EPISODE · Aug 21, 2024 · 3 MIN
Jarkhareed Deh | Rupam Mishra
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
जरखरीद देह - रूपम मिश्र हम एक ही पटकथा के पात्र थेएक ही कहानी कहते हुए हम दोनों अलग-अलग दृश्य में होतेजैसे एक दृश्य तुम देखते हुए कहते तुमसे कभी मिलने आऊँगातुम्हारे गाँव तो नदी के किनारे बैठेंगे जी भर बातें करेंगेतुम बेहया के हल्के बैंगनी फूलों की अल्पना बनानाउसी दृश्य में तुमसे आगे जाकर देखती हूँ नदी का वही किनारा है बहेरी आम का वही पुराना पेड़ है।जिसके तने को पकड़कर हम छुटपन में गोल-गोल घूमते थे।उसी की एक लम्बी डाल पर दो लाशें झूल रही हैं ।एक मेरी हैं दूसरी का बस माथा देखकर ही मैंचीख पड़ती हूँ और दृश्य से भाग आती हूँतुम रूमानियत में दूसरा दृश्य देखते होकिसी शाम जब आकाश के थाल में तारे बिखरे होंगेसंसार मीठी नींद में होगा तो चुपके से तुमसे मिलने आ जाऊँगामैं झट से बचपन में चली जाती हूँ जहाँ दादी भाई को गोद में लियेरानी सारंगा और सदावृक्ष की कहानी सुना रही हैंमैं सीधे कहानी के क्लाइमेक्स में पहुँचती हूँजहाँ रानी सारंगा से मिलने आए प्रेमी का गला खचाक से काट दिया जाता हैऔर छोटा भाई ताली पीटकर हँसने लगता हैदृश्य और भी था जिसमें मेरा चेहरा नहीं था देहों से भरा एक मकान थामैं एक अछूत बर्तन की तरह घर के एक कोने में पड़ी थीतुम और भी दृश्य बताते हो जिसमें समन्दर बादल और पहाड़ होते हैंमैं कहती हूँ कहते रहो ये सुनना अच्छा लग रहा हैबस मेरे गाँव-जवार की तरफ न लौटना क्योंकिये आत्मा प्रेम की जरखरीद है और देह कुछ देहों की।
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