EPISODE · Feb 5, 2026 · 4 MIN
Kasbon Mein Chal Pustakalay | Anamika
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
क़स्बों में चल पुस्तकालय । अनामिका भाषाविद तो मैं नहीं हूँ,पर बचपन में अक्सर ही सोचती थी मैं-हमारी तरफ़ रूठ जाने को क्यों कहते हैं रूस जाना ।औरतें हमारी तरफ़ की रह- रह कर क्यों रूस जाती हैं ।ऐसा क्या आकर्षण है सोवियत रूस में क्या उसका आकर्षण है वे किताबें जो सुन्दर हिंदी अनुवादों में लाती है, चल पुस्तकालय की बड़ी बड़ी वैनेंजब देखो तब रूस जाने को तैयारकस्बे की ये उदास औरतें जाओ वहाँ न जाने कहाँ लाओ उसे न जाने किसेज़ार निकोलाई कहता था दाँत पीसकर जब किसानों से रूठी हुई औरतें सुनतीं मन ही मन कुछ ठानकर कहतीं हम भी अनंत यात्रा पर निकल जाएँगी हमको अनंत यात्रा पर लिए जाएँगी ये किताबें जो आयीं हैं हमसे मिलने चल पुस्तकालय की बड़ी गाड़ियों मेंएक - दूसरे से कंधे भिड़ाती,आपस में हँसती- बतियाती किताबें जैसे कि वृद्धाएँ-किसी तीर्थयात्रा की बस में सवार एकदम मगन मन में,सोचती हुई ये कि एक पिकनिक तो हुई जीवन में ।चल पुस्तकालय की इन गाड़ियों में सट- सटकर बैठे हुए दीखते थे वेद और क़ुरान, टॉल्सटॉय, चेखव, रवीन्द्र और प्रेमचंद,यशपाल, स्वेताएवा और जैनेन्द्र ।छरियाकर घर से निकल आयी औरतों के जीवन का पहला और अंतिम रोमांस थीं किताबें ।हाथों में पुस्तक आते ही धीरे - धीरे उनकी साँसों में उगने लगती थी नरम दूब पहली बारिश से नहायी हुई ।लंबी- लंबी साँसें खींचने लगती थीं वे जैसे कि पूरी धरती की सुगन्ध खींच लेनी हो इसी वक़्त कल किसने देखा है ।इन गुप्त किताबी सुरंगों का धन्यवाद इनसे ही होती हुई तो कहाँ से कहाँ निकल गईंदुनिया से रूठी,अन्यायों से टूटी सब औरतें ।कहाँ से कहाँ निकल गईं-इसका इतिहास है गवाह! कहीं तो पहुँचती है अक्सर बेकस की आह।
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Kasbon Mein Chal Pustakalay | Anamika
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