EPISODE · Aug 11, 2025 · 2 MIN
Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुजबारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरेभीगते हुए निकली शवयात्राबारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोगजो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कमसबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव परदोस्त चल रहा था आगे-आगेनिरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चालशमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आगकई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थेनहीं बुझेगी चिताहम सबने देखा बारिश में दहक रही थी चितालौटने में तितर-बितरहुए लोगदोस्त के कंधे पर हाथ रखे हुए लौटा मैंमुझे नहीं समझ आया क्या कहूँ मैं उससेमुझे तो यह नहीं पता कि कैसा लगता है जब मरते हैं पिताअब जब मर गए दोस्त के पिता तो क्या कहूँ उससेकि बारिश में हिचकी लेता हुआ उसका गीला शरीर न काँपेकौन-सा एक शब्द कहूँ उससे सांत्वना का आखिरयही सोचता रहा देर तकरात को जब घर लौटकर आयाबारिश उसी तरह हो रही थी लगातार।
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जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुजबारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरेभीगते हुए निकली शवयात्राबारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोगजो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कमसबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव परदोस्त चल रहा था आगे-आगेनिरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चालशमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आगकई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थेनहीं बुझेगी चिताहम सबने देखा बारिश में दहक रही थी चितालौटने में तितर-बितरहुए लोगदोस्त के कंधे पर हाथ रखे हुए लौटा मैंमुझे नहीं समझ आया क्या कहूँ मैं उससेमुझे तो यह नहीं पता कि कैसा लगता है जब मरते हैं पिताअब जब मर गए दोस्त के पिता तो क्या कहूँ उससेकि बारिश में हिचकी लेता हुआ उसका गीला शरीर न काँपेकौन-सा एक शब्द कहूँ उससे सांत्वना का आखिरयही सोचता रहा देर तकरात को जब घर लौटकर आयाबारिश उसी तरह हो रही थी लगातार।
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