EPISODE · May 24, 2023 · 2 MIN
Kavi | Viren Dangwal
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
कवि - वीरेन डंगवाल मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँऔर गुठली जैसाछिपा शहद का ऊष्म तापमैं हूँ वसंत में सुखद अकेलापनजेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकरचबाता फ़ुरसत सेमैं चेकदार कपड़े की क़मीज़ हूँउमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैंतब मैं उनका मुखर ग़ुस्सा हूँइच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरेउनके पास मेरी हर ज़रूरत दर्ज हैएक फ़ेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरीउन्हें यह तक मालूम हैकि कब मैं चुप होकर गर्दन लटका लूँगामगर फिर भी मैं जाता रहूँगा हीहर बार भाषा को रस्से की तरह थामेसाथियों के रास्ते परएक कवि और कर ही क्या सकता हैसही बने रहने की कोशिश के सिवा
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Kavi | Viren Dangwal
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