EPISODE · May 4, 2023 · 2 MIN
Mallikarjun Mansoor | Ashok Vajpeyi
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
मल्लिकार्जुन मंसूर - अशोक वाजपेयी मल्लिकार्जुन मंसूरअपने भरे पर फिर भी सीधे बुढ़ापे मेंहलका -सा झुककररखते हैंकल के कंधे पर पर अपना हाथठिठककर सुलगाते हैं अपनी बीड़ीचल पड़ते हैं फिर किसी अप्रत्याशितपड़ाव की ओरअपने लिए कुछ नहीं बटोरते उनके संत-हाथसिर्फ लुटाते चलते हैं सब कुछगुनगुनाते चलते हैं पंखुरी-पंखुरी सारा संसारईश्वर आ रहा होताघूमने इसी रास्तेतो पहचान न पाता कि वह स्वयं हैया मल्लिकार्जुन मंसूर
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Mallikarjun Mansoor | Ashok Vajpeyi
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