्रेतड़ित् को तो रोज चकित करती हूँअपने चपल नृत्य सेदरअस्ल तुम्हें चीर सकती हूँ मैं शेरनी की तरहफिर भी तुमअपनी जन्मांध आँखों सेमुझे निर्वस्त्र किये जाते होक्या तुम्हें अपनी ज़िन्दगी प्यारी नहींओ सभ्यताओं के सौदागर।कैसे, कैसे हुए तुम इतने निद्र्वन्द्व !एक के बाद एक सीमा लाँघतेपृथ्वी और स्त्रियों कोकरते हुए पयर्टित पद्दलितदेखते हुए मेरा निर्वस्त्र नाचपेट के लिए पेट-का-नाचमेरी देह की थिरकती माँसपेशियाँमछलियाँ हैंजिनकी हलक में धँस गया लोहे का काँटा,खून के कीचड़ सेभर गया है रंगमंच लथपथजुगुप्सा के इतने व्यंजनों के बीचतुम्हारे सिवा और कौन हो सकता था इतना लोलुपओ लोहे बारूद और मृत्यु के सौदागर !

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