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Dharti Par Hazaar Cheezain Thin | Anupam Singh

EPISODE · Jun 13, 2025 · 3 MIN

Dharti Par Hazaar Cheezain Thin | Anupam Singh

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

धरती पर हज़ार चीजें थीं काली और खूबसूरत | अनुपम सिंह धरती पर हज़ार चीजें थींकाली और खूबसूरतउनके मुँह का स्वादमेरा ही रंग देख बिगड़ता थावे मुझे अपने दरवाज़े से ऐसे पुकारतेजैसे किसी अनहोनी को पुकार रहे होंउनके हज़ार मुहावरे मुँह चिढ़ाते थेकाली करतूतें काली दाल काला दिलकाले कारनामेबिल्लियों के बहाने दी गई गालियाँ सुनमैं ख़ुद को बिसूरती जाती थीऔर अकेले में छिपकर रोती थीपहली बार जब मेरे प्रेम की ख़बरें उड़ींतो माँ ओरहन लेकर गईउन्होंने झिड़क दिया उसेकि मेरे बेटे को यही मिली है प्रेम करने कोमुझे प्रेम में बदनाम होने से अधिकयह बात खल गई थीउन्होंने कच्ची पेंसिलों-सातोड़ दिया था मेरे प्रेम करने का पहला विश्वासमैंने मन्नतें उस चौखट पर माँगीजहाँ पहले ही नहीं था इंसाफ़कई-कई फ़िल्मों के दृश्यजिनमें फ़िल्माई गई थीं काली लड़कियाँसिर्फ़ मज़ाक बनाने के लिएअभी भी भर आँख देख नहीं पाती हूँतस्वीर खिंचाती हूँतो बचपन की कोई बात अनमना कर जाती है।सोचती हूँकितनी जल्दी बाहर निकल जाऊँ दृश्य सेकाला कपड़ा तो ज़िद में पहना था हाथ जोड़ लेते पिताबिटिया! मत पहना करो काली कमीज़वैसे तो काजल और बिंदी यही दो श्रृंगार प्रिय थेअब लगता है कि काजल भी ज़िद का ही भरा हैउनको कई बार यह कहते सुना थाकि काजल फबता नहीं तुम परदेवी-देवताओं और सज्जनों ने मिलकरकई बार तोड़ा मुझेमैं थी उस टूटे पत्ते-सीजिससे जड़ें फूटती हैं।

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Dharti Par Hazaar Cheezain Thin | Anupam Singh

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