EPISODE · Feb 16, 2026 · 3 MIN
Jisko Bachpan Me Dekha | Madhav Kaushik
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिकजिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की,मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा।शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर,दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा।बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई,जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा।तुम मेरे चेहरे पर लिखना इन्द्रधनुष उम्मीदों के,मैं तेरी सूनी आँखों में नीला अम्बर ढूंढूंगा।हो सकता है मुझे देखकर फिर छिप जाए जँगल में,मैं अपनी खोई फितरत को भेस बदलकर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।
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जिसको बचपन में देखा । माधव कौशिकजिसको बचपन में देखा वो पनघट पोखर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।ऐसा लगता है टाँगे ही टाँगे हैं अब लोगों की,मुझको मौका मिला तो सबके कटे हुए सर ढूंढूंगा।शहरों की शैतानी आँतें लीले गईं हर चीज़ मगर,दिल की बच्चों जैसी ज़िद के तितली के पर ढूंढूंगा।बुरे दिनों ने सिख लायी है जीने की तरकीब नई,जो कुछ चौराहे पर खोया घर के अन्दर ढूंढूंगा।तुम मेरे चेहरे पर लिखना इन्द्रधनुष उम्मीदों के,मैं तेरी सूनी आँखों में नीला अम्बर ढूंढूंगा।हो सकता है मुझे देखकर फिर छिप जाए जँगल में,मैं अपनी खोई फितरत को भेस बदलकर ढूंढूंगा।अगली बार गाँव में जाकर फिर अपना घर ढूंढूंगा।
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