EPISODE · Feb 4, 2025 · 2 MIN
Kankreela Maidan | Kedarnath Aggarwal
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
कंकरीला मैदान | केदारनाथ अग्रवाल कंकरीला मैदानज्ञान की तरह जठर-जड़ लंबा-चौड़ा,गत वैभव की विकल याद में-बड़ी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया!जहाँ-तहाँ कुछ- कुछ दूरी पर,उसके ऊपर,पतले से पतले डंठल के नाज़ुक बिरवेथर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए हैंबेहद पीड़ित!हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है।अनुपम मनहर, हर ऐसी सुंदर मुँदरी कोमीनों ने चंचल आँखों से,नीले सागर के रेशम के रश्मि -तार से,हर पत्ती पर बड़े चाव से बड़ी जतन से,अपने-अपने प्रेमी जन को देने कीख़ातिर काढ़ा थासदियों पहले ।किन्तु नहीं वे प्रेमी आये,और मछलियाँ-सूख गयी हैं, कंकड़ हैं अब!आह! जहाँ मीनों का घर थावहाँ बड़ा वीरान हो गया।
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कंकरीला मैदान | केदारनाथ अग्रवाल कंकरीला मैदानज्ञान की तरह जठर-जड़ लंबा-चौड़ा,गत वैभव की विकल याद में-बड़ी दूर तक चला गया है गुमसुम खोया!जहाँ-तहाँ कुछ- कुछ दूरी पर,उसके ऊपर,पतले से पतले डंठल के नाज़ुक बिरवेथर-थर हिलते हुए हवा में खड़े हुए हैंबेहद पीड़ित!हर बिरवे पर मुँदरी जैसा एक फूल है।अनुपम मनहर, हर ऐसी सुंदर मुँदरी कोमीनों ने चंचल आँखों से,नीले सागर के रेशम के रश्मि -तार से,हर पत्ती पर बड़े चाव से बड़ी जतन से,अपने-अपने प्रेमी जन को देने कीख़ातिर काढ़ा थासदियों पहले ।किन्तु नहीं वे प्रेमी आये,और मछलियाँ-सूख गयी हैं, कंकड़ हैं अब!आह! जहाँ मीनों का घर थावहाँ बड़ा वीरान हो गया।
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