EPISODE · Sep 14, 2025 · 2 MIN
Bolne Mein Kam Se Kam Bolun | Vinod Kumar Shukla
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
बोलने में कम से कम बोलूँ | विनोद कुमार शुक्लबोलने में कम से कम बोलूँकभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँइतना कम कि किसी दिन एक बातबार-बार बोलूँजैसे कोयल की बार-बार की कूकफिर चुप।मेरे अधिकतम चुप को सब जान लेंजो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप।पहाड़, आकाश, सूर्य, चंद्रमा के बरक्सएक छोटा सा टिम-टिमातामेरा भी शाश्वत छोटा-सा चुप।ग़लत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे मेंमेरा एक चुप-चलने के पहलेएक बंदूक का चुप।और बंदूक जो कभी नहीं चलीइतनी शांति काहमेशा-की मेरी उम्मीद का चुप।बरगद के विशाल एकांत के नीचेसम्हाल कर रखा हुआजलते दिये का चुप।भीड़ के हल्ले मेंकुचलने से बचा यह मेरा चुप,अपनों के जुलूस में बोलूँकि बोलने को सम्हालकर रखूँ का चुप।
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