Kavi Ki Atmahatya | Devansh Ekant episode artwork

EPISODE · Jan 28, 2024 · 2 MIN

Kavi Ki Atmahatya | Devansh Ekant

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

कवि की आत्महत्या | देवांश एकांत अभिनेता अभिनय करते-करते मृत्यु का मंचन करने लगता हैआप उन्मत्त होते हैं अभिनय देखपीटना चाहते हैं तालियाँ मगर इस बार वह नही उठताक्योंकि जीवन के रंगमंच में एक ही ‘कट-इट’ होता हैकोई हँसते-हँसाते शहर के पुल से छलाँग लगा देता है और तब पिता के साथ नवका विहार में आया लड़का जान पाता हैपानी की सतह पर मछलियाँ ही नहींआदमी भी तैरता हैहर वजन को अपनी हद में रखने वाला वैज्ञानिकआत्मा के ख़ालीपन से दबकर मर जाता है,कुछ घरों में उजाला सूरज से नही कई दिनों बाद गरम रोटी की चमक से होता है सुबह रात के जाने से नही मजूर बाप के आधी रात लौटने से होती है माफ़ कीजिए ये दरअसल घर नही हैंसंग्रहालयों में रखे चित्र की व्याख्या हैआपने यह चित्र जीवंत देखा क्या ?मेरी आँखों का कालापन शायद राख है काफ़्का के उन पत्रों कीजो उसने मिलेना को भेजने से पहलेअपनी हीनता के बोध में जला डाले होंगेरात्रि के झींगुर नाद के मध्यजब तुम कर रहे होगे अपनी कविताओं में कांट छाँटतुम अचानक पाओगे कि मुक्ति का साधक मुक्तिबोधसबसे अधिक बंधा था बेड़ियों में ब्रह्मराक्षस आज भी करता है नरक में उसका पीछादेह में रक्त ही नही प्रतीक्षा भी दौड़ती है रक्तचाप से अधिक प्रतीक्षा झँझोड़ती है यह मैंने ड्योढ़ी पे बैठे उस दरवेश से जानाबह गयी जिसकी प्रेमिका गाँव की बाढ़ में जल्द लौटने का वादा करभीतर की एक-एक नस थरथरा उठती है यह सोचकर कि एक दिन नही होगी माँ, नहीं होंगे पितातब कौन पुकारेगा बेटातब कौन लेगा भूख का संज्ञानयह सोचते-सोचतेहर रात मेरे भीतर का कविकर लेता है आत्महत्या।

कवि की आत्महत्या | देवांश एकांत अभिनेता अभिनय करते-करते मृत्यु का मंचन करने लगता हैआप उन्मत्त होते हैं अभिनय देखपीटना चाहते हैं तालियाँ मगर इस बार वह नही उठताक्योंकि जीवन के रंगमंच में एक ही ‘कट-इट’ होता हैकोई हँसते-हँसाते शहर के पुल से छलाँग लगा देता है और तब पिता के साथ नवका विहार में आया लड़का जान पाता हैपानी की सतह पर मछलियाँ ही नहींआदमी भी तैरता हैहर वजन को अपनी हद में रखने वाला वैज्ञानिकआत्मा के ख़ालीपन से दबकर मर जाता है,कुछ घरों में उजाला सूरज से नही कई दिनों बाद गरम रोटी की चमक से होता है सुबह रात के जाने से नही मजूर बाप के आधी रात लौटने से होती है माफ़ कीजिए ये दरअसल घर नही हैंसंग्रहालयों में रखे चित्र की व्याख्या हैआपने यह चित्र जीवंत देखा क्या ?मेरी आँखों का कालापन शायद राख है काफ़्का के उन पत्रों कीजो उसने मिलेना को भेजने से पहलेअपनी हीनता के बोध में जला डाले होंगेरात्रि के झींगुर नाद के मध्यजब तुम कर रहे होगे अपनी कविताओं में कांट छाँटतुम अचानक पाओगे कि मुक्ति का साधक मुक्तिबोधसबसे अधिक बंधा था बेड़ियों में ब्रह्मराक्षस आज भी करता है नरक में उसका पीछादेह में रक्त ही नही प्रतीक्षा भी दौड़ती है रक्तचाप से अधिक प्रतीक्षा झँझोड़ती है यह मैंने ड्योढ़ी पे बैठे उस दरवेश से जानाबह गयी जिसकी प्रेमिका गाँव की बाढ़ में जल्द लौटने का वादा करभीतर की एक-एक नस थरथरा उठती है यह सोचकर कि एक दिन नही होगी माँ, नहीं होंगे पितातब कौन पुकारेगा बेटातब कौन लेगा भूख का संज्ञानयह सोचते-सोचतेहर रात मेरे भीतर का कविकर लेता है आत्महत्या।

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How long is this episode of Pratidin Ek Kavita?

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This episode was published on January 28, 2024.

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कवि की आत्महत्या | देवांश एकांत अभिनेता अभिनय करते-करते मृत्यु का मंचन करने लगता हैआप उन्मत्त होते हैं अभिनय देखपीटना चाहते हैं तालियाँ मगर इस बार वह नही उठताक्योंकि जीवन के रंगमंच में एक ही ‘कट-इट’ होता हैकोई हँसते-हँसाते शहर के पुल से छलाँग लगा...

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