EPISODE · Jul 17, 2024 · 2 MIN
Jagat Ke Kuchle Hue Path | Harishankar Parsai
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं? | हरिशंकर परसाईकिसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझकोनहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझकोले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाताऔर उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाताशूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जोऔर तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जोजगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहातायह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाताप्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ कीएक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकीचाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तोसोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तोपर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?
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जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं? | हरिशंकर परसाईकिसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझकोनहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझकोले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाताऔर उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाताशूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जोऔर तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जोजगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहातायह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाताप्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ कीएक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकीचाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तोसोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तोपर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?
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