EPISODE · May 2, 2023 · 5 MIN
Chait Ki Chaupahi | Dinesh Kumar Shukla
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
चैत की चौपही - दिनेश कुमार शुक्लदिन नेवर्तों के महीना चैत का हैपड़ चले फीके मगर रह-रह दहकते हैं अभी तक रंग होली केहवा के तेवर जरा बदले हुए हैं और गाढ़ी हो चली है धूपफसल के पकने का मौसम आ गया पर लॉक अब तक हरी हैइस बार भुस तो बहुत होगा किन्तु दाने कम पड़ेंगे बालियों मेंमगर कोई क्या करे!दिन नेवर्तों के महीना चैत का हैचौपही में सज सँवर कर स्वाँग निकलेंगे,जग रही है रूप-रूपक की वो दिल-अंगेज दुनिया-फाँद कर संसार उसके पार का संसार रचतीबुलबुले में रंग भरतीकिसी फक्कड़ शरारत की हरारत माहौल में हैएक पल को पलक खोलो ध्यान गहराओ तो पाओगेयहीं इस अधगिरी चौपाल में कुछ लोग बैठे सज रहे होंगे-भेस धर कर कोई डाइन का पहन कर रात कालीहाथ में छप्पर व मूसल ले के गलियों में छमाछम दौड़तासंसार को ललकारता, आतंक को मुँह बिराता-सा आ रहा होगा,कोई पागल बनके ठरें की महक में बलबलातापाँव में दस हाथ की जंजीर बाँधे घूमता होगा तुड़ा कर,कोई जोकर कोई भालू औ कोई अरधंग बन करकोई गालों में चुभोकर साँग लोहे कीहवा पर चला रहा होगा दुखों से बहुत ऊपरचौपही में देव-दानव-ठग-अधम-सज्जन सभी के रूप होंगेभाँजते अपनी बनैठी चल रहे होंगे कई इतिहासऔर करतब पटेबाज़ी के दिखाता तर्क भी होगामौत के काँधे पे धर के हाथ हँसती जिन्दगी होगीसात पर्तों में हवा की तरसा-मरसा बज रहा होगाकान के पर्दों में दँहिकी गमकती होगीऔर पानी के गले में गूँजता होगा कुआँउधर ऊपर चन्द्रमा के पास खिड़की खोल करअर्धपरिचित एक चेहरा झाँकता होगा,दूर जाती और गहरे डूबती-सी मुस्कुराहट की कठिन आभावहीं पर खो रही होगी,और झालर की तरह उड़ती हुई चिड़ियाँगगन की अस्त होती नीलिमा में लहर भरती जा रही होंगी-तब गगन के काँपते जल में वो चेहरा डूब जायेगा!चौपही का ढोल धरती की तरह प्रतिध्वनित होतारात भर बजता रहेगा और तारों से झरेगी धूल,तनी गेहूँ की कँटीली बालियों की झील पर तब चन्द्रमा-सी एक थालीसरकती दस कोस तक हँसती फिसलती चली जायेगीभेड़िये उस फसल में जो छिपे हैं अब डर रहे होंगे!
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Chait Ki Chaupahi | Dinesh Kumar Shukla
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