EPISODE · Oct 25, 2023 · 3 MIN
Ek Aurat Ka Pehla Rajkiya Pravas | Anamika
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
एक औरत का पहला राजकीय प्रवास | अनामिका वह होटल के कमरे में दाख़िल हुई!अपने अकेलेपन से उसनेबड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।कमरे में अंधेरा था।घुप्प अंधेरा था कुएँ काउसके भीतर भी!सारी दीवारें टटोली अंधेरे में,लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था!पूरा खुला था दरवाज़ा,बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था!सामने से गुज़रा जो ‘बेयरा’ तोआर्त्तभाव से उसे देखा!उसने उलझन समझी, औरबाहर खड़े-ही-खड़ेदरवाज़ा बंद कर दिया!जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ,बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल!“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?”उसने सोचा।डनलप पर लेटी,चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं–रीढ़ के भीतर!तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत?सात गलीचों के भीतर भीउसको चुभ जाता हैकोई मटरदाना आदिम स्मृतियों का?पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था,पर उसने बाँची टेलीफ़ोन तालिकाऔर जानना चाहाअंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक ख़र्चा।फिर, अपनी सब डॉलरें ख़र्च करकेउसने किए तीन अलग-अलग कॉल!सबसे पहले अपने बच्चे से कहा“हैलो-हैलो, बेटेपैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊँघ गए थे कैसे...सबसे ज़्यादा याद आ रही है तुम्हारीतुम हो मेरे सबसे प्यारे!”अंतिम दोनों पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहींआफ़िस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय सेफिर, चौके में चिंतित, बर्तन खटकाती अपनी माँ से।... अब उसकी हुई गिरफ़्तारी।पेशी हुई ख़ुदा के सामनेकि इसी एक ज़ुबाँ से उसनेतीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा“सबसे ज़्यादा तुम हो प्यारे !”यह तो सरासर है धोखासबसे ज़्यादा माने सबसे ज़्यादा!लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दीऔर कहा–“औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा!”
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एक औरत का पहला राजकीय प्रवास | अनामिका वह होटल के कमरे में दाख़िल हुई!अपने अकेलेपन से उसनेबड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।कमरे में अंधेरा था।घुप्प अंधेरा था कुएँ काउसके भीतर भी!सारी दीवारें टटोली अंधेरे में,लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था!पूरा खुला था दरवाज़ा,बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था!सामने से गुज़रा जो ‘बेयरा’ तोआर्त्तभाव से उसे देखा!उसने उलझन समझी, औरबाहर खड़े-ही-खड़ेदरवाज़ा बंद कर दिया!जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ,बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल!“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?”उसने सोचा।डनलप पर लेटी,चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं–रीढ़ के भीतर!तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत?सात गलीचों के भीतर भीउसको चुभ जाता हैकोई मटरदाना आदिम स्मृतियों का?पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था,पर उसने बाँची टेलीफ़ोन तालिकाऔर जानना चाहाअंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक ख़र्चा।फिर, अपनी सब डॉलरें ख़र्च करकेउसने किए तीन अलग-अलग कॉल!सबसे पहले अपने बच्चे से कहा“हैलो-हैलो, बेटेपैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊँघ गए थे कैसे...सबसे ज़्यादा याद आ रही है तुम्हारीतुम हो मेरे सबसे प्यारे!”अंतिम दोनों पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहींआफ़िस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय सेफिर, चौके में चिंतित, बर्तन खटकाती अपनी माँ से।... अब उसकी हुई गिरफ़्तारी।पेशी हुई ख़ुदा के सामनेकि इसी एक ज़ुबाँ से उसनेतीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा“सबसे ज़्यादा तुम हो प्यारे !”यह तो सरासर है धोखासबसे ज़्यादा माने सबसे ज़्यादा!लेकिन, ख़ुदा ने कलम रख दीऔर कहा–“औरत है, उसने यह ग़लत नहीं कहा!”
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