EPISODE · Jan 19, 2026 · 5 MIN
Gori Soyi Sej Par | Madan Kashyap
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
गोरी सोयी सेज पर । मदन कश्यपशब्द जो नंदिनी के खुर के नीचे दब कर भी नहीं मरे, राजा दिलीप के आतंक से मर गये कालिदास से पूछो कि धमनियों का रक्त पिला-पिला कर कैसे पुनरुज्जीवित किया उन शब्दों कोमैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँजिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न हैमुझे ढूँढने हैं हजारों शब्दजो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगहतुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बची होती हैतुम्हारे दुपट्टे को लहराने वाली हवा ने हीउन नावों के पालों को लहराया थाजिन पर पहली बार लदे थे हड़प्पा के मृदभाँडइतिहास की अजस्त्र धारा पर अध्यारोपित तुम्हारी हँसीकाल की सहस्त्र भंगिमाओं का मोंताज तुम्हारा चेहरासबसे लंबे समयखंड कोअपनी नन्हीं भुजाओं में समेट लेने को आतुर मेरा मनतुम्हें ढूंढता रहता है अक्षरों से भी पुराने गुफाचित्रों मेंमुझे याद आ रहे हैं अमीर खुसरोसुनो वे तब भी याद आए थेजब पहली और आखिरी बार मैंने तुम्हारे होंठों को चूमा थावह एक यात्रा थी एक भय से दूसरे भय मेंऔर इस तरह भय का बदल जाना भी कम भयानक नहीं होता‘गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केसचल खुसरो घर आपने, रैन भयी चहुं देस’छह सौ बहत्तर वर्षों में भी जब तुम्हारे मुख पर से केश हटा नहीं सकातब जाकर एहसास हुआ कि यह रैन इतनी लंबी हैसुबह तो उस रात की होती है जो सूरज के डूबने से हुई होजिसे रच रहे थे अमीर खुसरोकुछ शब्द गुम हो गए उस भाषा केऔर कुछ आततायी व्याकरण की जंग लगी बेड़ियों में कैद हो गएएकल कोशिकीय अनुजीवों के जगल से गुजरते हुएमुझे पहुंचना है उस पनघट परजहां स्वच्छ जामुनी जल की तरह तरल शब्द कर रहे हैं मेरी प्रतीक्षामैं धीरे-धीरे एक विषाल स्पाइरोगाइरा में बदलते जा रहेइस महादेश के जेहन में अपनी कविता के साथ जाना चाहता हूँअंधेरी सुरंगों में सपनों के कुछ गहरे रंग भरना चाहता हूँएक शून्य जो पसरता जा रहा है हमारे चारों ओरमैं उसे पाटना चाहता हूँकविता की आँखों में तैर रहे नये छंदों सेमैं भाषा के समुद्र का सिंदबादअपने पास रखना चाहता हूं केवल यात्राओं की पीड़ाबाकी सबकुछ तुम्हें दे देना चाहता हूँतुम्हें दे देना चाहता हूँअपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्दअपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियाँमैं चाँद के रैकेट से सारे सितारों को उछाल देना चाहता हूं तुम्हारी ओर!
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गोरी सोयी सेज पर । मदन कश्यपशब्द जो नंदिनी के खुर के नीचे दब कर भी नहीं मरे, राजा दिलीप के आतंक से मर गये कालिदास से पूछो कि धमनियों का रक्त पिला-पिला कर कैसे पुनरुज्जीवित किया उन शब्दों कोमैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँजिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न हैमुझे ढूँढने हैं हजारों शब्दजो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगहतुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बची होती हैतुम्हारे दुपट्टे को लहराने वाली हवा ने हीउन नावों के पालों को लहराया थाजिन पर पहली बार लदे थे हड़प्पा के मृदभाँडइतिहास की अजस्त्र धारा पर अध्यारोपित तुम्हारी हँसीकाल की सहस्त्र भंगिमाओं का मोंताज तुम्हारा चेहरासबसे लंबे समयखंड कोअपनी नन्हीं भुजाओं में समेट लेने को आतुर मेरा मनतुम्हें ढूंढता रहता है अक्षरों से भी पुराने गुफाचित्रों मेंमुझे याद आ रहे हैं अमीर खुसरोसुनो वे तब भी याद आए थेजब पहली और आखिरी बार मैंने तुम्हारे होंठों को चूमा थावह एक यात्रा थी एक भय से दूसरे भय मेंऔर इस तरह भय का बदल जाना भी कम भयानक नहीं होता‘गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केसचल खुसरो घर आपने, रैन भयी चहुं देस’छह सौ बहत्तर वर्षों में भी जब तुम्हारे मुख पर से केश हटा नहीं सकातब जाकर एहसास हुआ कि यह रैन इतनी लंबी हैसुबह तो उस रात की होती है जो सूरज के डूबने से हुई होजिसे रच रहे थे अमीर खुसरोकुछ शब्द गुम हो गए उस भाषा केऔर कुछ आततायी व्याकरण की जंग लगी बेड़ियों में कैद हो गएएकल कोशिकीय अनुजीवों के जगल से गुजरते हुएमुझे पहुंचना है उस पनघट परजहां स्वच्छ जामुनी जल की तरह तरल शब्द कर रहे हैं मेरी प्रतीक्षामैं धीरे-धीरे एक विषाल स्पाइरोगाइरा में बदलते जा रहेइस महादेश के जेहन में अपनी कविता के साथ जाना चाहता हूँअंधेरी सुरंगों में सपनों के कुछ गहरे रंग भरना चाहता हूँएक शून्य जो पसरता जा रहा है हमारे चारों ओरमैं उसे पाटना चाहता हूँकविता की आँखों में तैर रहे नये छंदों सेमैं भाषा के समुद्र का सिंदबादअपने पास रखना चाहता हूं केवल यात्राओं की पीड़ाबाकी सबकुछ तुम्हें दे देना चाहता हूँतुम्हें दे देना चाहता हूँअपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्दअपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियाँमैं चाँद के रैकेट से सारे सितारों को उछाल देना चाहता हूं तुम्हारी ओर!
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Gori Soyi Sej Par | Madan Kashyap
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